जानिए हमारा कानून
प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार क्या है जानिए इससे संबंधित प्रावधान
प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार (Right to private defence) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी निजी सुरक्षा करने का अधिकार है। यही कारण है कि अपनी निजी सुरक्षा के लिए किये गए कार्यों को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 96 से 106 के अन्तर्गत आपराधिक दायित्व से मुक्त रखा गया है।एक पुराने मामले में कहा गया है कि अभियुक्त को अपनी सुरक्षा उस समय तक करनी चाहिए जब तक कि संकट टल न जाए और अपनी सुरक्षा आक्रमण की आशंका बने रहने तक जारी रखी जानी चाहिये।चाको मधैई बनाम स्टेट के मामले में केरल उच्च न्यायालय द्वारा यह...
अभियुक्त को कानून द्वारा क्या अधिकार दिए गए हैं? महत्वपूर्ण बातें
आपराधिक मामलों में जिस व्यक्ति पर अभियोजन अपना मामला लाता है उसे अभियुक्त कहा जाता है। अभियुक्त पर आपराधिक मामले का विचारण चलता है, अदालत द्वारा दोषसिद्धि या दोषमुक्ति दी जाती है। पुलिस एफआईआर दर्ज करती है, अन्वेषण करती है, न्यायालय आरोप तय करता है, अभियोजन अपना मामला साबित करता है एवं अभियुक्त बचाव करता तथा अंत में न्यायालय द्वारा निर्णय पारित किया जाता है। इन सब के बीच कानून द्वारा अभियुक्त को कुछ अधिकार दिए गए हैं, यह अधिकार अभियुक्त को बचाने के लिए नहीं है अपितु शासन की शक्तियों पर अंकुश...
किसी आपराधिक मामले में निर्णय का क्या अर्थ है
निर्णय बेहद आम शब्द है लेकिन इसकी उत्पत्ति कानून से हुई है। आम जीवन में भी हम बहुत से संवादों में निर्णय शब्द को उपयोग करते है। कानून में निर्णय को भिन्न प्रकार से परिभाषित किया गया है। निर्णय देना अदालत का कर्तव्य होता है। किसी भी मामले में निष्कर्ष पर पहुंच कर अदालत द्वारा निर्णय दिया जाता है।निर्णय विचारण का अन्तिम चरण है। विचारण पूरा हो जाने पर निर्णय सुनाया जाता है और निर्णय के साथ ही विचारण का समापन हो जाता है। आपराधिक न्याय प्रशासन में निर्णय का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि निर्णय से ही...
आपराधिक मामलों में जांच किसे कहा जाता है एवं इसका कानूनी महत्व
किसी आपराधिक मामले में अनेक चरण होते हैं। कोई मामला प्रथम सूचना रिपोर्ट से प्रारंभ होकर अपीलीय न्यायालय के निर्णय तक जाता है। किसी आपराधिक मामले में जिस तरह आरोप होता है उस ही तरह जांच भी एक स्तर है। किसी मामले में मजिस्ट्रेट जांच महत्वपूर्ण भी होती है, जैसे पुलिस अधिकारियों पर प्राथमिकी दर्ज करने के पहले मजिस्ट्रेट जांच आवश्यक होती है। इस आलेख में इस ही जांच शब्द पर चर्चा की जा रही है एवं उसके कानूनी महत्व को समझा जा रहा है।जांच एवं अन्वेषण विचारण की प्रारम्भिक प्रक्रियाए हैं। जब न्यायालय के...
आरोप किसे कहते हैं? जानिए इसके कानूनी अर्थ
आरोप शब्द एक सामान्य जीवन से संबंधित शब्द है। हम इसे कई दफा दोहराते है, यह आम बातचीत का हिस्सा होता है। कानूनी क्षेत्र में आमतौर पर यह समझा जाता है कि पुलिस के समक्ष होने वाली शिकायत आरोप होती है जबकि यह आरोप नहीं है। आरोप अदालत द्वारा लगाएं जाते हैं। यह किसी भी मुकदमे का एक स्तर होता है। पुलिस द्वारा अपना अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के बाद ही कोई मुकदमा आरोप हेतु नियत किया जाता है। इसके पश्चात अदालत आरोप तय करती है। इस आलेख में आपराधिक मामलों में आरोप पर चर्चा की जा रही है।आरोप को 'दोषारोपण'...
