जम्मू और कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर सिविल सर्विसेज़ (विशेष प्रावधान) अधिनियम के तहत पिछली तारीख से नियमितीकरण नहीं: हाइकोर्ट
जम्मू-कश्मीर सिविल सर्विसेज़ (विशेष प्रावधान) अधिनियम के तहत पिछली तारीख से नियमितीकरण नहीं: हाइकोर्ट

जम्मू–कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने सेवा मामलों में बार-बार उठने वाले एक अहम सवाल पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि केवल निर्धारित सेवा अवधि पूरी कर लेने मात्र से किसी कर्मचारी को पिछली तारीख से नियमितीकरण का अधिकार नहीं मिल जाता। हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जम्मू एंड कश्मीर सिविल सर्विसेज़ (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2010 के तहत नियमितीकरण केवल भविष्य प्रभाव से ही किया जा सकता है, भले ही कर्मचारी ने निर्धारित योग्यता अवधि पहले ही पूरी कर ली हो।जस्टिस संजय धर ने जम्मू-कश्मीर पावर डेवलपमेंट...

जिले से बाहर विवाह करने पर स्थानीय निवासी आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट
जिले से बाहर विवाह करने पर स्थानीय निवासी आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि जो उम्मीदवार विवाह के बाद संबंधित जिले से बाहर निवास करता है, वह सार्वजनिक भर्ती में स्थानीय निवासी के आधार पर वरीयता का दावा नहीं कर सकता, जब तक कि वह ठोस और विश्वसनीय दस्तावेजों के माध्यम से अपने स्थानीय निवास को सिद्ध न करे।जस्टिस जावेद इकबाल वानी की पीठ ने यह निर्णय एक महिला अभ्यर्थी की याचिका पर सुनाया, जिसमें उसने दावा किया कि विवाह के बावजूद वह अपने मायके के गांव में ही निवास कर रही है। इसलिए उसे स्थानीय निवासी के रूप...

डेपुटेशन अनुभव के आधार पर बराबर पद के दावे को नहीं रोकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
डेपुटेशन अनुभव के आधार पर बराबर पद के दावे को नहीं रोकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि मूल विभाग में मिले अनुभव को उधार लेने वाले संगठन में बराबर पद तय करते समय नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।जस्टिस जावेद इकबाल वानी की बेंच ने कहा कि यह बात कि डेपुटेशन पर आया व्यक्ति उधार लेने वाले विभाग में बराबर पद नहीं मांग सकता, गलतफहमी वाली, साफ तौर पर गलत, अनुचित, तर्कहीन और भेदभावपूर्ण है।याचिकाकर्ता प्रतिवादी नंबर 7 का स्थायी कर्मचारी है। वह असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (डिग्री धारक) के रूप में काम कर रहा था। अक्टूबर, 2016 में उसे CVPPL में डेपुटेशन पर भेजा...

सर्विस रिकॉर्ड के बिना खराब प्रतिष्ठा के आधार पर लगाए गए आरोपों से समय से पहले रिटायरमेंट का आदेश कायम नहीं रह सकता: जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट
सर्विस रिकॉर्ड के बिना खराब प्रतिष्ठा के आधार पर लगाए गए आरोपों से समय से पहले रिटायरमेंट का आदेश कायम नहीं रह सकता: जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी को सिर्फ़ उसकी खराब प्रतिष्ठा के बारे में अस्पष्ट और बिना सबूत के आरोपों के आधार पर समय से पहले रिटायर नहीं किया जा सकता, खासकर जब ऐसे ऑब्ज़र्वेशन सर्विस रिकॉर्ड के किसी ठोस सबूत से समर्थित न हों।जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने समय से पहले रिटायरमेंट का आदेश रद्द करने वाले रिट कोर्ट का फैसला बरकरार रखा।कोर्ट ने अपने सामने रखे गए रिकॉर्ड की जांच की और पाया कि स्क्रीनिंग कमेटी और सक्षम अथॉरिटी ने कर्मचारी के FIR में...

गैर-जमानती मामलों में आरोपी महिलाएं अलग श्रेणी; CrPC की धारा 437 की कठोरता से बंधे नहीं रह सकते न्यायालय: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
गैर-जमानती मामलों में आरोपी महिलाएं अलग श्रेणी; CrPC की धारा 437 की कठोरता से बंधे नहीं रह सकते न्यायालय: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने यह दोहराया कि गैर-जमानती अपराधों में आरोपी महिलाएं एक विशिष्ट श्रेणी बनाती हैं और उनकी जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय न्यायालयों को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 437 की कठोरता तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अदालत ने हत्या के एक मामले में तीन महिला विचाराधीन बंदियों को जमानत देते हुए कहा कि CrPC की धारा 437(1) का प्रावधान मात्र औपचारिक नहीं बल्कि मानवीय विधायी मंशा को दर्शाता है, जिसे न्यायिक विवेक में वास्तविक रूप से लागू किया जाना चाहिए।जस्टिस राहुल भारती...

