जम्मू और कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट
सह-आरोपी के खिलाफ सप्लीमेंट्री शिकायत आने से NDPS ट्रायल नहीं रोका जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ इसलिए कि किसी सह-आरोपी के खिलाफ बाद में सप्लीमेंट्री शिकायत दाखिल हुई है, ट्रायल कोर्ट NDPS मामले की सुनवाई नहीं रोक सकता।कोर्ट ने कहा कि अगर किसी आरोपी के खिलाफ सबूत और सुनवाई पूरी हो चुकी है, तो ट्रायल कोर्ट को यह तय करना होगा कि नए आरोपी का ट्रायल साथ चलेगा या अलग। अगर अलग ट्रायल जरूरी है, तो मुख्य मामले का फैसला किया जा सकता है।यह टिप्पणी जस्टिस राजनेश ओसवाल की पीठ ने करीब पांच साल से जेल में बंद एक आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान...
फैसले से पहले वैवाहिक अदालतों को सुलह की कोशिश करनी चाहिए, तलाक की याचिकाओं पर आम प्रक्रिया लागू नहीं होती: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत वैवाहिक याचिकाओं पर सुनवाई करने वाली अदालतों को सबसे पहले सुलह की कोशिश करनी चाहिए, जैसा कि अधिनियम की धारा 23(2) और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 32-A की भावना के तहत ज़रूरी है। वे आपसी समझौते की गुंजाइश तलाशे बिना जवाब या आपत्तियां दाखिल करने पर ज़ोर नहीं दे सकतीं।ये टिप्पणियां भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत सुपरवाइज़री अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की गईं। यह...
दैनिक वेतनभोगी और संविदा कर्मी नियमित कर्मचारियों के समान तैनाती का दावा नहीं कर सकते: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि दैनिक वेतनभोगी (Daily Wagers) या संविदा/समेकित वेतन (Consolidated Basis) पर नियुक्त कर्मचारी किसी सरकारी कंपनी के बंद होने के बाद अन्य सरकारी विभागों में तैनाती (Deployment) के लिए नियमित या स्थायी कर्मचारियों के समान अधिकार का दावा नहीं कर सकते।जस्टिस संजय धर की एकल पीठ ने यह फैसला जम्मू एंड कश्मीर सीमेंट लिमिटेड (JKCL) के एक कर्मचारी की याचिका पर सुनाया, जिसमें उसने नियमितीकरण, नियमित वेतनमान, अन्य सरकारी विभाग में तैनाती और बकाया वेतन के भुगतान की...
BNSS का पूरा नाम बताए बिना हिरासत का आधार नहीं बन सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने निरोधात्मक हिरासत आदेश रद्द किया
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि कोई सामान्य नागरिक BNSS का पूरा नाम या अर्थ जानने के लिए बाध्य नहीं है जब तक कि कानून-व्यवस्था से जुड़े अधिकारी और संबंधित मजिस्ट्रेट स्वयं उसका पूरा विवरण न दें। अदालत ने इसी आधार पर एक निरोधात्मक हिरासत आदेश रद्द करते हुए इसे कानून की प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग करार दिया।जस्टिस राहुल भारती की एकल पीठ ने यह फैसला बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में कठुआ के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जम्मू-कश्मीर लोक सुरक्षा...
UAPA के ट्रायल अनिश्चित काल तक नहीं चल सकते, NIA Act की धारा 19 के तहत रोज़ाना सुनवाई ज़रूरी: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने स्पेशल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) के तहत अपराधों से जुड़े ट्रायल को प्राथमिकता दे। कोर्ट ने कहा कि संसद ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम की धारा 19 के ज़रिए ऐसे मामलों में रोज़ाना ट्रायल करने का खास तौर पर आदेश दिया, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि गंभीर अपराधों से जुड़े मुकदमे अनिश्चित काल तक न चलें।जस्टिस वसीम सादिक नरगल ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा,“धारा 19 के पीछे संसद का मकसद साफ और स्पष्ट है। संसद ने...
