जम्मू और कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट
एयर फ़ोर्स से जम्मू-कश्मीर एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज़: सिविल सर्विस करियर बनाने के लिए नियम तोड़ने वाले एयरमैन को हाईकोर्ट ने दी राहत
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने एयरमैन को राहत दी, जो एयर फ़ोर्स से पहले डिस्चार्ज हुए बिना जम्मू एंड कश्मीर एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस में शामिल हो गया। कोर्ट ने कहा कि खास हालात में सर्विस नियमों को सख्ती से लागू करने के लिए सही बातों का ध्यान रखना चाहिए।कोर्ट रिट याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें याचिकाकर्ता की एयर फ़ोर्स सर्विस से डिस्चार्ज की रिक्वेस्ट को खारिज करने को चुनौती दी गई और उसे जम्मू-कश्मीर एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस में ऑफिसर के तौर पर काम करते रहने की इजाज़त देने के लिए निर्देश...
CAPF भर्ती में मेडिकल बोर्ड की राय आखिरी, कोर्ट गलत इरादे या प्रोसेस में कमी के अलावा अपील नहीं कर सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स (CAPFs) की भर्ती के मामलों में कोर्ट के दखल की सीमित गुंजाइश पर ज़ोर देते हुए जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि रिव्यू मेडिकल बोर्ड का फैसला आखिरी है और प्रोसेस में गलती या गलत इरादे जैसी खास स्थितियों को छोड़कर कोर्ट द्वारा आगे रिव्यू या दोबारा जांच नहीं की जा सकती।कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि CAPFs की भर्ती को कंट्रोल करने वाला कानूनी ढांचा दूसरी मेडिकल जांच के बाद दी गई मेडिकल राय को आखिरी दर्जा देता है। कोर्ट को ऐसे एक्सपर्ट फैसलों को बदलने में धीमा...
'बच्चे के जेल में लगातार रहने से उसकी पर्सनैलिटी डेवलपमेंट पर असर पड़ सकता है': जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 12 साल की कस्टडी के बाद मां को जमानत दी
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने किडनैपिंग और मर्डर केस में आरोपी महिला को जमानत दी, जो बारह साल से ज़्यादा समय तक कस्टडी में रही थी। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल में देरी और इस हालात को देखते हुए कि उसका नाबालिग बच्चा जेल में उसके साथ रह रहा था, उसे लगातार जेल में रखना गलत था।कोर्ट ने जमानत आवेदन पर विचार करते हुए कहा कि बच्चे का जेल में लगातार रहना उसकी पर्सनैलिटी डेवलपमेंट पर असर डाल सकता है, इसलिए यह जमानत देने का एक और आधार बनता है।जस्टिस संजय धर की सिंगल जज बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद...
अतीत के आधार पर अनवरत कैद उचित नहीं: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट ने पूर्व हिजबुल मुजाहिद्दीन सदस्य को दी जमानत
जम्मू कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र सुनवाई के संवैधानिक अधिकार को पुनः रेखांकित करते हुए कहा कि किसी आरोपी के पूर्व आचरण के आधार पर जिसके लिए वह पहले ही अभियोजन और हिरासत झेल चुका हो उसे वर्तमान मामले में अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता, जब तक उसके खिलाफ विश्वसनीय और प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध न हों।जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए अब्दुल राशिद की जमानत अपील स्वीकार की और NIA कोर्ट जम्मू द्वारा पारित जमानत...
एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल पंचायत का कबूलनामा, सह-आरोपी के खिलाफ तब तक कोई सबूत नहीं, जब तक उसे सख्ती से साबित और पक्का न किया जाए: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
क्रिमिनल ज्यूरिस्प्रूडेंस के इस मुख्य सिद्धांत को मज़बूत करते हुए कि मजिस्ट्रेट के सामने रिकॉर्ड नहीं किया गया कबूलनामा कोई ठोस सबूत नहीं होता और अपने आप में किसी सह-आरोपी को दोषी ठहराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने बरी किए जाने के खिलाफ क्रिमिनल अपील यह कहते हुए खारिज की कि कथित पंचायत का कबूलनामा, जो बरी करने वाला, बिना साबित और बिना पुष्टि वाला है, दोषसिद्धि को बनाए नहीं रख सकता है।जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने पुष्टि की...