जमानत के बावजूद पत्रकार सिद्दीकी कप्पन क्यों है जेल में?
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने हाथरस मामले (Hathras Case) में हिंसा भड़काने की साज़िश रचने के आरोप में 6 अक्टूबर, 2020 को यूपी पुलिस द्वारा गिरफ्तार पत्रकार सिद्दीक कप्पन (Siddique Kappan) को ज़मानत दी थी।हालांकि, प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा उनके खिलाफ दर्ज किए गए मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले के कारण कप्पन अभी भी जेल में बंद है।कप्पन को रिहा क्यों नहीं किया गया?सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन्हें जमानत देने के बाद लखनऊ की एक अदालत ने यूपी पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज मामले के संबंध में कप्पन के रिहाई...
आपराधिक मामलों में अदालतों का साक्ष्य अभिलिखित किए जाने का तरीका
कानून को दो प्रकार की विधियों में बांटा गया है आपराधिक और सिविल। अदालतें अपने निर्णय साक्ष्य के आधार पर देती है। आपराधिक मामलों में मौखिक साक्ष्य का अधिक महत्व होता है। अभियोजन अपने साक्षी प्रस्तुत करता है और बचाव पक्ष ऐसे साक्षियों का प्रतिपरीक्षण करता है। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 272 से 283 तक में साक्ष्य लेने और अभिलिखित किये जाने के ढंग के बारे में प्रावधान किया गया है, यह आपराधिक मामलों के लिए है क्योंकि दंड प्रक्रिया संहिता आपराधिक विधि की प्रक्रिया विधि है। इस आलेख के अंतर्गत...
साक्ष्य क्या है और कितने प्रकार के होते हैं? जानिए प्रावधान
न्याय प्रशासन में साक्ष्य का महत्वपूर्ण स्थान है। साक्ष्य द्वारा ही सत्य-असत्य की खोज की जाती है। साक्ष्य के अभाव में किसी व्यक्ति को दण्डित नहीं किया जा सकता। आपराधिक मामलों में अभियोजन को अपना मामला सन्देह से परे साबित करना होता है। थोड़ा भी संदेह हो तब अभियुक्त दोषमुक्त हो सकता है।एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा यह कहा गया है कि "साक्ष्य विधि न्यायालयों का मार्ग प्रशस्त करती है। यह ऐसे नियमों का प्रतिपादन करती है जो न्याय प्रशासन के सुचारु संचालन में सहायक होते हैं।"समस्त न्याय प्रशासन...
वर्तमान जमानत विधि में परिवर्तन पर अदालतों के मत
भारत में किसी भी अपराध के अभियुक्त को दोषसिद्धि से पूर्व एवं अपील के लंबित रहते हुए जमानत पर छोड़े जाने के प्रावधान हैं। हालांकि यह प्रावधान जमानतीय अपराध के मामलों में लागू होते हैं। गैर जमानती अपराधों में जमानत देना अदालत का विवेकाधिकार होता है, ऐसे मामलों में अभियुक्त की परिस्थिति एवं अपराध की गंभीरता को देखते हुए अदालतों द्वारा जमानत दी जाती है। समय-समय पर भारत के उच्चतम न्यायालय एवं भिन्न-भिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा जमानत की विधि पर परिवर्तन हेतु अपने मत दिए गए हैं। अनेक विद्वानों ने भी इस...
