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जमानत की अवधारणा, जानिए जमानत क्या है

Shadab Salim
22 Sep 2022 10:46 AM GMT
जमानत की अवधारणा, जानिए जमानत क्या है
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शब्द 'जमानत' का अर्थ अन्वेषण एवं विचारण के लम्बित रहने के दौरान और कतिपय मामलों में अभियुक्त के विरुद्ध दोषसिद्धि के बाद भी अभियुक्त का न्यायिक उन्मोचन है। दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 शब्द 'जमानत' को परिभाषित नहीं करती है। हालांकि शब्द 'जमानत का प्रयोग दण्ड प्रक्रिया संहिता में किया गया है, फिर भी संहिता में इसे परिभाषित नहीं किया गया है। शब्द 'जमानत को पुरानी दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 में भी परिभाषित नहीं किया गया था। दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 में अपराध को केवल 'जमानतीय' एवं 'अजमानतीय' के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इस प्रकार संहिता केवल जमानतीय एवं अजमानतीय अपराधों के बीच विभेद करती है।

यह विभेद प्रकृति में घोषणात्क है न कि अवधारणात्मक। इसका तात्पर्य यह है कि यदि कोई अपराध दण्ड प्रक्रिया संहिता की प्रथम अनुसूची में जमानतीय बनाया गया है या केन्द्र या राज्य की किसी अन्य विधि द्वारा जमानतीय बनाया गया है, तब यह अपराध जमानतीय अपराध है अन्यथा अपराध अजमानतीय अपराध होगा। जमानतीय अपराधों में जमानत की माँग अधिकार के रूप में की जा सकती है लेकिन अजमानतीय अपराधों के मामलों में यह न्यायालय के विवेक का विषय बन जाता है।

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 का अध्याय 33 जमानत एवं बन्धपत्र के प्रावधानों से सम्बन्धित है। इस अध्याय के अन्तर्गत विभिन्न धाराओं में जमानत एवं बंधपत्र से सम्बन्धित विधि का वर्णन है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 436 जमानतीय अपराधों के मामले में जमानत से सम्बन्धित विधि का प्रावधान करती है। इस प्रावधान के अन्तर्गत जमानतीय मामलों में जमानत की मांग अधिकार के रूप में की जा सकती है।

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 अजमानतीय अपराधों के मामले में जमानत से सम्बन्धित विधि का प्रावधान करती है। अजमानतीय अपराधों के मामलों में प्रावधान के तहत जमानत विवेकाधिकार की विषयवस्तु होती है। यह धारा उन अजमानतीय अपराधों से विभेद करती है जो मृत्यु दण्ड से या आजीवन कारावास से दण्डनीय हैं।

दूसरा विभेद अभियुक्त के बीच किया गया है, जहाँ अपराध संज्ञेय अपराध है और अभियुक्त को किसी अपराध के लिए मृत्युदण्ड, आजीवन कारावास या सात वर्ष या उससे अधिक अवधि के कारावास से पूर्व में दो या अधिक वार अजमानतीय और संज्ञेय अपराध में दोषसिद्ध किया जा चुका है। उपरोक्त प्रावधानों के तहत प्रदत्त जमानत को सामान्यतया नियमित जमानत कहा जाता है।

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 में उन मामलों में जमानत का प्रावधान किया गया है जहाँ अभियुक्त को अजमानतीय अपराधों में गिरफ्तारी की उचित आशंका है। इस धारा के अन्तर्गत प्रदत्त जमानत को अग्रिम जमानत या 'गिरफ्तारी पूर्व जमानत कहा जाता है। धारा 438 (1) उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय को अजमानतीय अपराधों के मामले में जमानत देने के लिए सशक्त करती है।

यह धारा 437 (3) में विनिर्दिष्ट प्रकृति के मामलों में उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय को कोई शर्त अधिरोपित करने के लिए भी सशक्त करती है। धारा 439 में उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय को जमानत से सम्बन्धित विशेष शक्तियाँ प्रदान की गयी है। धारा 439 (2) इस अध्याय के अधीन किसी रिहा किए गए व्यक्ति को गिरफ्तार करने या अभिरक्षा में सुपुर्द करने का निर्देश जारी करने के लिए उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय को सशक्त करती है। उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय के द्वारा दिया गया आदेश साधारणतया जमानत को निरस्त करने से सम्बन्धित होता है।

संहिता की धारा 437 (5) उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय से भिन्न अन्य न्यायालय को जिसने धारा 437 (1) या 437 (2) के अन्तर्गत जमानत प्रदान किया गया है, यह निर्देश जारी करने के लिए सशक्त करती है कि रिहा किए गये व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाए या अभिरक्षा में लिया जाए। अध्याय 33 की शेष धाराएँ जमानत प्रदत्त करने की अनुपयोगिता या प्रासंगिक विषयों से सम्बन्धित हैं।

जमानत प्रदान करने से सम्बन्धित कुछ अन्य प्रमुख प्रावधान दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 389 एवं 167 (2) में प्रावधानित है। संहिता के अध्याय 29 की धारा 389 अपीलीय न्यायालय को दोषसिद्ध व्यक्ति को अपील लम्बित रहने के दौरान जमानत देने से सम्बन्धित है। धारा 389 (1) के अन्तर्गत अपीलीय न्यायालय को दण्डादेश के निष्पादन का निलम्बन करने एवं अभियुक्त को जमानत पर छोड़ देने का आदेश करने के लिए सशक्त किया गया है।

इस प्रावधान के अन्तर्गत अभियुक्त को दोषसिद्ध करने वाले न्यायालय की अभियुक्त द्वारा न्यायालय का यह समाधान करने पर कि वह दोषसिद्धि के आदेश के विरुद्ध अपील करना चाहता है, अभियुक्त को जमानत पर रिहा कर सकता है। धारा 389 के तहत दी जाने वाली जमानत को सामान्यतया 'दोषसिद्धि के पश्चात् जमानत' कहते हैं। इस प्रावधान के प्रदत्त जमानत को लोक अभियोजक द्वारा संस्थित आवेदन पर रद्द किया जा सकता है।

दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 12 की धारा 167 (2) के अन्तर्गत प्रदत्त जमानत को 'बाध्यकारी जमानत' या 'सांविधिक जमानत' या 'व्यतिक्रम पर जमानत' कहा जाता है। इसके तहत अपराध की प्रकृति के अनुसार यदि पुलिस यथास्थिति 90 दिन या 60 दिन की निर्धारित समय सीमा के भीतर न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र दाखिल करने में असफल रहती है तो जमानत साधिकार मांगी जा सकती है।

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