जम्मू और कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट

पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के पास पुलिस की रिक्वेस्ट के बिना पुलिस रिमांड मांगने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के पास पुलिस की रिक्वेस्ट के बिना पुलिस रिमांड मांगने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

यह मानते हुए कि एक पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के पास CrPC की धारा 167 के तहत पुलिस रिमांड मांगने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है, जब तक कि ऐसी रिक्वेस्ट इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी से न आए, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पुलिस कस्टडी पुलिस द्वारा बताई गई जांच की ज़रूरत पर आधारित होनी चाहिए, न कि प्रॉसिक्यूशन के विवेक पर।जस्टिस संजय परिहार ने राज्य द्वारा दायर क्रिमिनल रिवीजन खारिज करते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि एक बार चार्जशीट दायर हो जाने के बाद इसका मतलब यह होता है कि कस्टडी में...

पूर्वक्रय का अधिकार अत्यंत कमजोर बिना दावा किए निषेधाज्ञा वाद दायर करना अधिकार का परित्याग माना जाएगा: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट
पूर्वक्रय का अधिकार अत्यंत कमजोर बिना दावा किए निषेधाज्ञा वाद दायर करना अधिकार का परित्याग माना जाएगा: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्वक्रय (प्री-एम्पशन) का अधिकार एक अत्यंत कमजोर अधिकार है, जिसे खरीदार विधिसम्मत तरीकों से विफल कर सकता है और जिसे पूर्वक्रेता अपने आचरण के माध्यम से भी त्याग सकता है।हाइकोर्ट ने वर्ष 2001 में जिला जज, पुंछ द्वारा पारित उस निर्णय और डिक्री को निरस्त कर दिया, जिसमें वादी के पक्ष में पूर्वक्रय अधिकार लागू करते हुए संपत्ति का कब्जा 40,000 के भुगतान पर सौंपने का आदेश दिया गया।जस्टिस संजय धर ने कहा कि यदि कोई पूर्वक्रेता बिक्री की जानकारी होने के...

S. 37 NDPS Act | BSA के तहत उचित आधार का मतलब साबित होना नहीं, यह जमानत की शक्ति को खत्म कर देगा: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
S. 37 NDPS Act | BSA के तहत 'उचित आधार' का मतलब 'साबित' होना नहीं, यह जमानत की शक्ति को खत्म कर देगा: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस एक्ट (NDPS Act) के तहत सख्त जमानत प्रावधानों की व्याख्या करते हुए जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने साफ किया कि धारा 37 में इस्तेमाल किया गया शब्द "उचित आधार" का मतलब भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत 'साबित' होना नहीं माना जा सकता।कोर्ट ने चेतावनी दी कि "उचित आधार" को BSA के तहत सबूत के मानक के बराबर मानने से ट्रायल के दौरान जमानत देने की कोर्ट की शक्ति 'खत्म' हो जाएगी।जस्टिस मोहम्मद यूसुफ वानी की बेंच ने समझाया कि यह वाक्यांश बीच का रास्ता है, जो सिर्फ...

नियोक्ता अपनी गलतियों को छिपाने के लिए रिटायरमेंट के बाद सर्विस बुक में बदलाव नहीं कर सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने रिटायर व्यक्ति से रिकवरी रद्द की
नियोक्ता अपनी गलतियों को छिपाने के लिए रिटायरमेंट के बाद सर्विस बुक में बदलाव नहीं कर सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने रिटायर व्यक्ति से रिकवरी रद्द की

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि कोई भी नियोक्ता अपनी गलतियों को छिपाने के लिए रिटायरमेंट के बाद किसी कर्मचारी के नुकसान के लिए सर्विस रिकॉर्ड में बदलाव नहीं कर सकता, खासकर तब जब कर्मचारी सर्विस बुक बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार नहीं था और यह मामला कोर्ट के पहले के फैसले से सुलझ चुका था।कोर्ट जम्मू डेवलपमेंट अथॉरिटी के एक पूर्व कर्मचारी की सर्विस बुक एंट्री में बदलाव और लोकल फंड ऑडिट और पेंशन विभाग द्वारा जारी कम्युनिकेशन के बाद रिटायरमेंट के बाद के फायदों से रिकवरी को चुनौती...