जमानत की अवधारणा, जानिए जमानत क्या है
शब्द 'जमानत' का अर्थ अन्वेषण एवं विचारण के लम्बित रहने के दौरान और कतिपय मामलों में अभियुक्त के विरुद्ध दोषसिद्धि के बाद भी अभियुक्त का न्यायिक उन्मोचन है। दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 शब्द 'जमानत' को परिभाषित नहीं करती है। हालांकि शब्द 'जमानत का प्रयोग दण्ड प्रक्रिया संहिता में किया गया है, फिर भी संहिता में इसे परिभाषित नहीं किया गया है। शब्द 'जमानत को पुरानी दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 में भी परिभाषित नहीं किया गया था। दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 में अपराध को केवल 'जमानतीय' एवं 'अजमानतीय' के...
पुलिस द्वारा चालान पेश करने की अवधि 60 या 90 दिन, जानिए प्रावधान
किसी भी अपराध में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस अपना अन्वेषण शुरू करती है। ऐसे अन्वेषण के बाद पुलिस चालान प्रस्तुत करती है। यह पुलिस की फाइनल रिपोर्ट होती है। इस चालान को प्रस्तुत करने हेतु पुलिस को एक समय सीमा दंड प्रक्रिया संहिता द्वारा दी गई है। यदि पुलिस उस निर्धारित समय के भीतर चालान प्रस्तुत नहीं करती है तो अभियुक्त को आवश्यक रूप से जमानत का लाभ मिल जाता है।यह प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 के अंतर्गत उपलब्ध है। यहां एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ऐसा चालान प्रस्तुत...
अवैध गिरफ्तारी और ऐसी गिरफ्तारी पर प्रतिकर के प्रावधान
किसी अपराध में किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार किया जाता है। दंड प्रक्रिया संहिता का अध्याय 5 गिरफ्तारी के संबंध में स्पष्ट प्रावधान करता है। कोई भी गिरफ्तारी दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अधीन होना चाहिए। संहिता की धारा 41 के अंतर्गत पुलिस किसी संज्ञेय अपराध के आरोप में किसी व्यक्ति को बगैर वारंट के गिरफ्तार कर सकती है लेकिन उसे उन प्रावधानों का पालन करना होता जो गिरफ्तारी के संबंध दिए गए हैं। अगर पुलिस द्वारा उन प्रावधानों का पालन नहीं किया जाता है तो ऐसी गिरफ्तारी को अवैध गिरफ्तारी कहा जाता...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 19: उपधारणा का खंडन
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 20 उपधारणा की व्यवस्था करती है। धारा 20 के तहत अपराधों के साबित करने का भार अभियोजन पर नहीं अपितु अभियुक्त पर स्वयं को निर्दोष साबित करने का भार होता है। धारा 20 की उपधारणा का खंडन कैसे हो सकता है यह न्यायालय द्वारा समय समय पर दिए निर्णयों से उल्लेखित किया गया है, कुछ न्याय निर्णयों के साथ यह आलेख इस अधिनियम के अंतर्गत होने वाली उपधाराओं के खंडन में प्रस्तुत किया जा रहा है।उपधारणा का खण्डनभ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 18: अधिनियम के अंतर्गत अपराधों के संबंध में उपधारणा
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 20 उपधारणा से संबंधित है। आपराधिक मामले में उपधारणा का अर्थ होता है साबित करने का भार अभियुक्त पर होना। यह अधिनियम एक विशेष अधिनियम है जो लोक सेवकों में भ्रष्टाचार रोकने का प्रयास करता है इसलिए इस अधिनियम में भी उपधारणा पर विशेष प्रावधान किए गए हैं।यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप हैधारा 20:- जहां लोक सेवक असम्यक लाभ प्रतिगृहीत करता है वहां उपधारणा जहां धारा 7 के अधीन या धारा 11 के अधीन दंडनीय किसी अपराध के विचारण...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 17: अभियोजन मंजूरी से संबंधित प्रकरण
