देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (19 अक्टूबर, 2026 से 23 अक्टूबर, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

रजिस्ट्रेशन एक्ट | जमीन के समझौते में धोखाधड़ी के आरोपों पर रिट कोर्ट पूरी सुनवाई नहीं कर सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी, दस्तावेजों में जालसाजी और हस्ताक्षरों के दुरुपयोग के आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों, इनके आधार पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट कोर्ट को प्रथम दृष्टया सुनवाई करने वाली अदालत की तरह काम करने, मौखिक साक्ष्य दर्ज करने, गवाहों की विश्वसनीयता परखने और विवादित तथ्यात्मक सवालों का फैसला करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी वैधानिक प्राधिकारी ने उसके सामने मौजूद सामग्री के आधार पर निष्कर्ष दर्ज कर लिया हो और पक्षकारों के मूल अधिकारों से जुड़ा विवाद पहले से सिविल कोर्ट में लंबित हो, तो रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल संयम के साथ किया जाना चाहिए।

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बच्चे का अंडरगारमेंट उतारना, आगे कोई कृत्य न होने पर भी, यौन हमले के प्रयास के समान: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि यौन इरादे से किसी बच्चे का अंडरगारमेंट उतारना, भले ही इसके बाद कोई अन्य कृत्य न किया गया हो, लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के तहत यौन हमले का प्रयास माना जा सकता है। अदालत ने साढ़े तीन साल की बच्ची से जुड़े मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा पांच साल से घटाकर साढ़े तीन साल के कठोर कारावास में बदल दी। इसके लिए POCSO Act की धारा 18 लागू की गई।

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बच्चा सामान्य जीवन नहीं जी सकेगा तो उसे जन्म देना है या नहीं, यह तय करने का अधिकार मां को: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने भ्रूण में गंभीर असामान्यताएं पाए जाने के बाद 28 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी। जस्टिस पी.टी. आशा ने कहा कि मां को यह निर्णय लेने का अधिकार है कि वह बच्चे को जन्म देना चाहती है या नहीं, खासकर तब, जब बच्चे के सामान्य जीवन जी पाने की संभावना प्रभावित हो सकती हो।

अदालत ने कहा, “इस मामले में स्कैन रिपोर्ट स्पष्ट रूप से भ्रूण में गंभीर असामान्यताओं को दर्शाती हैं। मां को यह निर्णय लेने का अधिकार है कि वह ऐसे बच्चे को जन्म देना चाहती है या नहीं, खासकर तब जब बच्चा सामान्य जीवन नहीं जी पाएगा। इसलिए इस अदालत को याचिकाकर्ता मां के फैसले का सम्मान करना होगा। उसने बच्चे के सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन जीने की संभावनाओं से जुड़े गंभीर जोखिमों को ध्यान में रखते हुए यह कठिन और पीड़ादायक कदम उठाया है।”

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वकील का मुवक्किल की गोपनीय जानकारी सुरक्षित रखने का दायित्व नौकरी छोड़ने के बाद भी रहता है, यह स्थायी है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि वकील का अपने मुवक्किल के साथ हुई बातचीत और उसे दी गई पेशेवर कानूनी सलाह की गोपनीयता बनाए रखने का दायित्व नौकरी या पेशेवर नियुक्ति समाप्त होने के बाद भी खत्म नहीं होता, बल्कि यह दायित्व स्थायी रहता है। चीफ जस्टिस अल्पेश वाई. कोगजे और जस्टिस विवेक रूसिया की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के अपने पूर्व नियोक्ता से संबंधित मामला उठाने के आचरण को “बेहद आपत्तिजनक और निंदनीय” बताया।

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पति का विवाहेतर संबंध अपने आप में IPC की धारा 498A के तहत पत्नी के साथ क्रूरता नहीं: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि पति का किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध होना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत पत्नी के साथ क्रूरता का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

जस्टिस सुंदर मोहन ने इस आधार पर पत्नी और उनकी डेढ़ साल की बच्ची की आत्महत्या के मामले में पति को बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया। पति पर क्रूरता और दहेज उत्पीड़न से संबंधित आरोप लगाए गए थे।

