AIBE पास किए बिना वकालत जारी रखने वाले वकीलों के खिलाफ हो सकती है आपराधिक कार्रवाई: कर्नाटक हाईकोर्ट
Amir Ahmad
19 Oct 2026 5:01 PM IST

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि अनिवार्य दो साल की अवधि के भीतर ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास किए बिना अदालतों में वकालत जारी रखने वाले वकीलों को भारतीय दंड संहिता (IPC) और एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 45 के तहत आपराधिक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
जस्टिस एच.पी. संदेश ने स्पष्ट किया कि एडवोकेट्स एक्ट के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की व्यवस्था मौजूद होने का अर्थ यह नहीं है कि आपराधिक अदालतों का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है। यदि किसी व्यक्ति का आचरण स्वतंत्र रूप से किसी आपराधिक अपराध के तत्वों को पूरा करता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की जा सकती है।
कोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल को दिए गए अनुशासनात्मक अधिकारों का इस्तेमाल अदालतें केवल इसलिए अपने हाथ में नहीं ले सकतीं कि शिकायत में वकालत के पेशे से संबंधित आचरण का आरोप है। हालांकि, अनुशासनात्मक कार्रवाई की व्यवस्था अपने आप में सक्षम आपराधिक अदालत को ऐसे आचरण की जांच करने से नहीं रोकती, जो किसी आपराधिक अपराध के दायरे में आता हो।
इस संबंध में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें एससीबीए बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1998), आर. अंतुले बनाम रामदास श्रीनिवास नायक (1984) और बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम बोनी फोई लॉ कॉलेज (2023) शामिल हैं।
यह मामला एक वकील की ओर से दायर आपराधिक याचिका से जुड़ा था, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत बंगारपेट स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) की अदालत में लंबित कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई। शिकायतकर्ता वकील का आरोप था कि याचिकाकर्ता को 2011 में कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल (KSBC) में अनंतिम रूप से नामांकित किया गया, लेकिन उसने अनिवार्य AIBE पास किए बिना करीब एक दशक तक वकालत की। शिकायतकर्ता के अनुसार, इससे न केवल मुवक्किलों के साथ धोखाधड़ी हुई, बल्कि न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता भी प्रभावित हुई। मजिस्ट्रेट ने शिकायत को जांच के लिए CrPC की धारा 156(3) के तहत पुलिस के पास भेज दिया था।
हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट की इस कार्रवाई को सही ठहराते हुए कहा कि कथित आचरण समाज के विरुद्ध अपराध की श्रेणी में आ सकता है। जस्टिस संदेश ने सुप्रीम कोर्ट के ए.आर. अंतुले मामले का हवाला देते हुए कहा कि आपराधिक अपराध से होने वाली क्षति हमेशा केवल सीधे प्रभावित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती। कुछ अपराध पूरे समाज और संस्थागत व्यवस्था के विरुद्ध होते हैं। कानून में इसके विपरीत कोई प्रावधान न होने पर अदालत धारा 190 के तहत संज्ञान ले सकती है और मजिस्ट्रेट भी ऐसा कर सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता को कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल के पास पहले शिकायत किए बिना भी याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है। हाईकोर्ट के अनुसार, जांच के दौरान यह तय करना पुलिस की जिम्मेदारी है कि कथित कृत्य IPC की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी या अन्य अपराधों के साथ-साथ एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 45 के तहत अपराध बनाता है या नहीं। जस्टिस संदेश ने कहा कि यह जांच अधिकारी के अधिकार क्षेत्र और कर्तव्य का हिस्सा है।
हाईकोर्ट ने 7 अगस्त 2026 को कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल की ओर से राज्य के सभी मान्यता प्राप्त बार एसोसिएशनों के अध्यक्षों और सचिवों को भेजे गए पत्र का भी उल्लेख किया। इस पत्र में कहा गया था कि AIBE पास नहीं करने पर वकालत करने का लाइसेंस निलंबित किया जा सकता है। कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के 29 जुलाई 2026 के पत्र का भी जिक्र किया, जिसमें इसी तरह की स्थिति का उल्लेख था।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और स्थानीय पुलिस को याचिकाकर्ता के खिलाफ जांच आगे बढ़ाने तथा ट्रायल कोर्ट के समक्ष रिपोर्ट दाखिल करने की अनुमति दी। कोर्ट ने कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल को एक ऐसी व्यवस्था विकसित करने का भी निर्देश दिया, जिसके तहत अनिवार्य दो साल की अवधि में AIBE पास नहीं करने वाले वकीलों की पहचान स्वतः हो सके। इस व्यवस्था से नियमों का पालन नहीं करने और बिना आवश्यक योग्यता के वकालत जारी रखने वालों के मामलों को समय रहते चिह्नित किया जा सकेगा, ताकि बार काउंसिल उनके खिलाफ उचित कार्रवाई कर सके।