अनुच्छेद 16 का उल्लंघन: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने निवास-आधारित आरक्षण रद्द किया
अनुच्छेद 16 का उल्लंघन: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने निवास-आधारित आरक्षण रद्द किया

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट भर्ती विज्ञापन के एक क्लॉज़ को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जो निवास के आधार पर जिला कैडर पदों के लिए पात्रता को सीमित करता था।जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की,"जहां चयन प्रक्रिया विज्ञापन नोटिफिकेशन में नियमों या शर्तों के अनुसार आयोजित की गई, जिससे भेदभावपूर्ण परिणाम निकलते हैं तो यह उस उम्मीदवार की चुनौती से मुक्त नहीं है, जिसने इसमें भाग लिया।"ये टिप्पणियां सांबा जिले के एक अनुसूचित जाति के उम्मीदवार बलविंदर कुमार...

स्पीडी ट्रायल का अधिकार अपीलों पर भी लागू: विलंब के आधार पर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 46 वर्ष पुराने आपराधिक मामले का किया निपटारा
स्पीडी ट्रायल का अधिकार अपीलों पर भी लागू: विलंब के आधार पर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 46 वर्ष पुराने आपराधिक मामले का किया निपटारा

लंबे समय तक चलने वाली आपराधिक कार्यवाही के मानवीय प्रभावों को रेखांकित करते हुए, जम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने 1979 की एक घटना से संबंधित आपराधिक मामले का अंत किया और यह माना कि अब आगे सज़ा को जारी रखना किसी भी सार्थक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा।जस्टिस संजय परिहार ने 2009 से लंबित आपराधिक अपील का निर्णय सुनाते हुए, अत्यधिक विलंब, अभिय appellant की आयु और शारीरिक दुर्बलता, तथा दंड के सुधारात्मक उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए सज़ा को पहले से भुगती हुई माना।सुनवाई की शुरुआत में ही...

वैवाहिक उपाय एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं, पर क्रूरता के आरोप चुनिंदा रूप से नहीं उभर सकते: हाईकोर्ट ने धारा 498-A की FIR रद्द की
वैवाहिक उपाय एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं, पर क्रूरता के आरोप चुनिंदा रूप से नहीं उभर सकते: हाईकोर्ट ने धारा 498-A की FIR रद्द की

जम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने यह माना है कि धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 तथा धारा 498-A आईपीसी के तहत चलने वाली कार्यवाही को हमेशा अलग-अलग और सख्ती से विभाजित रखना आवश्यक नहीं है, क्योंकि दहेज माँग, मानसिक क्रूरता, शारीरिक उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से जुड़ी शिकायतें प्रायः आपस में जुड़ी होती हैं। हालाँकि, न्यायमूर्ति संजय परिहार ने यह स्पष्ट किया कि यदि पत्नी किसी घरेलू उत्पीड़न का दावा करती है, तो ऐसे आरोप सामान्यतः सभी समानांतर कार्यवाहियों में...

चेक बाउंस मामलों में समझौते के बाद मजिस्ट्रेट निष्पादन अदालत की भूमिका नहीं निभा सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
चेक बाउंस मामलों में समझौते के बाद मजिस्ट्रेट निष्पादन अदालत की भूमिका नहीं निभा सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) के तहत चेक बाउंस से जुड़े मामलों में यदि पक्षकारों के बीच वैध समझौता दर्ज हो जाता है तो ट्रायल मजिस्ट्रेट का कर्तव्य केवल उस समझौते के अनुरूप शिकायत का निपटारा करना है। इसके बाद मजिस्ट्रेट न तो समझौते के पालन की निगरानी कर सकता है और न ही उसे लागू कराने के लिए निष्पादन अदालत की तरह कार्य कर सकता है।जस्टिस संजय धर ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें याचिकाकर्ता साजिद अहमद मलिक ने...

