इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के सभी बेसिक स्कूलों के शिक्षकों के शैक्षिक और नियुक्ति दस्तावेजों के सत्यापन का निर्देश दिया: जानें क्यों

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के सभी बेसिक स्कूलों के शिक्षकों के शैक्षिक और नियुक्ति दस्तावेजों के सत्यापन का निर्देश दिया: जानें क्यों

    एक महत्वपूर्ण आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के बेसिक स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों की शैक्षिक योग्यताओं और नियुक्ति दस्तावेजों के सत्यापन का निर्देश दिया।

    शिक्षकों को निर्देश दिया गया कि वे अपने नियुक्ति पत्रों और शैक्षिक दस्तावेजों (हाई स्कूल, इंटरमीडिएट, स्नातक, B.Ed./B.T.C. (D.El.Ed., B.El.Ed. आदि), TET/CTET से जुड़े दस्तावेज) की साफ और पढ़ने योग्य प्रतियां, BSA कार्यालय से जारी अधिसूचना मिलने के 1 सप्ताह के भीतर संबंधित बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) को सौंप दें।

    जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने यह निर्देश तब जारी किया, जब उन्हें बताया गया कि राज्य में बड़ी संख्या में शिक्षकों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर या किसी अन्य व्यक्ति के दस्तावेजों का इस्तेमाल करके नौकरी हासिल की।

    पीठ ने टिप्पणी की,

    "जहां सरकार भारी संसाधन - जैसे मुफ्त पाठ्यपुस्तकें, मिड-डे मील, यूनिफॉर्म और अन्य सुविधाएं - उपलब्ध करा रही है, फिर भी प्राथमिक स्कूलों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। इसका एक मुख्य कारण शिक्षकों की गुणवत्ता हो सकती है, और यह तथ्य भी कि सरकारी सेवा में कार्यरत शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों को उस गंभीरता और ईमानदारी से नहीं निभा रहे हैं, जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है।"

    संक्षेप में मामला

    पीठ कुसुमलता नाम की एक महिला द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से गुहार लगाई कि वह संत कबीर नगर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को निर्देश दे कि वे सहायक शिक्षक के रूप में उनकी नियुक्ति को मंजूरी दें और उनका वेतन जारी करें।

    उन्होंने दावा किया कि 2 जनवरी 2006 को सिद्धार्थ नगर जिले में उनकी नियुक्ति हुई और 12 जुलाई 2010 को उन्हें पदोन्नति (प्रमोशन) मिली थी। हालांकि, 11 फरवरी 2021 को उन्हें निलंबित कर दिया गया, क्योंकि उन पर आरोप था कि उन्होंने नौकरी पाने के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया।

    राज्य के वकील के अनुसार, उनके खिलाफ शुरू की गई एक जांच में यह पाया गया कि उन्होंने गोरखपुर जिले के एक स्कूल में तैनात शिक्षिका, कुसुमलता श्रीवास्तव के जाली शैक्षिक दस्तावेजों का इस्तेमाल किया।

    8 अक्टूबर को कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह अपने सभी दस्तावेजों और दावों के साथ 12 और 13 अक्टूबर को लखनऊ में स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के सामने पेश हों।

    कोर्ट ने STF को निर्देश दिया कि वह एक सप्ताह के भीतर इन दस्तावेजों की वैधता और असलियत की जांच करे और कोर्ट को एक रिपोर्ट सौंपे।

    हालांकि, याचिकाकर्ता तय तारीखों में से किसी भी दिन STF के सामने पेश नहीं हुईं और सत्यापन के लिए अपने शैक्षिक दस्तावेज जमा करने से भी बचती रहीं।

    हालांकि पिछली सुनवाई पर उनके वकील ने बताया कि उनकी हाल ही में सर्जरी हुई है और वे बेड रेस्ट पर हैं, लेकिन जब मामला सुनवाई के लिए आया, तो उनकी ओर से कोई भी पेश नहीं हुआ।

    बेंच को यह भी बताया गया कि स्पेशल टास्क फोर्स की जांच में यह बात सामने आई है कि राज्य में बड़ी संख्या में शिक्षकों ने जाली दस्तावेजों के जरिए नौकरी हासिल की।

    बेंच को यह भी जानकारी दी गई कि कई मामलों में एक ही शैक्षिक दस्तावेजों के सेट का इस्तेमाल करके दस या उससे अधिक लोगों ने नौकरी हासिल कर ली है।

