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अवैध गिरफ्तारी और ऐसी गिरफ्तारी पर प्रतिकर के प्रावधान

Shadab Salim
20 Sep 2022 5:28 AM GMT
अवैध गिरफ्तारी और ऐसी गिरफ्तारी पर प्रतिकर के प्रावधान
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किसी अपराध में किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार किया जाता है। दंड प्रक्रिया संहिता का अध्याय 5 गिरफ्तारी के संबंध में स्पष्ट प्रावधान करता है। कोई भी गिरफ्तारी दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अधीन होना चाहिए। संहिता की धारा 41 के अंतर्गत पुलिस किसी संज्ञेय अपराध के आरोप में किसी व्यक्ति को बगैर वारंट के गिरफ्तार कर सकती है लेकिन उसे उन प्रावधानों का पालन करना होता जो गिरफ्तारी के संबंध दिए गए हैं। अगर पुलिस द्वारा उन प्रावधानों का पालन नहीं किया जाता है तो ऐसी गिरफ्तारी को अवैध गिरफ्तारी कहा जाता है।

उन प्रावधानों में प्रमुख रूप से गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों से अवगत करवाया जाना और गिरफ्तार व्यक्ति को चौबीस घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना है। आमतौर पर देखने को मिलता है कि पुलिस द्वारा गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तार कई दिन पहले किया जाता है और मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कई दिन बाद किया जाता है जबकि संहिता की धारा 57 के अधीन चौबीस घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना होता है।

ऐसी गिरफ्तारी को अवैध गिरफ्तारी कहा जाता है और इस गिरफ्तारी पर गिरफ्तार व्यक्ति को प्रतिकर न्यायालय द्वारा दिया जा सकता है, ऐसे निर्णय न्यायालय द्वारा समय समय पर दिए गए हैं।

अवैध गिरफ्तारी पर प्रतिकर

भीम सिंह के प्रकरण एआईआर 1986 उच्चतम न्यायालय 494 में उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित निष्कर्ष दिया था-

"हालांकि दोनों पुलिस अधिकारी प्रथम वह जिसने उसे गिरफ्तार किया था और दूसरा वह जिसने सुपुर्दगी आदेश प्राप्त किया था निचले दर्जे के मामूली कर्मचारी है। हमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि उत्तरदायित्व किसी और पर अर्थात् यह जम्मू कश्मीर सरकार के उच्च पद पर आसीन अधिकारियों का है, किन्तु हमारे समक्ष प्रस्तुत की गई सामग्री के आधार पर संक्षेप में यह कहना संभव नहीं है कि यह दायित्व कहां और किस का है। हमें इस बात में कोई सन्देह दिखाई नहीं देता है कि श्री भीम सिंह के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन निरापद रूप से हुआ है। चूंकि इस समय वे निरोध में नहीं है इसलिए उन्हें मुक्त करने के लिए कोई आदेश देने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें इसके लिए उपयुक्त और पर्याप्त प्रतिकर दिया जाना चाहिये। इस दिशा में हमें यह अधिकार है कि हम उदाहरणात्मक (निवारक) खर्चे दिलाते हुए आर्थिक प्रतिकर का आदेश करें या अन्यथा कोई उपाय करें जैसा कि इस न्यायालय द्वारा रुदल शाह बनाम बिहार राज्य, और सेबेशियन एम होंगरे बनाम भारत संघ वाले मामलों के विनिश्चयों में सिद्ध किया जा चुका है। जब कोई व्यक्ति हमारे समक्ष यह शिकायत लेकर आता है कि उसे अनिष्टकर अथवा दुर्भावपूर्ण आशय से गिरफ्तार किया गया और कारागार में रखा गया है और उसके संवैधानिक और विधिक अधिकारों का उल्लंघन किया गया है वहां उसे मुक्त कर देने मात्र से ही उसके प्रति हुए अनिष्ट या दुर्भाव और अधिकारों का उल्लंघन धुल नहीं जाता। समुचित मामलों में हमें ऐसे परेशान किये गये व्यक्ति को पर्याप्त आर्थिक प्रतिकर देकर उसकी क्षतिपूर्ति करने की अधिकारिता है। हम उसे समुचित मामला समझते हैं। इस प्रथम प्रत्यर्थी अर्थात् जम्मू कश्मीर राज्य को यह निदेश देते हैं कि वह श्री भीम सिंह को आज की तारीख से दो मास के भीतर 50,000 रुपये की रकम का भुगतान करे। यह रकम इस न्यायालय के रजिस्ट्रार के पास जमा की जाएगी और भीम सिंह को संदत्त की जायेगी।