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 19 अभियोजन की मंजूरी से संबंधित प्रावधान करती है जिसका उल्लेख पिछले आलेख में किया गया था। अभियोजन की मंजूरी से संबंधित अनेक प्रकरण अदालतों के समक्ष आए है। इस आलेख में धारा 19 से संबंधित कुछ न्याय निर्णयों का यहां उल्लेख किया जा रहा है।राज्य बनाम फूलचन्द, ए आई आर 1956 एम बी 50 1956 क्रि लॉ ज 226 के मामले में अभियोजन की ओर से यह तर्क किया गया कि न्यायिक नोटिस को इस तथ्य के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए कि मंजूरी आदेश को जिला...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 16: अभियोजन की मंजूरी
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 19 अभियोजन की मंजूरी का उल्लेख करती है। इस अधिनियम के तहत कोई भी अभियोजन सरकार की मंजूरी के बगैर नहीं चलाया जा सकता। धारा 19 इस ही मंजूरी से संबंधित नियमों का उल्लेख करती है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 19 से संबंधित न्याय निर्णयों पर चर्चा की जा रही है।अभियोजन की मंजूरीएक मंजूरी के लिए प्रावधान करने में विधान मंडल का आशय मात्र उनके शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन में लोक सेवकों को एक युक्तियुक्त संरक्षण प्रदान करना होता है। इस...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 15: इस अधिनियम के तहत अन्वेषण के प्राधिकृत व्यक्ति
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 17 अन्वेषण के लिए प्राधिकृत व्यक्ति के संबंध में उल्लेख करती है। एक प्रकार से इस धारा में यह नियम बताए गए हैं कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत अन्वेषण किस अधिकारी द्वारा किया जाएगा। इस आलेख के अंतर्गत धारा 17 पर टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है।यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप हैधारा 17अन्वेषण के लिए प्राधिकृत व्यक्तिदण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1973 का 2) में किसी बात के होते हुए भी निम्न पंक्ति के नीचे का कोई...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 14: आपराधिक अवचार के सबूत
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 13 आपराधिक अवचार का उल्लेख करती है जिसमें दोषी लोक सेवकों के लिए कठोर दंड का उल्लेख है। आपराधिक अवचार का अर्थ शासकीय संपत्तियों का आपराधिक न्यासभंग है। इस आलेख के अंतर्गत इस अपराध से संबंधित साक्ष्यों पर चर्चा की जा रही है।भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 13 तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 409 के अधीन अपराधों के सबूत-अधिनियम की धारा 13 के अधीन अपराध ठीक उसी प्रकार का है जैसे कि गबन का। इंग्लिश विधि के अनुसार गबन का...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 13: भ्रष्टाचार अधिनियम के अंतर्गत दोषी अधिकारियों को दंडित किया जाना
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 13 आपराधिक अवचार पर प्रावधान करती है। यह अधिनियम रिश्वतखोर अधिकारियों को दंडित करने के उद्देश्य से कड़े से कड़े प्रावधान करता है। समय-समय पर भारत के उच्चतम न्यायालय ने अपनी टिप्पणियों में यह कहा है कि सरकारी संपत्तियों का विनियोग करने वाले अधिकारी को दंडित करते समय कोई रियायत नहीं बरती जानी चाहिए अपितु उसे अधिक से अधिक दंड से दंडित किया जाना चाहिए, जितना दंड उस अपराध के लिए अधिनियम में उल्लेखित किया गया है। इस आलेख के...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 12: लोक सेवकों द्वारा आपराधिक अवचार एवं उसके लिए दंड
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 13 आपराधिक अवचार से संबंधित है। आम शब्दों में कहा जाए तो आपराधिक अवचार आपराधिक दुर्विनियोग के अपराध की तरह है। बस यहां पर किसी सरकारी संपत्ति के दुर्विनियोग का प्रश्न है। शासकीय कार्यों के निष्पादन के लिए अनेक शासकीय संपत्ति लोक सेवकों के पास रहती है, यदि वह स्वयं को संपन्न करने के उद्देश्य से उस संपत्ति को दुर्विनियोग कर देता है तब धारा 13 के अधीन अपराध गठित होता है। इस आलेख के अंतर्गत भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की इस ही...