    बेंच ने एक अन्य बेंच द्वारा पहले दिए गए एक आदेश का भी जिक्र किया, जिसमें उन शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया, जिन्होंने अधिकारियों के साथ धोखाधड़ी करके नौकरी हासिल की थी। इस कार्रवाई में नियुक्ति रद्द करना और जहां संभव हो, वहां वेतन की वसूली करना शामिल था।

    इस मामले में, कोर्ट ने उन अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया, जो ऐसी फर्जी नियुक्तियों में शामिल पाए गए, जिन्होंने इसमें मदद की, या जिन्होंने जानबूझकर ऐसी नियुक्तियों को अनदेखा किया।

    हालात को देखते हुए कोर्ट ने पूरे राज्य में सत्यापन (वेरिफिकेशन) प्रक्रिया चलाने का निर्देश दिया।

    शिक्षकों को नियुक्ति पत्रों और शैक्षणिक दस्तावेजों की साफ प्रतियां जमा करने के साथ-साथ नोटरीकृत शपथ पत्र (एफिडेविट) भी दाखिल करना होगा। इसमें उन्हें अपने उन करीबी रिश्तेदारों की जानकारी देनी होगी, जो उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग में BSA या उससे ऊपर के पदों पर कार्यरत हैं या रह चुके हैं।

    इन रिश्तेदारों में पति/पत्नी, माता-पिता, बच्चे, सास-ससुर, साले-साली/देवर-ननद आदि (इन-लॉज) और चचेरे/ममेरे भाई-बहन (फर्स्ट-डिग्री कजिन्स) शामिल हैं। जिन शिक्षकों का ऐसा कोई रिश्तेदार नहीं है, उन्हें इस बारे में एक लिखित घोषणा (अंडरटेकिंग) देनी होगी।

    कोर्ट ने BSA को निर्देश दिया कि वे स्कूल के प्रधानाध्यापकों को इस आदेश का पालन सुनिश्चित करने के लिए कहें। उनके कार्यालयों को एक एक्सेल शीट तैयार करनी होगी, जिसमें हर शिक्षक का नाम, नियुक्ति की तारीख, योग्यता, उस समय के नियमों के अनुसार आवश्यक न्यूनतम योग्यता और लागू गजट नोटिफिकेशन के तहत प्राप्त मेरिट का विवरण दर्ज हो।

    इन दस्तावेजों और तैयार की गई जानकारी को संबंधित STF रेंज कार्यालय में भेजा जाना चाहिए। शिक्षा निदेशक इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेंगे, जबकि STF के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADG) सत्यापन और जांच की देखरेख करेंगे।

    कोर्ट ने चेतावनी दी कि संबंधित अधिकारियों की ओर से किसी भी तरह की "लापरवाही या कर्तव्य में कोताही" को बहुत गंभीरता से लिया जाएगा और इसके लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

    कोर्ट ने फर्जी नियुक्तियों को प्राथमिक शिक्षा की गिरती गुणवत्ता से जोड़ते हुए कहा कि छात्रों की संख्या घटने के कारण कई प्राथमिक स्कूलों का बंद होना, केवल संसाधनों की कमी का नतीजा नहीं है।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "एक शिक्षक को हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस स्तर पर वह पढ़ा रहा है, वहां केवल विषय का ज्ञान होना ही एक अच्छे शिक्षक की एकमात्र खूबी नहीं है।"

    कोर्ट ने शिक्षण कौशल (पेडागोगिक एबिलिटी), नियमित उपस्थिति, धैर्य और बच्चों के प्रति निष्पक्ष व्यवहार के महत्व पर भी जोर दिया।

    कोर्ट ने गौर किया कि बड़ी संख्या में प्राथमिक स्कूल बंद हो गए, जिसका मुख्य कारण छात्रों की संख्या में कमी आना है।

    कोर्ट ने कहा,

    "छात्रों की यह कमी संसाधनों की कमी के कारण नहीं है, बल्कि दी जा रही शिक्षा की गिरती गुणवत्ता और शिक्षकों के खराब प्रदर्शन के कारण है।"

    इस मामले की अगली सुनवाई 4 नवंबर को होगी।

    Case Title : Kusumlata vs. State Of U.P. And 2 Others 2026 LiveLaw (AB) 865

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