हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (13 अप्रैल, 2026 से 17 अप्रैल, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
CAPF के जिन जवानों की उम्र 31 जनवरी, 2019 से पहले 60 साल हो गई, वे रिटायरमेंट के बढ़े हुए फायदों के हकदार नहीं हैं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (CAPFs) के रिटायर जवानों की तरफ से दायर कई रिट याचिकाओं को खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि जो लोग 31 जनवरी, 2019 तक 60 साल की उम्र पार कर चुके है, वे रिटायरमेंट की उम्र बढ़ने से मिलने वाले पेंशन से जुड़े फायदों के हकदार नहीं हैं।
जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने BSF, CRPF, ITBP और SSB जैसी फोर्सेज के जवानों की तरफ से दायर याचिकाओं का ग्रुप खारिज किया। ये जवान 2011 से 2016 के बीच रिटायर हुए।
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Land Acquisition Act, 1894 | रेफरेंस कोर्ट कलेक्टर का अवार्ड रद्द नहीं कर सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत रेफरेंस कोर्ट को कलेक्टर द्वारा दिए गए मुआवजे का अवार्ड रद्द करने या कलेक्टर द्वारा नए सिरे से निर्धारण किए जाने का आदेश देने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा केवल एक अपीलीय कोर्ट ही कर सकती है।
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क्या संभावित आरोपी को सुने जाने का अधिकार है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ FIR का निर्देश देने वाले आदेश पर लगाई रोक
एक अहम घटनाक्रम में इलाहाबाद हाई कोर्ट (लखनऊ बेंच) ने BJP कार्यकर्ता की याचिका पर अपना अंतिम आदेश रोक दिया। इस याचिका में लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP) राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई थी। यह मांग उन दावों के संबंध में की गई कि राहुल गांधी एक ब्रिटिश नागरिक हैं।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने उस फैसले के अमल को प्रभावी रूप से टाल दिया, जो शुक्रवार को ओपन कोर्ट में पहले ही सुनाया जा चुका था। उस फैसले में गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया। बेंच ने इस आदेश को टाइप होने और उस पर हस्ताक्षर होने से पहले ही प्रभावी रूप से रोक दिया।
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पति की गर्लफ्रेंड IPC की धारा 498A के तहत 'रिश्तेदार' की परिभाषा से बाहर, क्रूरता का मुकदमा नहीं चल सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पति के साथ शादी के बाहर संबंध रखने वाली महिला रणबीर दंड संहिता (RPC) की धारा 498-A (जो IPC की धारा 498-A के बराबर है) के तहत "रिश्तेदार" नहीं मानी जाएगी। इसलिए उस प्रावधान के तहत उस पर क्रूरता या उत्पीड़न का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
कोर्ट ने एक महिला के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। इस महिला पर पति की प्रेमिका होने का आरोप था और उसे परिवार के अन्य सदस्यों के साथ इस मामले में आरोपी बनाया गया। इस मामले में शिकायतकर्ता पत्नी ने दहेज की मांग और मानसिक उत्पीड़न के अस्पष्ट और सामान्य आरोप लगाए।
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ब्रिटिश नागरिकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट का राहुल गांधी के खिलाफ दिया FIR आदेश
एक अहम आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने आज लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने और जांच करने का निर्देश दिया। यह आदेश एक भारतीय जनता पार्टी (BJP) कार्यकर्ता की याचिका के संबंध में दिया गया, जिसमें राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता का आरोप लगाया गया।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने इस तरह लखनऊ कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने से इनकार किया गया था।
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पिता द्वारा बच्चे की कस्टडी ज़बरदस्ती लेना 'गैर-कानूनी हिरासत' नहीं, जब तक कि यह कोर्ट के आदेश का उल्लंघन न हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि एक पिता, जो एक हिंदू नाबालिग का स्वाभाविक अभिभावक होता है, पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि उसने किसी बच्चे को 'गैर-कानूनी हिरासत' में रखा है, भले ही उसने बच्चे की कस्टडी माँ से ज़बरदस्ती ले ली हो; बशर्ते कि उसका यह काम कोर्ट के किसी आदेश का उल्लंघन न हो।
