वकील का मुवक्किल की गोपनीय जानकारी सुरक्षित रखने का दायित्व नौकरी छोड़ने के बाद भी रहता है, यह स्थायी है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
23 Oct 2026 1:38 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि वकील का अपने मुवक्किल के साथ हुई बातचीत और उसे दी गई पेशेवर कानूनी सलाह की गोपनीयता बनाए रखने का दायित्व नौकरी या पेशेवर नियुक्ति समाप्त होने के बाद भी खत्म नहीं होता, बल्कि यह दायित्व स्थायी रहता है।
चीफ जस्टिस अल्पेश वाई. कोगजे और जस्टिस विवेक रूसिया की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के अपने पूर्व नियोक्ता से संबंधित मामला उठाने के आचरण को “बेहद आपत्तिजनक और निंदनीय” बताया।
खंडपीठ ने कहा,
“एक वकील का अपने मुवक्किल के प्रति निष्ठा और गोपनीयता बनाए रखने का अटूट दायित्व है। कानून के तहत वकील को अपने मुवक्किल की ओर से या उसके लिए पेशेवर नियुक्ति के दौरान और उसके उद्देश्य से की गई बातचीत तथा उस पर दी गई सलाह का खुलासा करने से रोका गया, जब तक कि इसके लिए स्पष्ट सहमति न हो। यह दायित्व नियुक्ति समाप्त होने के बाद खत्म नहीं होता, बल्कि स्थायी रहता है। याचिकाकर्ता पूर्व कर्मचारी होने के नाते सेवा छोड़ने के बाद अपने नियोक्ता से जुड़े मामलों को इस तरह उजागर नहीं कर सकता। उसका आचरण बेहद आपत्तिजनक और निंदनीय है।”
याचिकाकर्ता पहले सासन पावर यानी प्रतिवादी संख्या पांच के कानूनी प्रमुख के रूप में काम कर चुका था। वह बिजली संयंत्र के क्षेत्र से जुड़े भूमि अधिग्रहण मामलों की जिम्मेदारी संभालता था। कंपनी की सेवा छोड़ने के बाद उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (आर एंड आर) नीति के तहत लाभार्थियों की सूची तैयार करने और उसका सत्यापन करने में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, लाभार्थियों की एक पुरानी सूची पर सिंगरौली के उपखंड अधिकारी (SDO) ने हस्ताक्षर किए। उसने आरोप लगाया कि बाद में तैयार की गई सूची में कई गड़बड़ियां थीं। इनमें अपात्र व्यक्तियों को लाभार्थी के रूप में शामिल करना और मूल सूची में नाबालिग रहे कुछ लोगों को वयस्क दिखाना भी शामिल था, ताकि उन्हें आर्थिक लाभ दिया जा सके।
उसने आगे दावा किया कि बाद की सूची में लाभार्थियों की संख्या लगभग 300 बढ़ गई। उसके मुताबिक, इससे कथित तौर पर अपात्र व्यक्तियों को अनुचित आर्थिक लाभ मिला और सरकारी खजाने को वित्तीय नुकसान हुआ।
याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने इस संबंध में कलेक्टर को शिकायत दी थी, जिसे उचित कार्रवाई के लिए एसडीओ के पास भेज दिया गया। हालांकि, कई महीने बीत जाने के बावजूद कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख करते हुए लाभार्थियों से संबंधित रिकॉर्ड और नीति के तहत वितरित की गई रकम का विवरण पेश करने का निर्देश देने की मांग की। साथ ही, कथित अनियमितताओं की जांच कराने की भी मांग की।
याचिका शुरुआत में सिंगल जज की पीठ के समक्ष आई। सिंगल जज ने कहा कि मामले को जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए, क्योंकि याचिकाकर्ता का दावा था कि इस मामले में उसका कोई निजी हित नहीं है।
अदालत ने गौर किया कि याचिकाकर्ता ने परमादेश रिट जारी करने की मांग की थी, ताकि कलेक्टर और उपखंड अधिकारी को पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति के लाभार्थियों की पूरी सूची और एसडीओ के आदेश के अनुसार उन्हें वितरित की जाने वाली राशि सहित समस्त रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया जा सके।
हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि मामले में उसका कोई निजी हित नहीं था। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी स्थिति में याचिकाकर्ता को जनहित याचिका के माध्यम से यह मामला उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि वह संबंधित कंपनी के कार्यालय में कानूनी प्रमुख के रूप में काम कर चुका था।
वकील के निष्ठा और गोपनीयता बनाए रखने के दायित्व पर जोर देते हुए खंडपीठ ने याचिका खारिज की। अदालत ने कहा कि याचिका में कोई ठोस आधार नहीं है और याचिकाकर्ता पर 20,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।