बिना मदद वाले स्कूल के खिलाफ प्राइवेट सर्विस कॉन्ट्रैक्ट लागू करने के लिए रिट मेंटेनेबल नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने माना कि संविधान के आर्टिकल 226 के तहत रिट याचिका एक टीचर और एक प्राइवेट बिना मदद वाले स्कूल के बीच प्राइवेट कॉन्ट्रैक्ट से पैदा होने वाले सर्विस से जुड़े अधिकारों को लागू करने के लिए मेंटेनेबल नहीं है।जस्टिस संजय धर की बेंच ने दोहराया कि हालांकि प्राइवेट एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन कुछ हालात में रिट जूरिस्डिक्शन के लिए योग्य हो सकते हैं, ज्यूडिशियल रिव्यू सिर्फ पब्लिक लॉ एलिमेंट वाले कामों तक ही लिमिटेड होगा।कॉन्ट्रैक्ट वाली सर्विस शर्तों से पैदा होने वाले पूरी तरह से प्राइवेट...
पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के पास पुलिस की रिक्वेस्ट के बिना पुलिस रिमांड मांगने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
यह मानते हुए कि एक पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के पास CrPC की धारा 167 के तहत पुलिस रिमांड मांगने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है, जब तक कि ऐसी रिक्वेस्ट इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी से न आए, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पुलिस कस्टडी पुलिस द्वारा बताई गई जांच की ज़रूरत पर आधारित होनी चाहिए, न कि प्रॉसिक्यूशन के विवेक पर।जस्टिस संजय परिहार ने राज्य द्वारा दायर क्रिमिनल रिवीजन खारिज करते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि एक बार चार्जशीट दायर हो जाने के बाद इसका मतलब यह होता है कि कस्टडी में...
पूर्वक्रय का अधिकार अत्यंत कमजोर बिना दावा किए निषेधाज्ञा वाद दायर करना अधिकार का परित्याग माना जाएगा: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्वक्रय (प्री-एम्पशन) का अधिकार एक अत्यंत कमजोर अधिकार है, जिसे खरीदार विधिसम्मत तरीकों से विफल कर सकता है और जिसे पूर्वक्रेता अपने आचरण के माध्यम से भी त्याग सकता है।हाइकोर्ट ने वर्ष 2001 में जिला जज, पुंछ द्वारा पारित उस निर्णय और डिक्री को निरस्त कर दिया, जिसमें वादी के पक्ष में पूर्वक्रय अधिकार लागू करते हुए संपत्ति का कब्जा 40,000 के भुगतान पर सौंपने का आदेश दिया गया।जस्टिस संजय धर ने कहा कि यदि कोई पूर्वक्रेता बिक्री की जानकारी होने के...
S. 37 NDPS Act | BSA के तहत 'उचित आधार' का मतलब 'साबित' होना नहीं, यह जमानत की शक्ति को खत्म कर देगा: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस एक्ट (NDPS Act) के तहत सख्त जमानत प्रावधानों की व्याख्या करते हुए जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने साफ किया कि धारा 37 में इस्तेमाल किया गया शब्द "उचित आधार" का मतलब भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत 'साबित' होना नहीं माना जा सकता।कोर्ट ने चेतावनी दी कि "उचित आधार" को BSA के तहत सबूत के मानक के बराबर मानने से ट्रायल के दौरान जमानत देने की कोर्ट की शक्ति 'खत्म' हो जाएगी।जस्टिस मोहम्मद यूसुफ वानी की बेंच ने समझाया कि यह वाक्यांश बीच का रास्ता है, जो सिर्फ...
NI Act की धारा 138 मामलों में पूर्व-संज्ञान सुनवाई अनिवार्य नहीं: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने चेक बाउंस से जुड़े एक मामले में अहम फैसला देते हुए कहा कि परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत कार्यवाही में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 के अंतर्गत पूर्व-संज्ञान (प्री-कॉग्निजेंस) स्तर पर आरोपी को सुनवाई देना अनिवार्य नहीं है।हाइकोर्ट ने इसी आधार पर कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चेक बाउंस की शिकायत दर्ज होने के बाद आरोपी द्वारा सिविल मुकदमा या समानांतर आपराधिक...
