स्पेशल कोर्ट में मामला ट्रांसफर होने से पहले मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने से SC/ST Act के तहत चल रही कार्यवाही अमान्य नहीं हो जाती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
23 Oct 2026 12:09 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि SC/ST Act के तहत किसी मामले को विशेष अदालत में भेजने से पहले, यदि मजिस्ट्रेट उस मामले का संज्ञान ले लेते हैं, तो इससे पूरी आपराधिक कार्यवाही अमान्य (Vitiate) नहीं हो जाती।
जस्टिस संतोष राय की बेंच ने कहा कि भले ही ACJM द्वारा शुरुआती स्तर पर संज्ञान लेना और CrPC की धारा 200 व 202 के तहत बयान दर्ज करना प्रक्रियात्मक रूप से अनियमित (Procedurally Irregular) रहा हो, लेकिन इस अनियमितता को ऐसी 'असाध्य अवैधता' (Incurable KIllegality) नहीं माना जा सकता, जिससे बाद की पूरी कार्यवाही ही अमान्य हो जाए।
इस आधार पर कोर्ट ने अजय यादव और दो अन्य लोगों द्वारा दायर की गई आपराधिक अपील खारिज की। उन्होंने बलिया की SC/ST Act स्पेशल कोर्ट के जज द्वारा 22 मई 2019 को जारी किए गए समनिंग ऑर्डर (पेश होने के आदेश) को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने कहा,
"अपीलकर्ताओं ने यह नहीं बताया कि मजिस्ट्रेट के समक्ष हुई शुरुआती कार्यवाही से उनके किस मौलिक अधिकार का हनन हुआ, या इससे न्याय प्रक्रिया में किस तरह की विफलता (Failure of Justice) आई।"
मामले का संक्षिप्त विवरण
यह शिकायत सबसे पहले एक अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) के व्यक्ति द्वारा 'एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट' (ACJM) के समक्ष दर्ज कराई गई।
आरोप है कि आरोपी लाठी-डंडे लेकर शिकायतकर्ता के घर पहुंचे, उसे जातिसूचक गालियां दीं, मारपीट की और धमकी दी कि उसे गांव में रहने नहीं दिया जाएगा।
यह भी आरोप है कि जब शिकायतकर्ता की पत्नी ने बीच-बचाव करने की कोशिश की तो आरोपियों ने उसके साथ भी गाली-गलौज और मारपीट की। साथ ही आरोपियों ने शिकायतकर्ता को जान से मारने और उसकी पत्नी को निर्वस्त्र करके पूरे गांव में घुमाने की धमकी भी दी।
संबंधित ACJM ने अपराधों का संज्ञान लिया और CrPC की धारा 200 के तहत शिकायतकर्ता का, तथा धारा 202 के तहत उसकी पत्नी का बयान दर्ज किया।
इसके बाद, जिला एवं सेशंस जज के आदेश से इस मामले को विशेष SC/ST अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया।
ACJM कोर्ट में चली इस कार्यवाही को चुनौती देते हुए आरोपी हाईकोर्ट पहुंचे थे। उनका तर्क था कि SC/ST Act की धारा 2(bd) और 14 को देखते हुए मजिस्ट्रेट के समक्ष चल रही कार्यवाही कानून के खिलाफ है। इसके बाद जारी किया गया समनिंग ऑर्डर (पेश होने का आदेश) मान्य नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने कहा कि SC/ST Act की धारा 14 में 2016 के संशोधन के तहत स्पेशल कोर्ट को यह अधिकार मिल गया कि वह मजिस्ट्रेट द्वारा मामला सौंपे (Committal) जाने की जरूरत के बिना ही, इस एक्ट के तहत होने वाले अपराधों का सीधे संज्ञान (Cognizance) ले सके। इस संशोधन का उद्देश्य एक्ट के तहत आने वाले अपराधों का जल्द से जल्द निपटारा करना है।
हालाँकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अधिकार का मतलब यह नहीं है कि मजिस्ट्रेट द्वारा पहले उठाए गए किसी भी प्रक्रियात्मक कदम (Procedural Step) की वजह से बाद की पूरी कार्यवाही ही अमान्य (Void) हो जाए।