पोती के आरोपों पर घिरे 75 वर्षीय दादा को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट से जमानत, अदालत बोली- संलिप्तता प्रथम दृष्टया संदिग्ध
पोती के आरोपों पर घिरे 75 वर्षीय दादा को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट से जमानत, अदालत बोली- संलिप्तता प्रथम दृष्टया संदिग्ध

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील मामले में 75 वर्षीय बुजुर्ग को जमानत प्रदान की, जिन पर उनकी ही पोती ने POCSO कानून के तहत यौन उत्पीड़न और बलात्कार के गंभीर आरोप लगाए। अदालत ने कहा कि ट्रायल के दौरान अभियोजन की पूरी नींव ही ढह गई है और ऐसे में आरोपी को जेल में बनाए रखना कानूनन उचित नहीं है।जस्टिस संजय धर ने जमानत याचिका पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि POCSO Act के तहत मौजूद वैधानिक अनुमान पूर्णतः अटल नहीं हैं। यदि मुकदमे के दौरान मूल तथ्य ही टिक नहीं पाते तो केवल आरोपों...

ज्वेलर का ग्राहक को अपनी मर्ज़ी से सोना देना ट्रस्ट, चोरी इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत कवर नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
ज्वेलर का ग्राहक को अपनी मर्ज़ी से सोना देना 'ट्रस्ट', चोरी इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत कवर नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाई कोर्ट ने कहा कि जहां इंश्योर्ड प्रॉपर्टी का कब्ज़ा भरोसे के आधार पर अपनी मर्ज़ी से ट्रांसफर किया जाता है तो ऐसा ट्रांसफर ट्रस्ट माना जाएगा। इससे होने वाले किसी भी बेईमानी से हुए नुकसान पर एक्सक्लूज़न क्लॉज़ लागू होंगे, भले ही यह काम कानूनी तौर पर चोरी क्यों न हो।इस सिद्धांत को लागू करते हुए जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने जम्मू-कश्मीर स्टेट कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन का आदेश रद्द कर दिया और ग्राहकों द्वारा सोने के गहनों की बेईमानी...

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं, जब सरकारी कर्मचारी रिटायर हो जाए या पद छोड़ दे: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं, जब सरकारी कर्मचारी रिटायर हो जाए या पद छोड़ दे: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

यह मानते हुए कि भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत मुक़दमे के लिए पहले से मंज़ूरी की कानूनी सुरक्षा तभी तक उपलब्ध है, जब तक कोई सरकारी कर्मचारी सेवा में रहता है, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि एक बार जब अधिकारी पद छोड़ देता है या रिटायर हो जाता है, तो किसी मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं होती।जस्टिस संजय धर ने भ्रष्टाचार की कार्यवाही को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए यह बात साफ की।साथ ही कहा,"PC Act की धारा 19 के तहत सुरक्षा, जो J&K PC Act की धारा 6 के समान है, एक सरकारी...

सुस्त न्याय पर सख्त टिप्पणी: चालान के स्तर पर ही कमजोर मामलों को छांटें आपराधिक अदालतें- जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का संदेश
'सुस्त न्याय' पर सख्त टिप्पणी: चालान के स्तर पर ही कमजोर मामलों को छांटें आपराधिक अदालतें- जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का संदेश

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने आपराधिक न्याय व्यवस्था की धीमी रफ्तार पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि आपराधिक अदालतें पुलिस रिपोर्टों की मात्र औपचारिक स्वीकृति करने वाली संस्था नहीं हैं। अदालतों का दायित्व है कि वे चालान पेश होते ही यह परखें कि मामला ठोस और संगठित तथ्यों पर आधारित है या फिर ऐसा टूटा-फूटा अभियोजन है जो अंततः गिरने के लिए ही बना है।जस्टिस राहुल भारती ने यह टिप्पणी एक लंबे समय से लंबित आपराधिक मामले को रद्द करते हुए की। उन्होंने कहा कि इस तरह के कमजोर और तथ्यहीन मुकदमे ही...

1947 के PoJK विस्थापितों को ST दर्जा और PSP प्रमाणपत्र देने की मांग पर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस
1947 के PoJK विस्थापितों को ST दर्जा और PSP प्रमाणपत्र देने की मांग पर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने वर्ष 1947 में पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) से विस्थापित हुए लोगों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा और पहाड़ी भाषी समुदाय (PSP) के प्रमाणपत्र जारी किए जाने की मांग से जुड़ी जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया।यह जनहित याचिका जम्मू-कश्मीर एक्शन कमेटी की ओर से उसके अध्यक्ष गुरदेव सिंह द्वारा दायर की गई।मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस राजनेश ओसवाल की खंडपीठ ने की।याचिका में कहा गया कि वर्ष 2024 में पहाड़ी समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने के...

