देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (02 नवंबर, 2026 से 06 नवंबर, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
घर बदलने वाले मतदाताओं से फॉर्म-6 या SIR फॉर्म भरवाना गलत घोषणा के लिए मजबूर करना है: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि एक स्थान से दूसरे स्थान पर रहने के लिए जाने वाले मतदाता को केवल फॉर्म-8 भरना होगा। ऐसे मतदाता को पूर्व-भरे गणना फॉर्म या नए मतदाता के पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 भरने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना मतदाता को गलत घोषणा करने के लिए मजबूर करने जैसा होगा, जिसके आधार पर उसके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है।
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Judicial Recruitment | 1 साल की प्रैक्टिस की छूट केवल 22 अगस्त, 2025 से पहले डिग्री पूरी करने वाले लॉ ग्रेजुएट्स के लिए: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) के उस शुद्धिपत्र (Corrigendum) को सही ठहराया, जिसके तहत 'सिविल जज जूनियर डिवीजन' और 'ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास' की भर्ती प्रक्रिया में 1 साल की सक्रिय कानूनी प्रैक्टिस पूरी मान लेने की छूट, केवल उन लॉ ग्रेजुएट्स को दी गई, जिन्होंने 22 अगस्त, 2025 से पहले अपनी डिग्री प्राप्त की।
कोर्ट ने कहा कि 'भूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को समग्र रूप से देखा जाना चाहिए; इसका मतलब यह नहीं है कि सभी लॉ ग्रेजुएट्स को 1 साल की वास्तविक प्रैक्टिस की शर्त से छूट मिल गई।
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वकीलों की हड़ताल 'लिखित बयान' दाखिल करने की 120 दिन की समय-सीमा बढ़ाने का कोई असाधारण आधार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि वकीलों द्वारा काम बंद कर देने (हड़ताल) को 'लिखित बयान' दाखिल करने की समय-सीमा बढ़ाने का आधार नहीं माना जा सकता। किसी भी स्थिति में इसे ऐसी 'असाधारण कठिन परिस्थिति' नहीं कहा जा सकता, जिसके कारण प्रतिवादी (डिफेंडेंट) के लिए तय समय के भीतर लिखित बयान दाखिल करना असंभव हो जाए।
हाईकोर्ट गुलशन कौर और एक अन्य व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। उन्होंने उधमपुर के मुंसिफ के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें लिखित बयान दाखिल करने के लिए 120 दिन की कानूनी समय-सीमा (CPC के आदेश VIII नियम 1 के तहत) से अधिक समय मांगने वाली उनकी अर्जी खारिज कर दी गई थी। यह नियम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में लागू है।
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CBI, NCB और अन्य केंद्रीय एजेंसियों द्वारा जांच किए गए मामलों में राज्य को पक्षकार बनाने की जरूरत नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने CBI, CBN, NCB जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों द्वारा चलाए जा रहे मुकदमों से जुड़े सभी मामलों में 'राजस्थान राज्य' को बिना वजह (रूटीन तरीके से) पक्षकार बनाने की प्रथा को बंद करने का निर्देश दिया, भले ही इन मुकदमों को राज्य सरकार द्वारा न चलाया जा रहा हो।
जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने इस प्रथा को "प्रक्रिया संबंधी एक बार-बार होने वाली अनियमितता" करार देते हुए कहा कि इससे राज्य को अनावश्यक रूप से पक्षकार बनाया जाता है और प्रक्रिया में बेवजह की जटिलताएं पैदा होती हैं।
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राजस्थान में प्रवासी अपने गृह राज्य की जाति के आधार पर SC/ST आरक्षण का लाभ नहीं ले सकते: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई उम्मीदवार, जो राजस्थान के बाहर किसी राज्य में आरक्षित श्रेणी (Reserved Category) से संबंधित है, राजस्थान आकर किसी पद के लिए आवेदन करता है, तो वह आरक्षण का लाभ पाने का हकदार नहीं होगा। ऐसे उम्मीदवार को 'सामान्य श्रेणी' (General Category) के अंतर्गत माना जाएगा।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की खंडपीठ (Division Bench) एक विशेष अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील सिंगल जज के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता उम्मीदवार की याचिका खारिज की गई।
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NIA केस में बरी हुए पाकिस्तानी व्यक्ति को 'फॉरेनर्स एक्ट' के तहत आवाजाही पर लगी पाबंदी लागू रहने तक रिहा नहीं किया जा सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने पाकिस्तानी नागरिक द्वारा दायर 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका खारिज की। याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ दर्ज NIA मामलों में बरी होने के बाद भारत से तुरंत रिहाई और अपने देश वापस भेजे जाने (डिपोर्टेशन) की मांग की थी।