सुनील गुप्ता 1990 एस एस सी 119 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित निदेश दिया था-

"ऊपर दिये गये विचार-विमर्श के आधार पर, हमें इस निष्कर्ष पर पहुंचने से कोई दुविधा महसूस नहीं होती कि प्रस्तुत मामले में मार्ग रक्षक दल ने, बिना किसी औचित्य में 22/4/1989 की याचियों को दोनों अवसरों पर अर्थात् याची संख्या 1 और 2 को कारागार से न्यायालय और फिर न्यायालय से कारागार में ले जाते समय हथकड़ी लगाई थी। इसलिए हम मध्य प्रदेश सरकार को निदेश देते हैं कि वह दोषी मार्गरक्षी दल के विरुद्ध समुचित कार्यवाही करे, जिसमें 22/4/1989 को याची संख्या एक और दो को हथकड़ी लगाने का अन्यायोचित और अयुक्तियुक्त कार्य किया था। अंत में उपयुक्त और पर्याप्त प्रतिकर के दावे की प्रार्थना के सम्बन्ध में, हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि याचियों को इस बात की स्वतन्त्रता है कि वे दोषी पदाधिकारियों के विरुद्ध विधि के अनुसरण में समुचित कार्यवाही कर सकते हैं यदि उन्हें ऐसा करने की सलाह दी जाती है और ऐसी दशा में जिस न्यायालय में दावा किया गया है उस दावे की जांच इस न्यायालय द्वारा दिये गये किसी निष्कर्ष से प्रभावित हुए बिना कर सकते हैं। "

एक अन्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने 12 वर्षीय लड़के असलम को हथकड़ी लगाने के लिए 20,000 रुपये का प्रतिकर अनुज्ञात करते हुए यह निदेश दिया कि लखनऊ स्थित अलीगंज पुलिस थाने के सिपाही चन्द्र भूषण पाण्डेय के वेतन से 20,000 रुपये की रकम की कटौती कर ली जाये।

उच्चतम न्यायालय और परिणामस्वरूप उच्च न्यायालय की किसी नागरिक के मूल अधिकारों के उल्लंघन जैसी संवैधानिक अपकृति कारित करने की बाबत प्रतिकर अनुज्ञात करने की शक्ति का विषय नहीं रहा है।

रुदल शाह बनाम बिहार राज्य और एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ मेहता वाले मामले में निम्नलिखित अभिनिर्धारित किया गया है-