कोर्ट ने कहा,
"इसमें यह देखना जरूरी है कि कथित अनियमितता किस तरह की है, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के कौन से प्रावधान लागू होते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या इससे किसी पक्ष को कोई नुकसान (Prejudice) पहुँचा है या न्याय मिलने में कोई बाधा आई है।"
'शांताबेन भुरभाई भुरिया बनाम आनंद अथाभाई चौधरी (2022)' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई मजिस्ट्रेट SC/ST Act के तहत अपराधों का संज्ञान ले लेता है और उसके बाद मामला स्पेशल कोर्ट में चलता है तो केवल इसी वजह से पूरी आपराधिक कार्यवाही अपने आप अमान्य नहीं हो जाती।
हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 460 और 461 का भी विश्लेषण किया। ये धाराएं उन अनियमितताओं के बीच अंतर करती हैं, जिनसे आपराधिक कार्यवाही अमान्य नहीं होती, और उन कार्यों के बीच अंतर करती हैं, जो बिना कानूनी अधिकार के किए जाते हैं और जिनसे पूरी कार्यवाही अमान्य हो जाती है।
इसमें बताया गया कि CrPC की धारा 460(e) कुछ ऐसी स्थितियों में सुरक्षा देती है, जहां कोई मजिस्ट्रेट गलती से, लेकिन नेक नीयत से मामले का संज्ञान (Cognizance) ले लेता है; बशर्ते कि इसके लिए जरूरी कानूनी शर्तें पूरी हों।
अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 460 का इस्तेमाल आँख मूंदकर हर उस काम को वैध ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता, जो धारा 461 के दायरे में आता है।
इस मामले में अदालत ने पाया कि स्पेशल जज ने मामला ट्रांसफर होने के बाद शिकायत और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर विचार किया। हाईकोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि स्पेशल जज के पास कानूनी अधिकार नहीं थे, या उनके अपनाए गए तरीके से न्याय प्रक्रिया में कोई गंभीर चूक हुई है।
अदालत ने कहा,
"सिर्फ इसलिए कि शिकायतकर्ता और एक गवाह से पहले मजिस्ट्रेट पूछताछ कर चुके थे, इस मामले की परिस्थितियों में, बाद में जारी किए गए समनिंग ऑर्डर (Summoning Order) को रद्द करने का कोई ठोस आधार नहीं बनता।"
मामले के गुण-दोष (Merits) पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि CrPC की धारा 200 और 202 के तहत दर्ज शिकायत और बयानों में कथित मारपीट, जातिसूचक अपशब्दों और धमकियों से जुड़े विशिष्ट आरोप लगाए गए।
अदालत ने कहा कि समनिंग के चरण में हर आरोप की सच्चाई या सजा सुनाने के लिए सबूत पर्याप्त हैं या नहीं, यह तय करने की जरूरत नहीं होती। अदालत ने आगे कहा कि इस चरण में गवाहों की विश्वसनीयता को तौलने या तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों को सुलझाने के लिए कोई "मिनी-ट्रायल" (छोटा ट्रायल) करने की आवश्यकता नहीं है।
इस प्रकार, कोई भी ऐसी अवैधता या कमी न मिलने पर जिसके लिए अपील के स्तर पर हस्तक्षेप की जरूरत हो, हाईकोर्ट ने अपील खारिज की। अदालत ने अपीलकर्ताओं को निर्देश दिया कि यदि उन्हें अभी तक जमानत नहीं मिली है, तो वे दो सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत में पेश हों और नियमित जमानत (Regular Bail) के लिए आवेदन करें।
Case Title : Ajai Yadav and 2 others vs. State of U.P. and another 2026 LiveLaw (AB) 869