चेक जारी करने वाले द्वारा पेमेंट रोकने के लिए किए गए बड़े बदलाव पर NI Act की धारा 138 लागू होगी; बदलाव किसने किया यह जांच का विषय: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
चेक जारी करने वाले द्वारा पेमेंट रोकने के लिए किए गए बड़े बदलाव पर NI Act की धारा 138 लागू होगी; 'बदलाव किसने किया' यह जांच का विषय: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

इस बात पर ज़ोर देते हुए कि चेक में किया गया कोई बड़ा बदलाव अपने आप में आरोपी को आपराधिक ज़िम्मेदारी से बरी नहीं करता, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) के तहत निर्णायक कारक सिर्फ़ बदलाव की मौजूदगी नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति की पहचान है जिसने वह बदलाव किया।जस्टिस संजय धर की बेंच ने फैसला सुनाया कि जहां पेमेंट रोकने और धारा 138 के तहत कार्यवाही को नाकाम करने के लिए खुद ड्रॉअर द्वारा बदलाव किया जाता है, वहां मुक़दमे को शुरुआती दौर में ही खत्म नहीं किया...

दुष्कर्म के मामलों में सुनवाई की समयसीमा पीड़ित के न्याय के लिए, आरोपी को खुद-ब-खुद जमानत मिलने का आधार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट
दुष्कर्म के मामलों में सुनवाई की समयसीमा 'पीड़ित के न्याय' के लिए, आरोपी को खुद-ब-खुद जमानत मिलने का आधार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 309 के तहत दुष्कर्म के मुकदमों को दो महीने में पूरा करने का प्रावधान पीड़िता को 'त्वरित न्याय' दिलाने के लिए बनाया गया। इसे आरोपी द्वारा देरी के आधार पर 'ऑटोमैटिक बेल' (स्वचालित जमानत) पाने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।जस्टिस संजय धर की पीठ ने एक 13 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म के आरोपी दो व्यक्तियों की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।क्या...

जम्मू-कश्मीर सिविल सर्विसेज़ (विशेष प्रावधान) अधिनियम के तहत पिछली तारीख से नियमितीकरण नहीं: हाइकोर्ट
जम्मू-कश्मीर सिविल सर्विसेज़ (विशेष प्रावधान) अधिनियम के तहत पिछली तारीख से नियमितीकरण नहीं: हाइकोर्ट

जम्मू–कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने सेवा मामलों में बार-बार उठने वाले एक अहम सवाल पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि केवल निर्धारित सेवा अवधि पूरी कर लेने मात्र से किसी कर्मचारी को पिछली तारीख से नियमितीकरण का अधिकार नहीं मिल जाता। हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जम्मू एंड कश्मीर सिविल सर्विसेज़ (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2010 के तहत नियमितीकरण केवल भविष्य प्रभाव से ही किया जा सकता है, भले ही कर्मचारी ने निर्धारित योग्यता अवधि पहले ही पूरी कर ली हो।जस्टिस संजय धर ने जम्मू-कश्मीर पावर डेवलपमेंट...

जिले से बाहर विवाह करने पर स्थानीय निवासी आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट
जिले से बाहर विवाह करने पर स्थानीय निवासी आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि जो उम्मीदवार विवाह के बाद संबंधित जिले से बाहर निवास करता है, वह सार्वजनिक भर्ती में स्थानीय निवासी के आधार पर वरीयता का दावा नहीं कर सकता, जब तक कि वह ठोस और विश्वसनीय दस्तावेजों के माध्यम से अपने स्थानीय निवास को सिद्ध न करे।जस्टिस जावेद इकबाल वानी की पीठ ने यह निर्णय एक महिला अभ्यर्थी की याचिका पर सुनाया, जिसमें उसने दावा किया कि विवाह के बावजूद वह अपने मायके के गांव में ही निवास कर रही है। इसलिए उसे स्थानीय निवासी के रूप...

डेपुटेशन अनुभव के आधार पर बराबर पद के दावे को नहीं रोकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
डेपुटेशन अनुभव के आधार पर बराबर पद के दावे को नहीं रोकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि मूल विभाग में मिले अनुभव को उधार लेने वाले संगठन में बराबर पद तय करते समय नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।जस्टिस जावेद इकबाल वानी की बेंच ने कहा कि यह बात कि डेपुटेशन पर आया व्यक्ति उधार लेने वाले विभाग में बराबर पद नहीं मांग सकता, गलतफहमी वाली, साफ तौर पर गलत, अनुचित, तर्कहीन और भेदभावपूर्ण है।याचिकाकर्ता प्रतिवादी नंबर 7 का स्थायी कर्मचारी है। वह असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (डिग्री धारक) के रूप में काम कर रहा था। अक्टूबर, 2016 में उसे CVPPL में डेपुटेशन पर भेजा...