जस्टिस अनु शिवरामन और जस्टिस के.एस. भरत की खंडपीठ ने कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ 'फॉरेनर्स एक्ट, 1946' की धारा 3(2)(e) के तहत आवाजाही पर पाबंदी का आदेश पारित किया गया, वह तब तक रिहाई की मांग नहीं कर सकता, जब तक कि उसके पास भारत में कानूनी रूप से रहने के लिए वैध वीज़ा न हो। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता ने आवाजाही पर लगी इस पाबंदी को चुनौती नहीं दी।
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प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए काम पर रखे गए क्लास-IV कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान देने से इनकार नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से काम पर रखे गए और विभिन्न क्लास-IV पदों पर काम कर रहे कर्मचारी, सरकारी क्लास-IV कर्मचारियों के लिए लागू न्यूनतम वेतनमान का लाभ पाने के हकदार हैं।
जस्टिस कुलदीप माथुर की बेंच ने 'धरिया बनाम राजस्थान राज्य' मामले में एक अन्य बेंच द्वारा दिए गए आदेश का हवाला दिया। उस मामले में इसी तरह की स्थिति वाले कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान का लाभ देने का निर्देश राज्य सरकार को दिया गया।
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पीड़ित ट्रांसजेंडर महिला है, तब भी उस पर 'महिला की लज्जा भंग करने' का आरोप लागू हो सकता है: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 75 के तहत 'महिला की लज्जा भंग करने' का अपराध तब भी माना जा सकता है, जब पीड़ित ट्रांसजेंडर व्यक्ति हो, जो खुद को महिला मानता हो।
3 नवंबर को दिए गए आदेश में जस्टिस मेहरोज़ पठान ने भारतीय सेना में 'अग्निवीर' के तौर पर काम करने वाले विशाल इंगले को आरोप मुक्त करने से इनकार किया। उस पर शादी का झांसा देकर एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति के यौन शोषण का आरोप है। पुलिस ने इस मामले में BNS की धारा 75 (महिला की लज्जा भंग करना), धारा 296 (अश्लीलता) और 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019' के संबंधित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया।
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सबूत न होने पर किसी महिला को 'अनुचित तरीके' से देखना 'यौन अनुग्रह' की मांग नहीं माना जा सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि किसी महिला को "अनुचित तरीके" से देखने के आरोप को अपने आप में BNS की धारा 75(1)(ii) के तहत 'यौन अनुग्रह' (Sexual Favours) की मांग नहीं माना जा सकता। अदालत ने एक महिला के यौन उत्पीड़न और उसे आपराधिक रूप से डराने-धमकाने के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ दायर चार्जशीट रद्द की।
धारा 75 यौन उत्पीड़न के अपराध से संबंधित है, जिसमें धारा 75(1)(ii) के अनुसार, यदि कोई पुरुष 'यौन अनुग्रह' (Sexual Favours) की मांग या अनुरोध करता है तो इसे यौन उत्पीड़न माना जाएगा।
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PMLA | BNSS की धारा 223 के तहत संज्ञान लेने से पहले के चरण में ED को आरोपी को वे सभी दस्तावेज देने होंगे, जिन पर वह भरोसा कर रही है: मद्रास हाईकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (PMLA) के तहत चल रही कार्यवाही में आरोपी को BNSS की धारा 223 के तहत यह कानूनी अधिकार है कि उसे वे सभी दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं, जिन पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) भरोसा कर रहा है। [2026 LiveLaw (Mad) 356]
जस्टिस अब्दुल कुद्दूस और जस्टिस रजनीश पथियिल की बेंच ने कहा कि BNSS की धारा 223 के पहले प्रावधान (Proviso) में बताए गए "सुनवाई का अवसर" (Opportunity of Being Heard) का उद्देश्य निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना, प्रभावी जिरह (Cross-Examination) को संभव बनाना और किसी भी तरह के पूर्वाग्रह (Prejudice) को रोकना है। कोर्ट ने कहा कि दस्तावेजों को छिपाने से आरोपी के मामले पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
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सरकारी शिक्षकों को चुनाव संबंधी कार्यों के लिए BLO के रूप में तैनात किया जा सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी शिक्षकों को चुनाव संबंधी कार्यों के लिए 'बूथ लेवल ऑफिसर' (BLO) के रूप में तैनात किया जा सकता है। इसमें मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) तैयार करने, उसमें संशोधन करने और सुधार करने से जुड़े काम भी शामिल हैं।
जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने 'बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009' (RTE Act) की धारा 27 का हवाला दिया। यह धारा स्पष्ट रूप से शिक्षकों को चुनाव संबंधी कार्यों में लगाने की अनुमति देती है और BLO के रूप में काम करना भी इसी अपवाद के दायरे में आता है।
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दिल्ली हाईकोर्ट ने NCR के कोर्ट स्टाफ और वकीलों को सर्दियों में गैर-BS-VI वाहनों पर लगी पाबंदी से छूट दी
दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि कोर्ट के स्टाफ और वकीलों को सर्दियों के दौरान वाहनों के प्रवेश पर लगी उन पाबंदियों से छूट मिलेगी, जो राष्ट्रीय राजधानी के बाहर रजिस्टर्ड और BS-VI एमिशन स्टैंडर्ड से नीचे वाले वाहनों पर लागू हैं।
जस्टिस अमित महाजन ने दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) की ओर से दायर एक याचिका पर यह आदेश दिया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह छूट केवल कोर्ट के कामकाज वाले दिनों में ही मिलेगी।
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भ्रष्टाचार के मामले में FIR दर्ज होने से पहले रिटायर हो चुका अधिकारी बिना पूर्व मंजूरी के हो सकता है अभियोजित: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 19 के तहत अभियोजन की मंजूरी (Sanction for Prosecution) की आवश्यकता उस समय लागू कानून से तय होगी, जब कथित अपराध किया गया और FIR दर्ज हुई थी। यह आवश्यकता उस कानून से तय नहीं होगी, जो ट्रायल कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के समय लागू था।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने कहा कि यदि कोई अधिकारी FIR दर्ज होने से काफी पहले सेवानिवृत्त हो चुका था और उस समय वह लोक सेवक (Public Servant) नहीं था, तो उसके खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए धारा 19 के तहत पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी।
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नोएडा संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य', लेकिन CPC की धारा 80 के तहत सरकार नहीं, मुकदमे से पहले नोटिस देना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि नोएडा (NOIDA) भले ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' की परिभाषा में आता हो, लेकिन वह न तो राज्य सरकार है और न ही केंद्र सरकार। इसलिए नोएडा के खिलाफ मुकदमा दायर करने से पहले सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 80(1) के तहत दो महीने का पूर्व नोटिस देना अनिवार्य नहीं है।
जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने कहा, “यह स्पष्ट है कि नोएडा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ में राज्य के अंतर्गत आता है, लेकिन वह न तो राज्य सरकार है और न ही केंद्र सरकार। इसलिए नोएडा के लिए धारा 80(1) की अनिवार्य शर्त लागू नहीं की जा सकती। वादी याचिकाकर्ताओं ने मुकदमा संख्या 306/2006 सही तरीके से दायर किया था। निचली अदालत मुनसरीम की पूरक रिपोर्ट स्वीकार कर दीवानी मुकदमा दर्ज करने से इनकार करने में सही नहीं है।”
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विदेशी नागरिकता के आधार पर पासपोर्ट आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि 26 जनवरी 1950 और 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में पैदा हुआ कोई भी व्यक्ति नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3 के तहत जन्म से ही भारत का नागरिक माना जाएगा (बशर्ते कि कानून में दिए गए कुछ अपवाद लागू न हों)।
कोर्ट ने कहा कि अगर आवेदक के जन्म प्रमाण पत्र से यह साबित होता है कि उसका जन्म उस तय समय के दौरान भारतीय क्षेत्र में हुआ था, तो विदेशी नागरिकता के आधार पर उसके पासपोर्ट आवेदन को खारिज नहीं किया जा सकता।
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ECI को SIR के दौरान भी पता बदलने के लिए वोटर का 'फॉर्म 8' स्वीकार करना होगा; उनसे 'फॉर्म 6' भरने के लिए नहीं कहा जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) प्रक्रिया चलने के दौरान भी कोई नागरिक अपना पता बदलने के लिए 'फॉर्म 8' जमा कर सकता है। ऐसे में उनका नाम हटाना, उनके वोट देने के अधिकार से वंचित करने के बराबर होगा।
जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को साल्गांवकर परिवार के छह सदस्यों के नाम वापस जोड़ने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि SIR प्रक्रिया के तहत जब मतदाता सूची (Roll) को नए सिरे से तैयार किया जा रहा हो, तब भी नियम 13 (धारा 22 के साथ) लागू रहता है। इसके तहत नए मतदाता के लिए 'फॉर्म 6' और पता बदलने वाले मतदाता के लिए 'फॉर्म 8' जमा करने की अनिवार्यता खत्म नहीं होती है।
