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जमानत की अवधारणा, जानिए जमानत क्या है
शब्द 'जमानत' का अर्थ अन्वेषण एवं विचारण के लम्बित रहने के दौरान और कतिपय मामलों में अभियुक्त के विरुद्ध दोषसिद्धि के बाद भी अभियुक्त का न्यायिक उन्मोचन है। दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 शब्द 'जमानत' को परिभाषित नहीं करती है। हालांकि शब्द 'जमानत का प्रयोग दण्ड प्रक्रिया संहिता में किया गया है, फिर भी संहिता में इसे परिभाषित नहीं किया गया है। शब्द 'जमानत को पुरानी दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 में भी परिभाषित नहीं किया गया था। दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 में अपराध को केवल 'जमानतीय' एवं 'अजमानतीय' के...
पुलिस द्वारा चालान पेश करने की अवधि 60 या 90 दिन, जानिए प्रावधान
किसी भी अपराध में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस अपना अन्वेषण शुरू करती है। ऐसे अन्वेषण के बाद पुलिस चालान प्रस्तुत करती है। यह पुलिस की फाइनल रिपोर्ट होती है। इस चालान को प्रस्तुत करने हेतु पुलिस को एक समय सीमा दंड प्रक्रिया संहिता द्वारा दी गई है। यदि पुलिस उस निर्धारित समय के भीतर चालान प्रस्तुत नहीं करती है तो अभियुक्त को आवश्यक रूप से जमानत का लाभ मिल जाता है।यह प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 के अंतर्गत उपलब्ध है। यहां एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ऐसा चालान प्रस्तुत...
अवैध गिरफ्तारी और ऐसी गिरफ्तारी पर प्रतिकर के प्रावधान
किसी अपराध में किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार किया जाता है। दंड प्रक्रिया संहिता का अध्याय 5 गिरफ्तारी के संबंध में स्पष्ट प्रावधान करता है। कोई भी गिरफ्तारी दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अधीन होना चाहिए। संहिता की धारा 41 के अंतर्गत पुलिस किसी संज्ञेय अपराध के आरोप में किसी व्यक्ति को बगैर वारंट के गिरफ्तार कर सकती है लेकिन उसे उन प्रावधानों का पालन करना होता जो गिरफ्तारी के संबंध दिए गए हैं। अगर पुलिस द्वारा उन प्रावधानों का पालन नहीं किया जाता है तो ऐसी गिरफ्तारी को अवैध गिरफ्तारी कहा जाता...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 19: उपधारणा का खंडन
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 20 उपधारणा की व्यवस्था करती है। धारा 20 के तहत अपराधों के साबित करने का भार अभियोजन पर नहीं अपितु अभियुक्त पर स्वयं को निर्दोष साबित करने का भार होता है। धारा 20 की उपधारणा का खंडन कैसे हो सकता है यह न्यायालय द्वारा समय समय पर दिए निर्णयों से उल्लेखित किया गया है, कुछ न्याय निर्णयों के साथ यह आलेख इस अधिनियम के अंतर्गत होने वाली उपधाराओं के खंडन में प्रस्तुत किया जा रहा है।उपधारणा का खण्डनभ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 18: अधिनियम के अंतर्गत अपराधों के संबंध में उपधारणा
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 20 उपधारणा से संबंधित है। आपराधिक मामले में उपधारणा का अर्थ होता है साबित करने का भार अभियुक्त पर होना। यह अधिनियम एक विशेष अधिनियम है जो लोक सेवकों में भ्रष्टाचार रोकने का प्रयास करता है इसलिए इस अधिनियम में भी उपधारणा पर विशेष प्रावधान किए गए हैं।यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप हैधारा 20:- जहां लोक सेवक असम्यक लाभ प्रतिगृहीत करता है वहां उपधारणा जहां धारा 7 के अधीन या धारा 11 के अधीन दंडनीय किसी अपराध के विचारण...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 17: अभियोजन मंजूरी से संबंधित प्रकरण
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 19 अभियोजन की मंजूरी से संबंधित प्रावधान करती है जिसका उल्लेख पिछले आलेख में किया गया था। अभियोजन की मंजूरी से संबंधित अनेक प्रकरण अदालतों के समक्ष आए है। इस आलेख में धारा 19 से संबंधित कुछ न्याय निर्णयों का यहां उल्लेख किया जा रहा है।राज्य बनाम फूलचन्द, ए आई आर 1956 एम बी 50 1956 क्रि लॉ ज 226 के मामले में अभियोजन की ओर से यह तर्क किया गया कि न्यायिक नोटिस को इस तथ्य के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए कि मंजूरी आदेश को जिला...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 16: अभियोजन की मंजूरी
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 19 अभियोजन की मंजूरी का उल्लेख करती है। इस अधिनियम के तहत कोई भी अभियोजन सरकार की मंजूरी के बगैर नहीं चलाया जा सकता। धारा 19 इस ही मंजूरी से संबंधित नियमों का उल्लेख करती है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 19 से संबंधित न्याय निर्णयों पर चर्चा की जा रही है।अभियोजन की मंजूरीएक मंजूरी के लिए प्रावधान करने में विधान मंडल का आशय मात्र उनके शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन में लोक सेवकों को एक युक्तियुक्त संरक्षण प्रदान करना होता है। इस...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 15: इस अधिनियम के तहत अन्वेषण के प्राधिकृत व्यक्ति
