जमीन अधिग्रहण के 50 साल बाद मीरा कुमार को 2013 के कानून के तहत मुआवजे का हक: पटना हाईकोर्ट

  • जमीन अधिग्रहण के 50 साल बाद मीरा कुमार को 2013 के कानून के तहत मुआवजे का हक: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने लोकसभा की पूर्व स्पीकर मीरा कुमार को वर्ष 1976 में राज्य सरकार द्वारा अधिग्रहित जमीन के लिए उचित मुआवजा और पारदर्शिता के साथ भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 के तहत मुआवजा पाने का हकदार माना।

    अदालत ने पाया कि बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 4(एच) के तहत कार्यवाही शुरू करने से पहले कलेक्टर को यह साबित करना जरूरी है कि संबंधित जमीन राज्य सरकार में निहित हो चुकी है। ऐसा किए बिना कलेक्टर को इस धारा के तहत कार्यवाही शुरू करने का अधिकार नहीं है।

    जस्टिस ख़ातिम रज़ा की सिंगल जज मामले की सुनवाई कर रही थी। यह याचिका खंडपीठ द्वारा दोबारा विचार के लिए वापस भेजी गई। खंडपीठ ने निर्देश दिया था कि विवादित जमीन के संबंध में बिहार भूमि सुधार अधिनियम की धारा 4(एच) के तहत शुरू की गई कार्यवाही को ध्यान में रखते हुए पहले के फैसले पर पुनर्विचार किया जाए।

    विवाद पटना के मैनपुरा इलाके में स्थित 18 कट्ठा 10 धुर जमीन से जुड़ा है, जो लगभग 0.56 एकड़ के बराबर है। राज्य सरकार ने वर्ष 1976 में बंगाल एम्बैंकमेंट एक्ट, 1882 के तहत भूमि अधिग्रहण केस संख्या 50/1975-76 में नाले के निर्माण के लिए इस जमीन का अधिग्रहण किया। नाले का निर्माण पूरा हो चुका था, लेकिन मूल जमीन मालिक इंद्राणी देवी, जिनकी वर्ष 2002 में मृत्यु हो गई, या याचिकाकर्ता को मुआवजा नहीं दिया गया।

    रिट याचिका लंबित रहने के दौरान पटना के कलेक्टर ने 12 अप्रैल 2023 को जमाबंदी रद्दीकरण केस संख्या 1/2012-13 में आदेश पारित कर याचिकाकर्ता, उनकी मां और अन्य लोगों के नाम की जमाबंदी रद्द की। यह आदेश बिहार भूमि सुधार अधिनियम की धारा 4(एच) के तहत शुरू की गई कार्यवाही के बाद दिया गया। कलेक्टर ने विवादित जमीन से अतिक्रमण हटाने का निर्देश भी दिया।

    हाईकोर्ट ने बिहार भूमि सुधार अधिनियम की वैधानिक व्यवस्था का विश्लेषण करते हुए कहा कि धारा 4(एच) को अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत जमीन के राज्य सरकार में निहित होने की प्रक्रिया से अलग करके लागू नहीं किया जा सकता। धारा 4(एच) कलेक्टर को 1 जनवरी 1946 के बाद किए गए ऐसे हस्तांतरणों की जांच करने और उन्हें रद्द करने का अधिकार देती है, जिनका उद्देश्य अधिनियम को निष्प्रभावी करना, संपदा को नुकसान पहुंचाना या अधिक मुआवजा हासिल करना हो। हालांकि, यह अधिकार तभी इस्तेमाल किया जा सकता है, जब संबंधित संपदा पहले राज्य सरकार में निहित हो चुकी हो।

    अदालत ने कहा,

    “बिहार भूमि सुधार अधिनियम की धारा 4(एच) के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए जमीन का राज्य सरकार में निहित होना एक बुनियादी पूर्वशर्त है। धारा 4(एच) अधिनियम का स्वतंत्र प्रावधान नहीं है, बल्कि सहायक प्रकृति का है। इसे अधिनियम के मुख्य प्रावधानों को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने के उद्देश्य से बनाया गया।”

    पीठ ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की मुख्य धाराएं 3 और 4 हैं। इनके तहत राज्य सरकार अधिसूचना जारी करके किसी संपदा के राज्य में निहित होने की घोषणा करती है। अदालत के अनुसार, धारा 4(एच) का उद्देश्य इस प्रक्रिया को प्रभावी बनाना और बेईमान जमींदारों द्वारा भूमि सुधार कानून से बचने के प्रयासों को रोकना है।

    हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने ऐसी कोई अधिसूचना पेश नहीं की, जिससे यह साबित होता कि विवादित जमीन अधिनियम की धारा 3 या 3ए के तहत राज्य में निहित हो चुकी थी। राज्य ने संबंधित रिटर्न भी पेश नहीं किया, जिससे जमीन की स्थिति स्पष्ट हो सकती थी।

    अदालत ने राज्य द्वारा तैयार किए गए जमाबंदी रिकॉर्ड पर भी विचार किया। उसने कहा कि किरायेदारों के पक्ष में बनाई गई जमाबंदी और बिहार भूमि सुधार अधिनियम की धारा 28 के तहत तैयार तथा अंतिम रूप से प्रकाशित भूमि रजिस्टर में जमीन के राज्य में निहित होने को लेकर एक कानूनी अनुमान मौजूद होता है। हालांकि, कलेक्टर ने इन रिकॉर्ड पर उचित विचार नहीं किया।

    इसके बजाय कलेक्टर ने कैडस्ट्रल सर्वे खतियान में जमीन को “गैरमजरुआ आम पिछली नदी” बताए जाने वाली प्रविष्टि पर भरोसा किया। हाईकोर्ट ने कहा कि सर्वे खतियान में ऐसी प्रविष्टि अपने आप में स्वामित्व का प्रमाण नहीं है।

    अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता की मां ने विवादित जमीन वर्ष 1941 में खरीदी थी, यानी 1 जनवरी 1946 से पहले। इस तथ्य की पुष्टि कलेक्टर द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट से भी हुई।

    इन तथ्यों के आधार पर पीठ ने कहा कि कलेक्टर को 1 जनवरी 1946 से पहले हुए हस्तांतरण को रद्द करने के लिए धारा 4(एच) के तहत अधिकार क्षेत्र प्राप्त नहीं था। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की मां के पक्ष में लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी, जिसके आधार पर राज्य सरकार किराया भी स्वीकार करती रही थी, को संक्षिप्त राजस्व कार्यवाही के जरिए रद्द नहीं किया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने कहा,

    “कलेक्टर को बिहार भूमि सुधार अधिनियम की धारा 4(एच) के तहत विधिवत बनाई गई ऐसी जमाबंदी रद्द करने का अधिकार नहीं था, जिसके आधार पर राज्य सरकार किराया स्वीकार करती रही थी।”

    अदालत ने आगे कहा कि यदि राज्य सरकार वर्ष 1946 से पहले के स्वामित्व या बंदोबस्त को चुनौती देना चाहती है तो उसे संक्षिप्त राजस्व कार्यवाही के बजाय सक्षम सिविल कोर्ट का रुख करना चाहिए। इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि जमीन के राज्य में निहित होने का प्रमाण दिए बिना धारा 4(एच) के तहत कार्यवाही शुरू करना अधिकार क्षेत्र से बाहर था। इसलिए जमाबंदी रद्द करने का कलेक्टर का आदेश अवैध और अधिकार क्षेत्र के बिना पारित किया गया।

    इसके बाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1976 में अधिग्रहित जमीन के मुआवजे के दावे पर विचार किया। अदालत के सामने सवाल था कि मुआवजे की गणना पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के तहत की जाए या 2013 के अधिनियम के अनुसार।

    सुप्रीम कोर्ट के इंदौर विकास प्राधिकरण मामले में दिए गए फैसले पर भरोसा करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि 2013 के अधिनियम की धारा 24(2) में निर्धारित परिस्थितियों के तहत मुआवजा नहीं दिए जाने पर जमीन मालिक नए कानून के तहत मुआवजा पाने का हकदार हो सकता है। इसी आधार पर अदालत ने मीरा कुमार को 2013 के अधिनियम के तहत मुआवजा पाने का हकदार माना।

    अंततः हाईकोर्ट ने कलेक्टर का 12 अप्रैल 2023 का आदेश रद्द किया, याचिकाकर्ता की मां के पक्ष में बनाई गई जमाबंदी बहाल कर दी और मीरा कुमार को 2013 के कानून के तहत मुआवजा पाने का हकदार घोषित किया।

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