जम्मू-कश्मीर डेवलपमेंट एक्ट और पंचायती राज एक्ट में बिल्डिंग रेगुलेशन को लेकर कोई टकराव नहीं: हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जम्मू-कश्मीर डेवलपमेंट एक्ट, 1970 और जम्मू-कश्मीर पंचायती राज एक्ट, 1989, के बीच बिल्डिंग बनाने की परमिशन और उनके उल्लंघन के मामले में कोई टकराव नहीं है।कोर्ट ने फैसला दिया कि अगर कोई इलाका किसी ऐसे 'नोटिफाइड एरिया' का हिस्सा है, जिसके लिए जम्मू-कश्मीर लेक्स कंज़र्वेशन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (LCMA) बनाई गई तो सिर्फ़ LCMA के पास ही बिल्डिंग बनाने की परमिशन देने और यह पक्का करने का अधिकार क्षेत्र है कि ऐसी परमिशन के बिना या उसके उल्लंघन में कोई...
डोडा ईस्ट से AAP MLA महराज मलिक को राहत, हाईकोर्ट ने रद्द की निवारक हिरासत
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने डोडा ईस्ट से विधायक महराज दीन मलिक की निवारक हिरासत (Preventive Detention) रद्द की। कोर्ट ने माना कि पब्लिक सेफ्टी एक्ट, 1978 (PSA) का इस्तेमाल उन आरोपों पर आधारित था, जो ज़्यादा से ज़्यादा 'कानून-व्यवस्था' (Law and Order) से जुड़े मामले थे और 'सार्वजनिक व्यवस्था' (Public Order) के लिए ज़रूरी गंभीर खतरे की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।कोर्ट ने फैसला सुनाया कि हिरासत में लेने वाला अधिकारी यह साबित करने में नाकाम रहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति (Detenu) के सार्वजनिक...
चुनाव में गड़बड़ी की अटकलों पर आधारित निवारक हिरासत टिकाऊ नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि संसदीय चुनावों में गड़बड़ी की अटकलों पर आधारित हिरासत का आदेश, बिना किसी सीधे या ठोस सबूत के, 'लाइव नेक्सस' (सीधे जुड़ाव) की शर्त को पूरा करने में नाकाम रहता है और उसे रद्द किया जा सकता है।कोर्ट 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें जम्मू-कश्मीर लोक सुरक्षा अधिनियम, 1978 की धारा 8 के तहत जारी हिरासत आदेश को चुनौती दी गई। इस आदेश में हिरासत में लिए गए व्यक्ति पर राज्य की सुरक्षा के लिए हानिकारक गतिविधियों में...
पति की गर्लफ्रेंड IPC की धारा 498A के तहत 'रिश्तेदार' की परिभाषा से बाहर, क्रूरता का मुकदमा नहीं चल सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पति के साथ शादी के बाहर संबंध रखने वाली महिला रणबीर दंड संहिता (RPC) की धारा 498-A (जो IPC की धारा 498-A के बराबर है) के तहत "रिश्तेदार" नहीं मानी जाएगी। इसलिए उस प्रावधान के तहत उस पर क्रूरता या उत्पीड़न का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।कोर्ट ने एक महिला के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। इस महिला पर पति की प्रेमिका होने का आरोप था और उसे परिवार के अन्य सदस्यों के साथ इस मामले में आरोपी बनाया गया। इस मामले में शिकायतकर्ता पत्नी ने दहेज की...
UAPA: पाकिस्तान से सीधे आतंकी फंडिंग के आरोप में लंबी हिरासत भर से जमानत नहीं- जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि लंबे समय तक जेल में रहना (prolonged incarceration), जब अभियोजन का मामला कमजोर हो और वह केवल अप्रतिपुष्ट (uncorroborated) गवाह के बयान व सह-अभियुक्त के कबूलनामे पर आधारित हो, तो यह UAPA (गैरकानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम, 1967) के तहत भी जमानत देने का आधार बन सकता है, भले ही धारा 43-D(5) की सख्त शर्तें लागू हों।यह मामला उस अपील से जुड़ा था, जो एक आरोपी (A-13) ने NIA कोर्ट, जम्मू द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ दायर की थी। आरोपी पर IPC की...