"ऐसी उपचारपरक अनुतोष देने की न्यायालय की शक्ति के अंतर्गत समुचित मामलों में प्रतिकर अधिनिर्णीत करने की शक्ति भी आती है। हम जानबूझकर "समुचित मामलों में" शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं क्योंकि हमें यह बात स्पष्ट कर देनी चाहिए कि अतिक्रमणकारी द्वारा मूल अधिकार के भंग के प्रत्येक मामले में इस न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 32 के अधीन याचिका में प्रतिकर नहीं दिया जायेगा। मूल अधिकार का अतिलंघन घोर और स्पष्ट होना चाहिये अर्थात् निर्विवाद और अत्यन्त स्पष्ट होना चाहिए और या तो ऐसा अतिलंघन एक बड़े पैमाने पर होना चाहिए, जोकि बहुसंख्यक व्यक्तियों के मूल अधिकार पर प्रभाव डालता हो, या उनकी निर्धनता या निर्योग्यता या सामाजिक अथवा आर्थिक रूप से प्रतिकूल अवस्था के कारण वह अन्यायपूर्ण या अत्यधिक कठोर या दमनकारी दिखायी देना चाहिये, जिससे कि ऐसे अतिलंघन से प्रभावित व्यक्ति या व्यक्तियों से यह अपेक्षा की जा सके कि वे सिविल न्यायालयों में कोई कार्यवाही आरंभ करे या उसकी पैरवी करे। इसी सिद्धांत के आधार पर इस न्यायालय ने रूदल शाह बनाम बिहार राज्य में प्रतिकर अधिनिर्णीत किया था। इसी प्रकार इस न्यायालय ने भीम सिंह को प्रतिकर अधिनिर्णीत किया था, जिसकी दैहिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार का जम्मू कश्मीर राज्य द्वारा घोर अतिक्रमण हुआ था। यदि हम उन मामलों के तथ्यों का विश्लेषण करे जिनमें इस न्यायालय द्वारा प्रतिकर अधिनिर्णीत किया गया है तो हमें पता चलेगा कि ऐसे सभी मामलों में अतिलंघन का तथ्य विल्कुल स्पष्ट और निर्विवाद था अतिक्रमण गंभीर था तथा उसका विस्तार क्षेत्र इतना अधिक था जो कि न्यायालय की अंतरात्मा को हिला दे और ऐसे व्यक्ति के प्रति, जिसके मूल अधिकार का अतिक्रमण हुआ था घोर अन्याय होता, यदि उसे प्रतिकर का दावा करने के लिए सिविल न्यायालय में जाने की अपेक्षा की जाती।"

अंजनी कुमार बनाम बिहार राज्य 1992 के मामले में याचीगण स्वीकार्यतः शिक्षित व्यक्ति है और वे टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी लिमिटेड के उच्च वेतन प्राप्त करने वाले अधिकारी हैं। इस मामले में यह संभव नहीं है कि उन्हें जो क्षति हुई उसकी ठीक-ठीक राशि का निर्धारण किया जा सके और न तो यही संभव है कि प्रत्येक प्रत्यर्थी द्वारा क्षतिपूर्ति की जाने वाली रकम का विभाजन किया जा सके।

ऐसी स्थिति में यह निदेश दिया जाता है कि राज्य सरकार याचियों को 20,000 रुपये की रकम दाण्डिक खचों के रूप में संदत्त करेगी।

हालांकि राज्य सरकार को चाहिए कि वह प्रत्यर्थी संख्या 3 और 4 अथवा किसी अन्य अधिकारी/अधिकारीगण या कर्मचारी/कर्मचारीगण के व्यक्तिगत दायित्व को सुनिश्चित करने के लिए जांच कराये और न ऐसी जांच के आधार पर राज्य सरकार प्रत्यर्थी संख्या 3 और प्रत्यर्थी संख्या 4 से संयुक्त रूप से पृथक् पृथक् रूप से या / और किसी अन्य व्यक्ति से, जो याचियों को रस्सी से बांधने या उन्हें हथकड़ी लगाने के लिए वस्तुतः दायी पाया जाये ऐसी रकम या रकमों को उनके वेतन से काटने के लिए हकदार होगी।

यह आदेश इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पारित किया जा रहा है कि प्रत्यर्थी संख्या 3 और 4 के अनुसार प्रश्नगत मामलों में पुलिस बल के कुछ अन्य अधिकारियों और/या व्यक्तियों के उत्तरदायी होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। हालांकि हमने यह अभिनिर्धारित किया है कि याचियों के मूल अधिकार का घोर उल्लंघन हुआ है, फिर भी इस बात को ध्यान में रखते हुए आर्थिक रूप से वे कमजोर स्थिति में नहीं है और इस रूप में वे क्षतिपूर्ति के लिए वाद फाइल करने की स्थिति में है इसलिए हमने प्रत्यर्थी संख्या 3 और 4 द्वारा याचियों को संदेय प्रतिकर अधिनिर्णीत नहीं किया।

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