नियोक्ता अपनी गलतियों को छिपाने के लिए रिटायरमेंट के बाद सर्विस बुक में बदलाव नहीं कर सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने रिटायर व्यक्ति से रिकवरी रद्द की
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि कोई भी नियोक्ता अपनी गलतियों को छिपाने के लिए रिटायरमेंट के बाद किसी कर्मचारी के नुकसान के लिए सर्विस रिकॉर्ड में बदलाव नहीं कर सकता, खासकर तब जब कर्मचारी सर्विस बुक बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार नहीं था और यह मामला कोर्ट के पहले के फैसले से सुलझ चुका था।कोर्ट जम्मू डेवलपमेंट अथॉरिटी के एक पूर्व कर्मचारी की सर्विस बुक एंट्री में बदलाव और लोकल फंड ऑडिट और पेंशन विभाग द्वारा जारी कम्युनिकेशन के बाद रिटायरमेंट के बाद के फायदों से रिकवरी को चुनौती...
चेक जारी करने वाले द्वारा पेमेंट रोकने के लिए किए गए बड़े बदलाव पर NI Act की धारा 138 लागू होगी; 'बदलाव किसने किया' यह जांच का विषय: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
इस बात पर ज़ोर देते हुए कि चेक में किया गया कोई बड़ा बदलाव अपने आप में आरोपी को आपराधिक ज़िम्मेदारी से बरी नहीं करता, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) के तहत निर्णायक कारक सिर्फ़ बदलाव की मौजूदगी नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति की पहचान है जिसने वह बदलाव किया।जस्टिस संजय धर की बेंच ने फैसला सुनाया कि जहां पेमेंट रोकने और धारा 138 के तहत कार्यवाही को नाकाम करने के लिए खुद ड्रॉअर द्वारा बदलाव किया जाता है, वहां मुक़दमे को शुरुआती दौर में ही खत्म नहीं किया...
दुष्कर्म के मामलों में सुनवाई की समयसीमा 'पीड़ित के न्याय' के लिए, आरोपी को खुद-ब-खुद जमानत मिलने का आधार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 309 के तहत दुष्कर्म के मुकदमों को दो महीने में पूरा करने का प्रावधान पीड़िता को 'त्वरित न्याय' दिलाने के लिए बनाया गया। इसे आरोपी द्वारा देरी के आधार पर 'ऑटोमैटिक बेल' (स्वचालित जमानत) पाने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।जस्टिस संजय धर की पीठ ने एक 13 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म के आरोपी दो व्यक्तियों की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।क्या...
जम्मू-कश्मीर सिविल सर्विसेज़ (विशेष प्रावधान) अधिनियम के तहत पिछली तारीख से नियमितीकरण नहीं: हाइकोर्ट
जम्मू–कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने सेवा मामलों में बार-बार उठने वाले एक अहम सवाल पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि केवल निर्धारित सेवा अवधि पूरी कर लेने मात्र से किसी कर्मचारी को पिछली तारीख से नियमितीकरण का अधिकार नहीं मिल जाता। हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जम्मू एंड कश्मीर सिविल सर्विसेज़ (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2010 के तहत नियमितीकरण केवल भविष्य प्रभाव से ही किया जा सकता है, भले ही कर्मचारी ने निर्धारित योग्यता अवधि पहले ही पूरी कर ली हो।जस्टिस संजय धर ने जम्मू-कश्मीर पावर डेवलपमेंट...
जिले से बाहर विवाह करने पर स्थानीय निवासी आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि जो उम्मीदवार विवाह के बाद संबंधित जिले से बाहर निवास करता है, वह सार्वजनिक भर्ती में स्थानीय निवासी के आधार पर वरीयता का दावा नहीं कर सकता, जब तक कि वह ठोस और विश्वसनीय दस्तावेजों के माध्यम से अपने स्थानीय निवास को सिद्ध न करे।जस्टिस जावेद इकबाल वानी की पीठ ने यह निर्णय एक महिला अभ्यर्थी की याचिका पर सुनाया, जिसमें उसने दावा किया कि विवाह के बावजूद वह अपने मायके के गांव में ही निवास कर रही है। इसलिए उसे स्थानीय निवासी के रूप...