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जमीन अधिग्रहण के 50 साल बाद मीरा कुमार को 2013 के कानून के तहत मुआवजे का हक: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने लोकसभा की पूर्व स्पीकर मीरा कुमार को वर्ष 1976 में राज्य सरकार द्वारा अधिग्रहित जमीन के लिए उचित मुआवजा और पारदर्शिता के साथ भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 के तहत मुआवजा पाने का हकदार माना।

अदालत ने पाया कि बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 4(एच) के तहत कार्यवाही शुरू करने से पहले कलेक्टर को यह साबित करना जरूरी है कि संबंधित जमीन राज्य सरकार में निहित हो चुकी है। ऐसा किए बिना कलेक्टर को इस धारा के तहत कार्यवाही शुरू करने का अधिकार नहीं है।

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स्पेशल कोर्ट में मामला ट्रांसफर होने से पहले मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने से SC/ST Act के तहत चल रही कार्यवाही अमान्य नहीं हो जाती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि SC/ST Act के तहत किसी मामले को विशेष अदालत में भेजने से पहले, यदि मजिस्ट्रेट उस मामले का संज्ञान ले लेते हैं, तो इससे पूरी आपराधिक कार्यवाही अमान्य (Vitiate) नहीं हो जाती।

जस्टिस संतोष राय की बेंच ने कहा कि भले ही ACJM द्वारा शुरुआती स्तर पर संज्ञान लेना और CrPC की धारा 200 व 202 के तहत बयान दर्ज करना प्रक्रियात्मक रूप से अनियमित (Procedurally Irregular) रहा हो, लेकिन इस अनियमितता को ऐसी 'असाध्य अवैधता' (Incurable KIllegality) नहीं माना जा सकता, जिससे बाद की पूरी कार्यवाही ही अमान्य हो जाए।

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने विदेशी नागरिकों को फर्जी आधार और पैन कार्ड बनवाने में मदद करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार (22 अक्टूबर) को महाराष्ट्र पुलिस को आदेश दिया कि वे न केवल भारतीय सीमाओं में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले विदेशी नागरिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें, बल्कि उन भारतीयों के खिलाफ भी कार्रवाई करें जो ऐसे घुसपैठियों को आधार कार्ड, पैन कार्ड और चुनाव कार्ड जैसे फर्जी दस्तावेज बनवाकर यहाँ बसने में मदद करते हैं।

जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस कमल खाता की खंडपीठ महाराष्ट्र पुलिस द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में 'यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया' (UIDAI) को निर्देश देने की मांग की गई कि वे बकार हसन शेख नामक व्यक्ति का विवरण उपलब्ध कराएं। आरोप है कि शेख बांग्लादेशी नागरिक है, जो अवैध रूप से भारत में दाखिल हुआ और आधार कार्ड तथा अन्य पहचान दस्तावेजों के सहारे यहाँ बस गया।

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नानी कानूनी अभिभावक बने बिना भी नाबालिग के लिए भरण-पोषण की मांग कर सकती हैं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि नानी, नाबालिग की कानूनी अभिभावक (लीगल गार्जियन) नियुक्त हुए बिना भी CrPC की धारा 125 के तहत अपने नाती-नातिन के लिए भरण-पोषण की मांग कर सकती हैं। [2026 LiveLaw (MP) 420]

इस बात पर जोर देते हुए कि CrPC की धारा 125 की व्याख्या सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की जानी चाहिए, जस्टिस द्वारकाधीश बंसल की बेंच ने कहा: "CrPC की धारा 125 के प्रावधान की व्याख्या इस तरह की जानी चाहिए, जिससे सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिले और असहाय लोगों को इसका लाभ मिल सके। फैमिली कोर्ट इस तथ्य पर ध्यान देने में विफल रहा कि यहां नाबालिग के अधिकारों को लागू किया जाना है, न कि उसके प्रतिनिधि (यानी नानी) के अधिकारों को। फैमिली कोर्ट को नाबालिग बेटी को इस प्रावधान का लाभ देना चाहिए, भले ही वह किसी भी व्यक्ति के माध्यम से भरण-पोषण का दावा कर रही हो।"