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 17 अन्वेषण के लिए प्राधिकृत व्यक्ति के संबंध में उल्लेख करती है। एक प्रकार से इस धारा में यह नियम बताए गए हैं कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत अन्वेषण किस अधिकारी द्वारा किया जाएगा। इस आलेख के अंतर्गत धारा 17 पर टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है।यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप हैधारा 17अन्वेषण के लिए प्राधिकृत व्यक्तिदण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1973 का 2) में किसी बात के होते हुए भी निम्न पंक्ति के नीचे का कोई...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 14: आपराधिक अवचार के सबूत
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 13 आपराधिक अवचार का उल्लेख करती है जिसमें दोषी लोक सेवकों के लिए कठोर दंड का उल्लेख है। आपराधिक अवचार का अर्थ शासकीय संपत्तियों का आपराधिक न्यासभंग है। इस आलेख के अंतर्गत इस अपराध से संबंधित साक्ष्यों पर चर्चा की जा रही है।भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 13 तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 409 के अधीन अपराधों के सबूत-अधिनियम की धारा 13 के अधीन अपराध ठीक उसी प्रकार का है जैसे कि गबन का। इंग्लिश विधि के अनुसार गबन का...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 13: भ्रष्टाचार अधिनियम के अंतर्गत दोषी अधिकारियों को दंडित किया जाना
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 13 आपराधिक अवचार पर प्रावधान करती है। यह अधिनियम रिश्वतखोर अधिकारियों को दंडित करने के उद्देश्य से कड़े से कड़े प्रावधान करता है। समय-समय पर भारत के उच्चतम न्यायालय ने अपनी टिप्पणियों में यह कहा है कि सरकारी संपत्तियों का विनियोग करने वाले अधिकारी को दंडित करते समय कोई रियायत नहीं बरती जानी चाहिए अपितु उसे अधिक से अधिक दंड से दंडित किया जाना चाहिए, जितना दंड उस अपराध के लिए अधिनियम में उल्लेखित किया गया है। इस आलेख के...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 12: लोक सेवकों द्वारा आपराधिक अवचार एवं उसके लिए दंड
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 13 आपराधिक अवचार से संबंधित है। आम शब्दों में कहा जाए तो आपराधिक अवचार आपराधिक दुर्विनियोग के अपराध की तरह है। बस यहां पर किसी सरकारी संपत्ति के दुर्विनियोग का प्रश्न है। शासकीय कार्यों के निष्पादन के लिए अनेक शासकीय संपत्ति लोक सेवकों के पास रहती है, यदि वह स्वयं को संपन्न करने के उद्देश्य से उस संपत्ति को दुर्विनियोग कर देता है तब धारा 13 के अधीन अपराध गठित होता है। इस आलेख के अंतर्गत भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की इस ही...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 11: इस अधिनियम के तहत अपराधों के दुष्प्रेरण के लिए दंड
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 12 इस अधिनियम के अंतर्गत बनाए गए अपराधों के दुष्प्रेरण को भी दंडनीय अपराध बनाती है। दुष्प्रेरण के लिए भी सात वर्ष तक का कारावास दिया जा सकता है जो न्यूनतम तीन वर्ष तक का हो सकता है। किसी भी अपराध के दुष्प्रेरण को भी अपराध बनाया जाना आवश्यक है अन्यथा वह व्यक्ति बच निकलते है जो पर्दे के पीछे से अपराध कारित करते है। साथ ही ऐसे व्यक्ति जो एक लोक सेवक को रिश्वत देने का प्रयास करते हैं उन्हें भी दंडित किये जाने का लक्ष्य है। इस...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 10: रिश्वत के अपराध में दोषमुक्ति
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 7 रिश्वत के अपराध का प्रावधान करती है, धारा सात ने ही लोक सेवकों को रिश्वत लेने पर दंडनीय अपराध का उल्लेख किया है जिसमे कड़े कारावास का उल्लेख है। इस धारा के अधीन प्रकरणों में अनेक अभियुक्त दोषमुक्त किये गए हैं। इस आलेख में कुछ न्यायलयीन प्रकरणों में दोषमुक्ति पर चर्चा की जा रही है।रिश्वत के अपराध में दोषमुक्त होनाकैलाश चन्द्र पाण्डेय बनाम स्टेट ऑफ़ वेस्ट बंगाल, 2003 क्रि लॉ ज 4286 के मामले में चूंकि अभियोजन संदेह से परे यह...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 9 : अधिनियम के अंतर्गत परितोषण क्या है