जस्टिस अनिल कुमार-X की बेंच ने इस आधार पर माँ की बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह सुनवाई योग्य नहीं है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसके अलग रह रहे पति (प्रतिवादी) ने 2022 में बंदूक की नोक पर उनके दो नाबालिग बच्चों को ज़बरदस्ती छीन लिया था और तब से उन्हें 'गैर-कानूनी हिरासत' में रखा हुआ है।
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जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम के तहत जारी जन्म प्रमाण पत्र तब तक मान्य है, जब तक उसे रद्द न कर दिया जाए या उसमें जालसाज़ी साबित न हो जाए: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत जारी जन्म प्रमाण पत्र तब तक वैध और मान्य है, जब तक उसे रद्द न कर दिया जाए या उसमें जालसाज़ी साबित न हो जाए।
कक्षा VI में दाखिले से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने कहा: “जब तक कोई दस्तावेज़, जो किसी वैधानिक प्रावधान के तहत जारी किया गया, या तो रद्द न कर दिया जाए या उसमें जालसाज़ी का कोई तत्व साबित न हो जाए, तब तक उसका संबंधित अधिकारियों पर बाध्यकारी प्रभाव रहेगा। संबंधित अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में यह नहीं आता कि वे अपनी मनमर्ज़ी और सनक के आधार पर, किसी वैधानिक प्रावधान के तहत जारी प्रमाण पत्र पर संदेह करें।”
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UPSC परीक्षाओं में उम्र में छूट के लिए SC/ST/OBC के बराबर अधिकार के हकदार नहीं EWS उम्मीदवार: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, जिसमें केंद्र सरकार के तहत सीधी भर्तियों और नौकरियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के उम्मीदवारों के लिए उम्र में छूट और अतिरिक्त मौकों की मांग की गई।
जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि EWS उम्मीदवारों को उम्र और मौकों में छूट न देने का केंद्र सरकार का नीतिगत फैसला न तो मनमाना है और न ही असंवैधानिक।
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Advocates Act | इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: सिर्फ़ रजिस्टर्ड वकील ही कर सकते हैं वकालत
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि कोई भी व्यक्ति, भले ही उसके पास पावर ऑफ़ अटॉर्नी हो, एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए मुक़दमे लड़ने वालों की ओर से और उनकी तरफ़ से एक वकील या अटॉर्नी के तौर पर अधिकार के तौर पर पेश होकर बहस नहीं कर सकता।
एडवोकेट्स एक्ट 1961 की धारा 29 और 33 का ज़िक्र करते हुए जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने साफ़ तौर पर कहा कि सिर्फ़ "रजिस्टर्ड वकील" ही किसी दूसरे व्यक्ति की ओर से कोर्ट के सामने पेश होकर बहस कर सकते हैं।
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चाइल्ड केयर लीव पॉलिसी मातृत्व की रक्षा करती है, इसे मना करना माँ और उसके बच्चे के अधिकारों का उल्लंघन: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि चाइल्ड केयर लीव (CCL) पॉलिसी लाकर कानून ने पारिवारिक स्थिरता में एक महिला के योगदान और अपने बच्चों के पालन-पोषण में उसकी भूमिका को मान्यता दी। इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस पॉलिसी के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए इसे ठीक से लागू किया जाए।
सिंगल-जज जस्टिस डॉ. नीला गोखले ने कहा कि महिलाओं को CCL देना न केवल उनके अपने अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि उनके बच्चों के अधिकारों की भी रक्षा करता है।
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वकील अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने के लिए PIL याचिकाकर्ता नहीं बन सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि कोई भी वकील, जिसके पास उसके क्लाइंट्स अपनी शिकायतों के निवारण के लिए आते हैं, उसे खुद याचिकाकर्ता बनकर अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने वाली जनहित याचिका (PIL) दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
यह देखते हुए कि ऐसा आचरण पेशेवर कदाचार माना जा सकता है, चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने एक वकील द्वारा दायर की गई PIL याचिका वापस लिए जाने के आधार पर खारिज की। इस याचिका में वकील ने प्रतिवादियों को यह निर्देश देने की मांग की थी कि वे पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के आधार पर उद्योगों को प्राकृतिक गैस कनेक्शन उपलब्ध कराएं।
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पत्नी द्वारा 'छोड़ देने' के आधार पर तलाक़ मिलने से पति CrPC की धारा 125 के तहत पत्नी को भरण-पोषण देने की ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता: उड़ीसा हाईकोर्ट