सर्विस रिकॉर्ड के बिना खराब प्रतिष्ठा के आधार पर लगाए गए आरोपों से समय से पहले रिटायरमेंट का आदेश कायम नहीं रह सकता: जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट
सर्विस रिकॉर्ड के बिना खराब प्रतिष्ठा के आधार पर लगाए गए आरोपों से समय से पहले रिटायरमेंट का आदेश कायम नहीं रह सकता: जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी को सिर्फ़ उसकी खराब प्रतिष्ठा के बारे में अस्पष्ट और बिना सबूत के आरोपों के आधार पर समय से पहले रिटायर नहीं किया जा सकता, खासकर जब ऐसे ऑब्ज़र्वेशन सर्विस रिकॉर्ड के किसी ठोस सबूत से समर्थित न हों।जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने समय से पहले रिटायरमेंट का आदेश रद्द करने वाले रिट कोर्ट का फैसला बरकरार रखा।कोर्ट ने अपने सामने रखे गए रिकॉर्ड की जांच की और पाया कि स्क्रीनिंग कमेटी और सक्षम अथॉरिटी ने कर्मचारी के FIR में...

गैर-जमानती मामलों में आरोपी महिलाएं अलग श्रेणी; CrPC की धारा 437 की कठोरता से बंधे नहीं रह सकते न्यायालय: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
गैर-जमानती मामलों में आरोपी महिलाएं अलग श्रेणी; CrPC की धारा 437 की कठोरता से बंधे नहीं रह सकते न्यायालय: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने यह दोहराया कि गैर-जमानती अपराधों में आरोपी महिलाएं एक विशिष्ट श्रेणी बनाती हैं और उनकी जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय न्यायालयों को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 437 की कठोरता तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अदालत ने हत्या के एक मामले में तीन महिला विचाराधीन बंदियों को जमानत देते हुए कहा कि CrPC की धारा 437(1) का प्रावधान मात्र औपचारिक नहीं बल्कि मानवीय विधायी मंशा को दर्शाता है, जिसे न्यायिक विवेक में वास्तविक रूप से लागू किया जाना चाहिए।जस्टिस राहुल भारती...

अनुच्छेद 16 का उल्लंघन: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने निवास-आधारित आरक्षण रद्द किया
अनुच्छेद 16 का उल्लंघन: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने निवास-आधारित आरक्षण रद्द किया

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट भर्ती विज्ञापन के एक क्लॉज़ को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जो निवास के आधार पर जिला कैडर पदों के लिए पात्रता को सीमित करता था।जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की,"जहां चयन प्रक्रिया विज्ञापन नोटिफिकेशन में नियमों या शर्तों के अनुसार आयोजित की गई, जिससे भेदभावपूर्ण परिणाम निकलते हैं तो यह उस उम्मीदवार की चुनौती से मुक्त नहीं है, जिसने इसमें भाग लिया।"ये टिप्पणियां सांबा जिले के एक अनुसूचित जाति के उम्मीदवार बलविंदर कुमार...

स्पीडी ट्रायल का अधिकार अपीलों पर भी लागू: विलंब के आधार पर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 46 वर्ष पुराने आपराधिक मामले का किया निपटारा
स्पीडी ट्रायल का अधिकार अपीलों पर भी लागू: विलंब के आधार पर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 46 वर्ष पुराने आपराधिक मामले का किया निपटारा

लंबे समय तक चलने वाली आपराधिक कार्यवाही के मानवीय प्रभावों को रेखांकित करते हुए, जम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने 1979 की एक घटना से संबंधित आपराधिक मामले का अंत किया और यह माना कि अब आगे सज़ा को जारी रखना किसी भी सार्थक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा।जस्टिस संजय परिहार ने 2009 से लंबित आपराधिक अपील का निर्णय सुनाते हुए, अत्यधिक विलंब, अभिय appellant की आयु और शारीरिक दुर्बलता, तथा दंड के सुधारात्मक उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए सज़ा को पहले से भुगती हुई माना।सुनवाई की शुरुआत में ही...

वैवाहिक उपाय एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं, पर क्रूरता के आरोप चुनिंदा रूप से नहीं उभर सकते: हाईकोर्ट ने धारा 498-A की FIR रद्द की
वैवाहिक उपाय एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं, पर क्रूरता के आरोप चुनिंदा रूप से नहीं उभर सकते: हाईकोर्ट ने धारा 498-A की FIR रद्द की

जम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने यह माना है कि धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 तथा धारा 498-A आईपीसी के तहत चलने वाली कार्यवाही को हमेशा अलग-अलग और सख्ती से विभाजित रखना आवश्यक नहीं है, क्योंकि दहेज माँग, मानसिक क्रूरता, शारीरिक उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से जुड़ी शिकायतें प्रायः आपस में जुड़ी होती हैं। हालाँकि, न्यायमूर्ति संजय परिहार ने यह स्पष्ट किया कि यदि पत्नी किसी घरेलू उत्पीड़न का दावा करती है, तो ऐसे आरोप सामान्यतः सभी समानांतर कार्यवाहियों में...