UAPA के तहत बिना पुष्टि वाले गवाह की गवाही और फ़ोन कॉल के आधार पर ज़मानत से इनकार नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत ज़मानत से तब इनकार नहीं किया जा सकता, जब अभियोजन पक्ष मुख्य रूप से गवाहों के बयानों और बिना पुष्टि वाले फ़ोन कॉल पर निर्भर हो। उसके पास ऐसा कोई सामान या सबूत न हो जिससे पहली नज़र में आरोपी की संलिप्तता साबित होती हो।कोर्ट NIA Act की धारा 21 के तहत दायर एक अपील पर सुनवाई कर रहा था। इस अपील में NIA के स्पेशल जज, जम्मू के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें IPC की धारा 120-B, NDPS Act की धारा 8/21,...
मजिस्ट्रेट संज्ञान लेने के बाद के चरण में भी CrPC की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच का निर्देश दे सकते हैं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि एक मजिस्ट्रेट या विशेष अदालत के पास ऐसे मामले में आगे की जांच का निर्देश देने की शक्ति है, जहां की गई जांच में कोई कमी हो या कुछ पहलुओं की ठीक से जांच न की गई हो। ऐसा निर्देश संज्ञान लेने के बाद भी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 173(8) का प्रयोग करते हुए जारी किया जा सकता है।अदालत एक पूर्व नायब तहसीलदार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें जम्मू के स्पेशल जज (भ्रष्टाचार निरोधक) द्वारा पारित...
ऐतिहासिक किताबों से संपत्ति का हक साबित नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि ऐतिहासिक किताबों या दस्तावेजों के आधार पर किसी संपत्ति का मालिकाना हक (title) साबित नहीं किया जा सकता।जस्टिस संजय धर की पीठ ने कहा कि Indian Evidence Act, 1872 की धारा 57 के तहत कोर्ट केवल “सार्वजनिक इतिहास” (public history) के मामलों में संदर्भ पुस्तकों का सहारा ले सकती है, न कि निजी या स्थानीय विवादों में।क्या था मामला?मामला किश्तवाड़ स्थित दो दरगाहों—जियारत फरीद-उद-दीन साहिब और जियारत अस्रार-उद-दीन साहिब—की संपत्तियों से...
सिर्फ़ गाली देना या जाति का नाम लेना SC/ST Act के तहत अपराध नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) की धारा 3(1)(s) के तहत अपराध साबित होने के लिए यह काफ़ी नहीं कि आरोपी सिर्फ़ किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को गाली दे या सिर्फ़ जाति का नाम ले। कोर्ट ने साफ़ किया कि ज़रूरी शर्त यह है कि आरोपी किसी सार्वजनिक जगह पर, जहाँ लोग देख सकें, ऐसे सदस्य को "जाति के नाम से" गाली दे।जस्टिस राजेश सेखरी की बेंच ने टिप्पणी की,"...ऊपर कही गई बातों से यह साफ़ है कि...
बिना क्रॉस एक्जामिनेशन के प्रारंभिक जांच के सबूत विभागीय निष्कर्षों का आधार नहीं बन सकते: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर हाउसिंग बोर्ड के कर्मचारी के खिलाफ पारित बर्खास्तगी आदेश रद्द किया। कोर्ट ने माना कि अनुशासनात्मक कार्यवाही दोषपूर्ण थी, क्योंकि जांच अधिकारी ने प्रारंभिक जांच के दौरान दर्ज किए गए बयानों पर भरोसा किया, जबकि दोषी कर्मचारी को गवाहों से जिरह करने का अवसर नहीं दिया गया।कोर्ट ने दोहराया कि प्रारंभिक जांच से मिले सबूतों का इस्तेमाल नियमित विभागीय जांच में नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।कोर्ट एक...