डेपुटेशन अनुभव के आधार पर बराबर पद के दावे को नहीं रोकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि मूल विभाग में मिले अनुभव को उधार लेने वाले संगठन में बराबर पद तय करते समय नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।जस्टिस जावेद इकबाल वानी की बेंच ने कहा कि यह बात कि डेपुटेशन पर आया व्यक्ति उधार लेने वाले विभाग में बराबर पद नहीं मांग सकता, गलतफहमी वाली, साफ तौर पर गलत, अनुचित, तर्कहीन और भेदभावपूर्ण है।याचिकाकर्ता प्रतिवादी नंबर 7 का स्थायी कर्मचारी है। वह असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (डिग्री धारक) के रूप में काम कर रहा था। अक्टूबर, 2016 में उसे CVPPL में डेपुटेशन पर भेजा...
सर्विस रिकॉर्ड के बिना खराब प्रतिष्ठा के आधार पर लगाए गए आरोपों से समय से पहले रिटायरमेंट का आदेश कायम नहीं रह सकता: जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी को सिर्फ़ उसकी खराब प्रतिष्ठा के बारे में अस्पष्ट और बिना सबूत के आरोपों के आधार पर समय से पहले रिटायर नहीं किया जा सकता, खासकर जब ऐसे ऑब्ज़र्वेशन सर्विस रिकॉर्ड के किसी ठोस सबूत से समर्थित न हों।जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने समय से पहले रिटायरमेंट का आदेश रद्द करने वाले रिट कोर्ट का फैसला बरकरार रखा।कोर्ट ने अपने सामने रखे गए रिकॉर्ड की जांच की और पाया कि स्क्रीनिंग कमेटी और सक्षम अथॉरिटी ने कर्मचारी के FIR में...
गैर-जमानती मामलों में आरोपी महिलाएं अलग श्रेणी; CrPC की धारा 437 की कठोरता से बंधे नहीं रह सकते न्यायालय: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने यह दोहराया कि गैर-जमानती अपराधों में आरोपी महिलाएं एक विशिष्ट श्रेणी बनाती हैं और उनकी जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय न्यायालयों को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 437 की कठोरता तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अदालत ने हत्या के एक मामले में तीन महिला विचाराधीन बंदियों को जमानत देते हुए कहा कि CrPC की धारा 437(1) का प्रावधान मात्र औपचारिक नहीं बल्कि मानवीय विधायी मंशा को दर्शाता है, जिसे न्यायिक विवेक में वास्तविक रूप से लागू किया जाना चाहिए।जस्टिस राहुल भारती...
अनुच्छेद 16 का उल्लंघन: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने निवास-आधारित आरक्षण रद्द किया
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट भर्ती विज्ञापन के एक क्लॉज़ को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जो निवास के आधार पर जिला कैडर पदों के लिए पात्रता को सीमित करता था।जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की,"जहां चयन प्रक्रिया विज्ञापन नोटिफिकेशन में नियमों या शर्तों के अनुसार आयोजित की गई, जिससे भेदभावपूर्ण परिणाम निकलते हैं तो यह उस उम्मीदवार की चुनौती से मुक्त नहीं है, जिसने इसमें भाग लिया।"ये टिप्पणियां सांबा जिले के एक अनुसूचित जाति के उम्मीदवार बलविंदर कुमार...
स्पीडी ट्रायल का अधिकार अपीलों पर भी लागू: विलंब के आधार पर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 46 वर्ष पुराने आपराधिक मामले का किया निपटारा
लंबे समय तक चलने वाली आपराधिक कार्यवाही के मानवीय प्रभावों को रेखांकित करते हुए, जम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने 1979 की एक घटना से संबंधित आपराधिक मामले का अंत किया और यह माना कि अब आगे सज़ा को जारी रखना किसी भी सार्थक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा।जस्टिस संजय परिहार ने 2009 से लंबित आपराधिक अपील का निर्णय सुनाते हुए, अत्यधिक विलंब, अभिय appellant की आयु और शारीरिक दुर्बलता, तथा दंड के सुधारात्मक उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए सज़ा को पहले से भुगती हुई माना।सुनवाई की शुरुआत में ही...