चेक बाउंस मामलों में समझौते के बाद मजिस्ट्रेट निष्पादन अदालत की भूमिका नहीं निभा सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
चेक बाउंस मामलों में समझौते के बाद मजिस्ट्रेट निष्पादन अदालत की भूमिका नहीं निभा सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) के तहत चेक बाउंस से जुड़े मामलों में यदि पक्षकारों के बीच वैध समझौता दर्ज हो जाता है तो ट्रायल मजिस्ट्रेट का कर्तव्य केवल उस समझौते के अनुरूप शिकायत का निपटारा करना है। इसके बाद मजिस्ट्रेट न तो समझौते के पालन की निगरानी कर सकता है और न ही उसे लागू कराने के लिए निष्पादन अदालत की तरह कार्य कर सकता है।जस्टिस संजय धर ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें याचिकाकर्ता साजिद अहमद मलिक ने...

पोती के आरोपों पर घिरे 75 वर्षीय दादा को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट से जमानत, अदालत बोली- संलिप्तता प्रथम दृष्टया संदिग्ध
पोती के आरोपों पर घिरे 75 वर्षीय दादा को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट से जमानत, अदालत बोली- संलिप्तता प्रथम दृष्टया संदिग्ध

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील मामले में 75 वर्षीय बुजुर्ग को जमानत प्रदान की, जिन पर उनकी ही पोती ने POCSO कानून के तहत यौन उत्पीड़न और बलात्कार के गंभीर आरोप लगाए। अदालत ने कहा कि ट्रायल के दौरान अभियोजन की पूरी नींव ही ढह गई है और ऐसे में आरोपी को जेल में बनाए रखना कानूनन उचित नहीं है।जस्टिस संजय धर ने जमानत याचिका पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि POCSO Act के तहत मौजूद वैधानिक अनुमान पूर्णतः अटल नहीं हैं। यदि मुकदमे के दौरान मूल तथ्य ही टिक नहीं पाते तो केवल आरोपों...

ज्वेलर का ग्राहक को अपनी मर्ज़ी से सोना देना ट्रस्ट, चोरी इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत कवर नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
ज्वेलर का ग्राहक को अपनी मर्ज़ी से सोना देना 'ट्रस्ट', चोरी इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत कवर नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाई कोर्ट ने कहा कि जहां इंश्योर्ड प्रॉपर्टी का कब्ज़ा भरोसे के आधार पर अपनी मर्ज़ी से ट्रांसफर किया जाता है तो ऐसा ट्रांसफर ट्रस्ट माना जाएगा। इससे होने वाले किसी भी बेईमानी से हुए नुकसान पर एक्सक्लूज़न क्लॉज़ लागू होंगे, भले ही यह काम कानूनी तौर पर चोरी क्यों न हो।इस सिद्धांत को लागू करते हुए जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने जम्मू-कश्मीर स्टेट कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन का आदेश रद्द कर दिया और ग्राहकों द्वारा सोने के गहनों की बेईमानी...

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं, जब सरकारी कर्मचारी रिटायर हो जाए या पद छोड़ दे: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं, जब सरकारी कर्मचारी रिटायर हो जाए या पद छोड़ दे: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

यह मानते हुए कि भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत मुक़दमे के लिए पहले से मंज़ूरी की कानूनी सुरक्षा तभी तक उपलब्ध है, जब तक कोई सरकारी कर्मचारी सेवा में रहता है, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि एक बार जब अधिकारी पद छोड़ देता है या रिटायर हो जाता है, तो किसी मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं होती।जस्टिस संजय धर ने भ्रष्टाचार की कार्यवाही को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए यह बात साफ की।साथ ही कहा,"PC Act की धारा 19 के तहत सुरक्षा, जो J&K PC Act की धारा 6 के समान है, एक सरकारी...

सुस्त न्याय पर सख्त टिप्पणी: चालान के स्तर पर ही कमजोर मामलों को छांटें आपराधिक अदालतें- जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का संदेश
'सुस्त न्याय' पर सख्त टिप्पणी: चालान के स्तर पर ही कमजोर मामलों को छांटें आपराधिक अदालतें- जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का संदेश

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने आपराधिक न्याय व्यवस्था की धीमी रफ्तार पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि आपराधिक अदालतें पुलिस रिपोर्टों की मात्र औपचारिक स्वीकृति करने वाली संस्था नहीं हैं। अदालतों का दायित्व है कि वे चालान पेश होते ही यह परखें कि मामला ठोस और संगठित तथ्यों पर आधारित है या फिर ऐसा टूटा-फूटा अभियोजन है जो अंततः गिरने के लिए ही बना है।जस्टिस राहुल भारती ने यह टिप्पणी एक लंबे समय से लंबित आपराधिक मामले को रद्द करते हुए की। उन्होंने कहा कि इस तरह के कमजोर और तथ्यहीन मुकदमे ही...