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 7 रिश्वत के अपराध को विस्तारपूर्वक प्रावधानित करती है। शायद कोई ऐसा तथ्य रह गया है जिसे रिश्वत के अपराध के संबंध में पार्लियामेंट द्वारा छोड़ा गया हो। यह अधिनियम अपने आप में परिपूर्ण है। परितोषण शब्द के संबंध में न्यायालय समय समय पर अपने विचार देता रहा है। यह शब्द इस अधिनियम के अंतर्गत महत्वपूर्ण है। इस आलेख में इस ही शब्द पर चर्चा की जा रही है।परितोषणजहाँ तक 'परितोषण' शब्द का प्रश्न है, तो इसको भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 8 : लोक सेवक को रिश्वत देने का अपराध
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 7 इस अधिनियम की महत्वपूर्ण धारा है। यहां से इस अधिनियम का नया अध्याय शुरू होता है, जिसमें इस अधिनियम में उल्लेखित किए गए अपराधों के संबंध में प्रावधान किए गए हैं। कुछ ऐसे कृत्य बताए गए हैं, जिन्हें इस अधिनियम में अपराध बनाया गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत प्रारंभ में प्रक्रिया दी गई है एवं उसके बाद अपराधों का उल्लेख किया गया है। यहां इस आलेख में इस अधिनियम की धारा 7 पर टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है।यह अधिनियम में प्रस्तुत...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 7 : विशेष न्यायाधीश की क्षमा प्रदान करने की शक्ति
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 5 में विशेष न्यायाधीश की शक्तियों और अधिकार का उल्लेख है। इन अधिकारों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिकार आरोपियों को क्षमा प्रदान करने का अधिकार है। यह अधिकार इस अधिनियम में विशेष रूप से उल्लेखित किया गया है। यहां एक विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार अधिनियम के अधीन आरोपी बनाए गए व्यक्ति को अभियोजन की सहायता करने की शर्त पर क्षमा प्रदान कर सकता है। इस आलेख में विशेष न्यायाधीश की इस ही शक्ति पर चर्चा की जा रही है।विशेष न्यायाधीश की...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 6: विशेष न्यायाधीशों के अधिकार और प्रक्रिया
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 5 विशेष न्यायाधीशों को कुछ अधिकार देती है और उनकी प्रक्रिया के संबंध में प्रावधान करती है। हालांकि किसी भी आपराधिक प्रकरण का विचारण दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार किया जाता है लेकिन कुछ विशेष आपराधिक कानून ऐसे हैं जो कुछ मामलों में विशेष प्रक्रिया देते हैं जो दंड प्रक्रिया संहिता से थोड़ी भिन्न होती है। ऐसा इसलिए किया गया है कि विशेष कानूनों के अधीन होने वाले प्रकरणों में विचारण शीघ्र किया जा सके और विशेष न्यायाधीशों को...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 5: विशेष न्यायाधीशों द्वारा विचारण किए जाने वाले प्रकरण
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 4 उन प्रकरणों का उल्लेख करती है जिन्हें विशेष न्यायाधीशों द्वारा विचारण किया जाएगा। जैसा कि विदित है यह अधिनियम के प्रारंभ में ही धारा 3 में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के आधीन अपराधों का विचारण विशेष न्यायाधीश द्वारा किया जाएगा और राज्य सरकार को ऐसे न्यायाधीश की नियुक्ति की सभी शक्तियां होगी। इस ही प्रकार धारा 4 उन प्रकरणों का उल्लेख है जिनका विचारण विशेष न्यायाधीश कर सकते हैं। इस आलेख में धारा...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 4: सरकार को विशेष न्यायधीशों की नियुक्ति के अधिकार
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 3 सरकार को इस अधिनियम के अंतर्गत होने वाले अपराधों के विचारण के विशेष न्यायधीशों की नियुक्ति करने का अधिकार देती है। विशेष न्यायधीशों की नियुक्ति का अधिकार एक महत्वपूर्ण अधिकार है, इससे किसी प्रकरण को विशेष रूप से चलाया जा सकता है ताकि शीघ्र विचारण संपन्न हो सके। इस आलेख के अंतर्गत धारा 3 पर टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है।यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप हैधारा 3 विशेष न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार(1) केन्द्रीय...
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भाग 3: अधिनियम के अंतर्गत लोक सेवक कौन है
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 (Prevention Of Corruption Act,1988) की धारा 2 में परिभाषाएं दी गई है जहां लोक सेवक की परिभाषा भी उपलब्ध है। इस अधिनियम में लोक सेवक एक केंद्र है क्योंकि यह अधिनियम लोक सेवकों के आपराधिक कृत्यों के विरुद्ध ही प्रावधान करता है, कोई भी ऐसा व्यक्ति जो लोक पद पर है यदि उसके द्वारा कोई भ्रष्टाचार किया जाता है तब यह अधिनियम लागू होता है। यह अधिनियम आम व्यक्ति पर नहीं है अपितु केवल सरकारी व्यक्तियों पर है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु अधिनियम में यह स्पष्ट होना आवश्यक था कि...