उड़ीसा हाईकोर्ट ने यह फ़ैसला दिया कि सिर्फ़ इसलिए कि पति के पक्ष में तलाक़ का फ़ैसला इस आधार पर दिया गया कि पत्नी ने उसे छोड़ दिया था, यह अपने आप में तलाक़ के बाद पत्नी को भरण-पोषण देने में कोई रुकावट नहीं डालता।
कानून की स्थिति को स्पष्ट करते हुए जस्टिस डॉ. संजीव कुमार पाणिग्राही की पीठ ने यह राय व्यक्त की– “BNSS के तहत भरण-पोषण का प्रावधान अब धारा 144 के रूप में पुन: क्रमांकित किया गया। इसकी व्याख्या में 'पत्नी' शब्द के अंतर्गत एक ऐसी तलाक़शुदा महिला को भी शामिल किया गया, जिसने अभी तक पुनर्विवाह नहीं किया... उपरोक्त कानूनी संदर्भों को देखते हुए कानूनी स्थिति स्पष्ट है कि पत्नी द्वारा छोड़ देने के आधार पर दिया गया तलाक़ का फ़ैसला, अपने आप में तलाक़ के बाद भरण-पोषण पाने में कोई कानूनी बाधा उत्पन्न नहीं करता है। इसलिए याचिकाकर्ता इस व्यापक तर्क के आधार पर सफल नहीं हो सकता कि यह वर्तमान कार्यवाही मूल रूप से सुनवाई योग्य नहीं है, सिर्फ़ इसलिए कि पत्नी द्वारा छोड़ देने का फ़ैसला अब अंतिम रूप ले चुका है।”
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ट्रायल कोर्ट ज़मानत देने की शर्त के तौर पर पासपोर्ट ज़ब्त करने का आदेश नहीं दे सकता: मद्रास हाईकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि ट्रायल कोर्ट के पास ज़मानत देने की शर्त के तौर पर पासपोर्ट ज़ब्त करने का आदेश देने का अधिकार नहीं है। जस्टिस पी. धनबाल ने फ़ैसला दिया कि BNSS की धारा 109 (CrPC की धारा 104) के तहत कोर्ट के पास किसी भी दस्तावेज़ को ज़ब्त करने का अधिकार है, लेकिन पासपोर्ट को नहीं। कोर्ट ने कहा कि पासपोर्ट ज़ब्त करने का अधिकार सिर्फ़ पासपोर्ट अधिकारियों के पास है, जो पासपोर्ट एक्ट की धारा 10(3) के तहत दिया गया।
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भविष्य की योजना के लिए ज़मीन सिर्फ़ रिज़र्व रखना, अधिग्रहित ज़मीन का 'उपयोग' नहीं माना जाएगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया ज़मीन वापस करने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि ज़मीन का कोई भी असल विकास या उपयोग किए बिना, उसे सिर्फ़ "भविष्य की योजना" के लिए रिज़र्व रखना, यूपी शहरी योजना और विकास अधिनियम, 1973 की धारा 17 के तहत 'उपयोग' नहीं माना जाएगा।
यूपी शहरी योजना और विकास अधिनियम, 1973 की धारा 17 के तहत राज्य सरकार को विकास कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत ज़मीन अधिग्रहित करने का अधिकार दिया गया। उप-धारा (1) का परंतुक यह प्रावधान करता है कि यदि ज़मीन मालिक आवेदन करता है तो राज्य सरकार ज़मीन को उसके मूल मालिक को वापस कर सकती है; बशर्ते कि अधिग्रहण की तारीख से 5 साल के भीतर उस ज़मीन का उपयोग उस उद्देश्य के लिए न किया गया हो, जिसके लिए उसे अधिग्रहित किया गया था। साथ ही यदि ज़मीन मालिक को ज़मीन वापस की जाती है तो उसे राज्य सरकार द्वारा ज़मीन के विकास पर खर्च की गई निर्धारित राशि का भुगतान करना होगा।
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बालिग होने पर पीड़िता से निकाह करना बलात्कार के अपराध को खत्म नहीं करता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि यदि किसी अभियुक्त ने नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार जैसा जघन्य अपराध किया है तो लड़की के बालिग होने के बाद उससे शादी या निकाह कर लेने से अभियुक्त का आपराधिक दायित्व समाप्त नहीं हो जाता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बाद में की गई शादी उस समय किए गए अपराध को नहीं मिटा सकती, जब पीड़िता नाबालिग है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत दर्ज मामले में जमानत याचिका खारिज करते हुए जस्टिस गिरीश कठपालिया ने कड़ी टिप्पणी की।
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BNSS की धारा 106 के तहत संपत्ति कुर्क करने के लिए पुलिस को पहले से नोटिस देना ज़रूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में फैसला दिया कि BNSS की धारा 106 के तहत पुलिस द्वारा संपत्ति कुर्क करने के लिए संबंधित व्यक्ति को पहले से कोई नोटिस देना ज़रूरी नहीं है। कोर्ट ने धारा 106 और धारा 107 के बीच अंतर स्पष्ट किया। धारा 107 में विशेष रूप से यह प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को नोटिस जारी करेगा, जिसकी संपत्ति BNSS की धारा 107 के तहत कुर्क की जानी है।
BNSS की धारा 106 पुलिस को ऐसी किसी भी संपत्ति को ज़ब्त करने का अधिकार देती है, जिसके बारे में यह आरोप हो या संदेह हो कि वह चोरी की है, या जो ऐसी परिस्थितियों में पाई गई हो, जिनसे किसी अपराध के होने का संदेह पैदा होता हो।