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मुकदमा चलाने के लिए दहेज की रकम पर पहले से सहमति होना ज़रूरी नहीं; शादी के बाद दहेज की मांग करना भी दंडनीय: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि शादी के बाद की गई दहेज की मांग पर भी 'दहेज निषेध अधिनियम' की धारा 4 लागू हो सकती है, भले ही शादी से पहले दहेज को लेकर कोई समझौता न हुआ हो। [2026 LiveLaw (MP) 419]

अपीलीय अदालत के उस आदेश को रद्द करते हुए, जिसमें एक पति और उसके पिता को बरी कर दिया गया था, जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने कहा, "यह एक संस्कृति या परंपरा है कि दहेज अधिनियम की धारा 4 के तहत अपराध के लिए पहले से दहेज का कोई समझौता होना अनिवार्य शर्त नहीं है"... "दहेज" का अर्थ है कोई भी संपत्ति या कीमती वस्तु, जो विवाह के संबंध में, विवाह के समय, उससे पहले या उसके बाद, एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दी गई हो या देने का समझौता किया गया हो।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के सभी बेसिक स्कूलों के शिक्षकों के शैक्षिक और नियुक्ति दस्तावेजों के सत्यापन का निर्देश दिया: जानें क्यों

एक महत्वपूर्ण आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के बेसिक स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों की शैक्षिक योग्यताओं और नियुक्ति दस्तावेजों के सत्यापन का निर्देश दिया। शिक्षकों को निर्देश दिया गया कि वे अपने नियुक्ति पत्रों और शैक्षिक दस्तावेजों (हाई स्कूल, इंटरमीडिएट, स्नातक, B.Ed./B.T.C. (D.El.Ed., B.El.Ed. आदि), TET/CTET से जुड़े दस्तावेज) की साफ और पढ़ने योग्य प्रतियां, BSA कार्यालय से जारी अधिसूचना मिलने के 1 सप्ताह के भीतर संबंधित बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) को सौंप दें।

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AIBE पास किए बिना वकालत जारी रखने वाले वकीलों के खिलाफ हो सकती है आपराधिक कार्रवाई: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि अनिवार्य दो साल की अवधि के भीतर ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास किए बिना अदालतों में वकालत जारी रखने वाले वकीलों को भारतीय दंड संहिता (IPC) और एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 45 के तहत आपराधिक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

जस्टिस एच.पी. संदेश ने स्पष्ट किया कि एडवोकेट्स एक्ट के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की व्यवस्था मौजूद होने का अर्थ यह नहीं है कि आपराधिक अदालतों का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है। यदि किसी व्यक्ति का आचरण स्वतंत्र रूप से किसी आपराधिक अपराध के तत्वों को पूरा करता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की जा सकती है।

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अवैध संबंध के आरोप से किसी महिला का 'विधवा' के रूप में कानूनी दर्जा खत्म नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी महिला की शादी और उसके पति की मौत की बात मान ली गई तो उसका 'विधवा' होना एक कानूनी परिणाम है। यह दर्जा सिर्फ इसलिए खत्म नहीं हो जाता, क्योंकि उस पर पति की मौत के बाद किसी दूसरे पुरुष के साथ संबंध रखने का आरोप है।

जस्टिस अनिल कुमार-X ने कहा: "विधवा का दर्जा, शादी और पति की मौत से मिलने वाला एक कानूनी दर्जा है। इसे सिर्फ इसलिए खत्म नहीं किया जा सकता, क्योंकि कोई व्यक्ति या समाज अपनी निजी मान्यताओं, आचरण या सुविधा के आधार पर इस दर्जे को मानने से इनकार कर दे। किसी कानूनी दर्जे को तभी बदला जा सकता है, जब कोई ऐसा तथ्य साबित हो जाए जिसे कानून मान्यता देता हो और जिसका परिणाम यह दर्जा खत्म करना हो।"

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