जांच के आदेश के बाद उसी सामग्री पर समन जारी नहीं कर सकता मजिस्ट्रेट: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि मजिस्ट्रेट प्रारंभिक साक्ष्य से संतुष्ट नहीं होकर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 202 के तहत जांच का आदेश देता है तो वह बाद में उसी सामग्री के आधार पर आरोपियों को समन जारी नहीं कर सकता।जस्टिस संजय धर ने कहा,“जब मजिस्ट्रेट प्रारंभिक साक्ष्य से संतुष्ट नहीं होता और जांच का आदेश देता है तो यह स्पष्ट है कि उपलब्ध सामग्री पर्याप्त नहीं है। ऐसे में बिना किसी नए साक्ष्य के उसी आधार पर समन जारी करना उचित नहीं है।” मामला सुंदरबनी के...
आतंक गतिविधियों में इस्तेमाल वाहन का कब्जा छोड़ने वाला पंजीकृत मालिक उसकी रिहाई नहीं मांग सकता: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट:
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी वाहन के पंजीकृत मालिक ने पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए वाहन का कब्जा किसी आरोपी को सौंप दिया है, तो वह बाद में उस वाहन की रिहाई के लिए दावा नहीं कर सकता, खासकर तब जब वाहन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में हुआ हो।यह फैसला जस्टिस सिंधु शर्मा और जस्टिस शहजाद अजीम की खंडपीठ ने एक अपील खारिज करते हुए सुनाया। यह अपील राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम, 2008 की धारा 21 के तहत दायर की गई थी, जिसमें विशेष NIA अदालत, कुपवाड़ा के उस आदेश को...
'आतंकवादियों से संपर्क' की झूठी खबर का मामला: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने दैनिक जागरण के 'संपादकीय' मामलों के जानकार के खिलाफ दी केस की अनुमति
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाई कोर्ट ने साफ़ किया कि मानहानि का अपराध सिर्फ़ उन मामलों तक सीमित नहीं है, जहां कोई व्यक्ति किसी दूसरे की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का इरादा रखता हो। कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि रणबीर दंड संहिता (RPC) की धारा 499 उन स्थितियों को भी अपने दायरे में लेती है, जहां कोई व्यक्ति यह जानते हुए या यह मानने का उचित कारण रखते हुए कोई आरोप प्रकाशित करता है कि ऐसा आरोप किसी दूसरे व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाएगा।जस्टिस संजय धर ने यह टिप्पणी एक अख़बार में छपी ख़बर से जुड़ी...
जम्मू-कश्मीर पुलिस नियम | पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत की रिपोर्ट ज़िला मजिस्ट्रेट को न देने से कार्यवाही रद्द हो जाती है: हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख के हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जम्मू-कश्मीर पुलिस नियमों के नियम 349 में दिए गए प्रावधान अनिवार्य हैं, और जब तक किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत का सार - जिस पर अपनी ड्यूटी के दौरान रणबीर दंड संहिता के तहत अपराध करने का आरोप है - ज़िला मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट नहीं किया जाता, तब तक पुलिस या मजिस्ट्रेट द्वारा शुरू की गई कार्यवाही अमान्य हो जाएगी।कोर्ट एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें किश्तवाड़ के सेशन जज द्वारा पारित आदेश रद्द करने की मांग की गई। इस आदेश के तहत...
अनुकंपा आधार पर उच्च पद की नियुक्ति अधिकार नहीं, सरकार का विवेकाधीन अधिकार : जम्मू-कश्मीर-लद्दाख हाइकोर्ट
जम्मू-कश्मीर-लद्दाख हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अनुकंपा आधार पर उच्च पद पर नियुक्ति किसी व्यक्ति का अधिकार नहीं होती बल्कि यह पूरी तरह सरकार का विवेकाधीन अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में नियुक्ति केवल नियमों के अनुसार ही दी जा सकती है और इसे अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता।जस्टिस सिंधु शर्मा और जस्टिस शहजाद अजीम की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन की अपील स्वीकार की और एकल पीठ का आदेश रद्द किया, जिसमें याचिकाकर्ता को पहले की तारीख से...