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बहू को ससुराल में प्रवेश से रोकना और अपमानित करना अपने आप में 'क्रूरता' नहीं: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि किसी महिला को उसके वैवाहिक घर में प्रवेश करने से रोकने और उसका अपमान करने के आरोप, मामले की परिस्थितियों में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 85 के तहत क्रूरता का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कोर्ट ने सास और ननद के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए कहा कि उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप संबंधित अपराधों के आवश्यक कानूनी तत्वों को पूरा नहीं करते हैं।
जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की सिंगल बेंच भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में लोहरदगा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 21 अगस्त, 2025 को पारित संज्ञान आदेश और 10 अगस्त 2026 को आरोप तय करने के आदेश को चुनौती दी गई।
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NEET PG Counselling: एमपी हाईकोर्ट ने इन-सर्विस उम्मीदवारों के लिए सीट आवंटन को 30% कोटे तक सीमित किया
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि पोस्टग्रेजुएट मेडिकल कोर्सेज में इन-सर्विस (पहले से नौकरी कर रहे) उम्मीदवारों का एडमिशन, मौजूदा सीट वितरण व्यवस्था के तहत उनके लिए आरक्षित 30% सीटों तक ही सीमित रखा जाए।
चीफ जस्टिस अल्पेश कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की खंडपीठ ने कहा: "इस मामले की तात्कालिकता और सीटों के आवंटन की चल रही प्रक्रिया को देखते हुए कोर्ट यह निर्देश देना उचित समझता है कि प्रतिवादी (राज्य सरकार) यह सुनिश्चित करें कि इन-सर्विस उम्मीदवारों को ब्रांच/विषय का आवंटन, मध्य प्रदेश के सरकारी और स्वायत्त मेडिकल कॉलेजों में PG डिग्री (MD/MS) सीटों के लिए तय 30% कोटे के भीतर ही हो (NEET PG-2026-2 के अनुसार)।"
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Hindu Succession Act | पिता की मृत्यु के बाद ही बेटे को पैतृक संपत्ति में हिस्सा मिलता है, जन्मसिद्ध अधिकार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि बेटों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिल जाता। 'जन्मसिद्ध अधिकार' (Birthright) की अवधारणा 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956' की धारा 8 के तहत लागू नहीं होती है। [2026 LiveLaw (MP) 443]
यह स्पष्ट करते हुए कि बेटे अपने पिता की मृत्यु के बाद ही पैतृक संपत्ति में हिस्सा पाने के हकदार होते हैं, जस्टिस आशीष श्रोती की बेंच ने कहा: "यह स्पष्ट है कि 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम' लागू होने के बाद 'जन्मसिद्ध अधिकार' का सिद्धांत अब अस्तित्व में नहीं है। बेटे को संपत्ति में हिस्सा तभी मिलता है जब उसके पिता की मृत्यु हो जाती है। केवल उस स्थिति में, जब कोई सह-उत्तराधिकारी (Coparcener) 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम' लागू होने से पहले पैदा हुआ हो, तो धारा 6 के तहत संपत्ति जीवित बचे सह-उत्तराधिकारियों को मिल सकती है।"
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पड़ोसी की निजता में दखल देने के लिए CCTV कैमरा नहीं लगाया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि कोई भी निजी CCTV कैमरा इस तरह से नहीं लगाया जा सकता, जिससे पड़ोसी की निजता (Privacy) प्रभावित हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को अपने घर में CCTV कैमरा लगाने का अधिकार है, लेकिन इसका इस्तेमाल पड़ोसी की निजता में हस्तक्षेप करने के लिए नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने यह टिप्पणी योगेंद्र मौर्य की ओर से दायर एक रिट याचिका का निपटारा करते हुए की। याचिकाकर्ता ने अपने पड़ोसी द्वारा लगाए गए CCTV कैमरे की स्थिति पर आपत्ति जताई थी।
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सोमनाथ मंदिर के पास मांस बिक्री पर प्रतिबंध बहाल, गुजरात हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के आदेश पर लगाई रोक
गुजरात हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने शुक्रवार (30 अक्टूबर) को सोमनाथ मंदिर के आसपास मांसाहारी भोजन की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने वाली राज्य सरकार की अधिसूचना बहाल की। बता दें, यह आदेश सिंगल जज द्वारा अधिसूचना रद्द किए जाने के कुछ ही घंटे बाद आया। डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि गिर-सोमनाथ के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 10 अगस्त को जारी अंतिम अधिसूचना अगली सुनवाई तक प्रभावी रहेगी।