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने हमले का जवाब देने में नाकाम रहने वाले कांस्टेबल की बर्खास्तगी बहाल की
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने हमले का जवाब देने में नाकाम रहने वाले कांस्टेबल की बर्खास्तगी बहाल की

यह मानते हुए कि सार्वजनिक सुरक्षा की ज़िम्मेदारी वाले पुलिसकर्मी आतंकवादी हिंसा का सामना करने पर अपनी ड्यूटी से पीछे नहीं हट सकते, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पुलिस गार्डों का आतंकवादी हमले का जवाब देने में नाकाम रहना और एक भी गोली चलाए बिना सर्विस हथियार सरेंडर करना एक गंभीर कायरता का काम है, जिससे पूरी पुलिस फोर्स को नैतिक बदनामी होती है।जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने रिट कोर्ट का फैसला रद्द किया और एक सिलेक्शन ग्रेड कांस्टेबल की बर्खास्तगी...

बेबुनियाद दावों से सक्षम अधिकारियों के दस्तावेज़ों को अमान्य नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी मामलों में खास दलीलों की ज़रूरत पर ज़ोर दिया
'बेबुनियाद दावों से सक्षम अधिकारियों के दस्तावेज़ों को अमान्य नहीं किया जा सकता': जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी मामलों में खास दलीलों की ज़रूरत पर ज़ोर दिया

धोखाधड़ी का आरोप लगाते समय सटीक दलीलों की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि सक्षम अधिकारियों द्वारा जारी किए गए दस्तावेज़ों की सच्चाई के बारे में बड़े और बेबुनियाद आरोप लगाने से ऐसे दस्तावेज़ अविश्वसनीय नहीं हो जाएंगे।जस्टिस संजय धर की बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी मुक़दमेबाज़ के लिए यह ज़रूरी है कि वह कथित धोखाधड़ी का पूरा ब्यौरा सबूतों के साथ दे।ये टिप्पणियां एक याचिका खारिज करते हुए की गईं, जिसमें पेट्रोलियम आउटलेट की स्थापना के लिए वैधानिक अधिकारियों...

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने अंडरट्रायल कैदियों के ट्रांसफर पर महबूबा मुफ्ती की PIL खारिज की
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने अंडरट्रायल कैदियों के ट्रांसफर पर महबूबा मुफ्ती की PIL खारिज की

जनहित याचिका की संवैधानिक सीमाओं की पुष्टि करते हुए जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख के हाईकोर्ट ने PDP अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती द्वारा दायर PIL खारिज की। कोर्ट ने कहा कि याचिका में "ज़रूरी दस्तावेज़ों की कमी थी और यह अस्पष्टता पर आधारित है" और यह अधूरी, अस्पष्ट और बिना सबूत वाले दावों पर टिकी है।चीफ जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस रजनेश ओसवाल की डिवीजन बेंच ने रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने से यह देखते हुए इनकार किया कि याचिका में कोर्ट के सामने किसी भी अंडरट्रायल कैदी के एक भी विशिष्ट...

पूरी तरह से धार्मिक या स्वैच्छिक नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने धर्मार्थ ट्रस्ट को इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट के तहत इंडस्ट्री माना
पूरी तरह से धार्मिक या स्वैच्छिक नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने धर्मार्थ ट्रस्ट को इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट के तहत 'इंडस्ट्री' माना

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख के हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि जम्मू-कश्मीर धर्मार्थ ट्रस्ट अपनी गतिविधियों के व्यवस्थित, संगठित और व्यावसायिक स्वरूप के कारण इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 के तहत "इंडस्ट्री" की कानूनी परिभाषा को पूरा करता है।जस्टिस एम ए चौधरी ने फैसला सुनाया कि ट्रस्ट के संचालन को पूरी तरह से धार्मिक या आध्यात्मिक नहीं माना जा सकता है, जो निस्वार्थ और स्वैच्छिक तरीके से किए जाते हैं। इसलिए वे श्रम कानून सुरक्षा के अधीन हैं।यह फैसला धर्मार्थ ट्रस्ट द्वारा दायर रिट याचिका खारिज करते...

कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटियां सहायक काम सौंप सकती हैं, मुख्य फैसले लेने का काम नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटियां सहायक काम सौंप सकती हैं, मुख्य फैसले लेने का काम नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने मंगलवार (16 दिसंबर) को कहा कि कानून ज़रूरी फैसले लेने की ज़िम्मेदारी सौंपने पर रोक लगाता है, न कि सहायक काम सौंपने पर।जस्टिस वसीम सादिक नरगल की सिंगल जज बेंच ने कहा कि एक बार जब किसी कमेटी को न्यायिक आदेश से कोई खास काम सौंपा जाता है तो कानून उस काम को प्रभावी ढंग से पूरा करने के लिए ज़रूरी सभी उचित सहायक तरीकों को अपनाने की इजाज़त देता है, बशर्ते कि मुख्य फैसले लेने का अधिकार कमेटी के पास ही रहे।कोर्ट ने यह बात जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट के आदेश द्वारा...