इलाहाबाद हाईकोट
[Divorce Law] नौकरी के लिए अलग-अलग रहने वाले पक्षकारों से परित्याग साबित नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि नौकरी के लिए अलग-अलग रहने वाले पक्षकारों से परित्याग साबित नहीं होता।पक्षकारों की शादी 1999 में हुई थी और 2000 में उनका एक बच्चा हुआ। पति झांसी में तैनात था जबकि पत्नी औरैया में तैनात थी।पक्षकार अलग-अलग रह रहे थे, इसलिए अपीलकर्ता-पति ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए मुकदमा दायर किया जिसे 2004 में एकतरफा फैसला सुनाया गया। बाद में जब 2006 में प्रतिवादी-पत्नी के कहने पर एकतरफा आदेश वापस ले लिया गया।अपीलकर्ता ने कार्यवाही वापस ले ली और परित्याग और क्रूरता का आरोप...
हाईकोर्ट की कार्रवाई से बचने के लिए ट्रायल कोर्ट के जज अक्सर बरी करने के स्पष्ट आधार के बावजूद आरोपी को दोषी करार दे देते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में देखा कि कई मामलों में जहां अभियुक्त स्पष्ट रूप से बरी होने का हकदार है, ट्रायल कोर्ट में पीठासीन अधिकारी केवल इसलिए दोषसिद्धि का फैसला सुना देते हैं क्योंकि वे हाईकोर्ट द्वारा नोटिस जारी करने और कार्रवाई से बचना चाहते हैं। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस सैयद कमर हसन रिजवी की पीठ ने दहेज हत्या के एक मामले में अलीगढ़ में सत्र न्यायालय द्वारा पारित 2010 के फैसले और आदेश के खिलाफ दायर कुछ आपराधिक अपीलों पर विचार करते हुए यह टिप्पणी की।डिवीजन बेंच ने 2010 में हाईकोर्ट के...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के खिलाफ जातिवादी टिप्पणी करने के आरोपी को जमानत दी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को संदीप तिवारी नामक व्यक्ति को जमानत दी, जिस पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के खिलाफ फेसबुक पर कुछ अपमानजनक पोस्ट करने का आरोप है।अपने आदेश में जस्टिस मोहम्मद फैज आलम खान की पीठ ने उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों, विशेषकर सोशल मीडिया पर चर्चा करते समय संयम और सम्मान के महत्व पर जोर दिया।न्यायालय ने कहा कि लोगों को अपनी राय रखने का अधिकार है- सकारात्मक या नकारात्मक और किसी व्यक्ति विशेष को पसंद या नापसंद करने का अधिकार है लेकिन ऐसी राय अपमानजनक नहीं...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के दोषी को बरी किया, जिसने 7.5 साल से अधिक समय जेल में बिताया, उसे मुआवजे के रूप में एक लाख रुपये दिए
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह हफीज खान नामक एक व्यक्ति को बरी कर दिया, जिसे मार्च 2019 में एक महिला की हत्या के मामले में सत्र न्यायालय द्वारा दोषी ठहराया गया था, क्योंकि न्यायालय ने पाया कि उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं था। अदालत ने उसके साथ हुए 'अन्याय' के लिए 'मुआवजे के तौर पर' उसे एक लाख रुपये भी दिए, क्योंकि उसे 7.5 साल से अधिक समय जेल में बिताना पड़ा।जस्टिस अताउ रहमान मसूदी और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने अपने 22 पृष्ठ के फैसले में कहा, "अब जबकि इस न्यायालय ने पाया है कि उसके खिलाफ...
जांच अधिकारी को BNSS की धारा 183 के तहत किसी विशेष गवाह का बयान दर्ज कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यह जांच एजेंसी का विशेषाधिकार है कि वह उस गवाह को प्रायोजित करे, जिसका बयान वे BNSS की धारा 183 [स्वीकारोक्ति और बयानों की रिकॉर्डिंग] के तहत दर्ज करना चाहते हैं और एक आईओ को उक्त प्रावधान के तहत किसी भी गवाह का बयान दर्ज करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।BNSS की धारा 183 CrPC 1973 की धारा 164 के लगभग समरूप है, जो स्वीकारोक्ति और बयान दर्ज करने से भी संबंधित है। जस्टिस सौरभ लवानिया की पीठ ने एक दंपति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की,...
HMA की धारा 12 के तहत 'भौतिक तथ्य' में ऐसा कोई भी तथ्य शामिल, जिसके उजागर होने पर दोनों पक्षों में से कोई भी विवाह के लिए सहमत नहीं होता: हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 12 के तहत विवाह को शून्यकरणीय घोषित करने के लिए महत्वपूर्ण तथ्य में ऐसा कोई भी तथ्य शामिल होगा, जो विवाह के लिए दी गई सहमति से संबंधित होगा और जिसके प्रकट होने पर दोनों पक्षों में से कोई भी विवाह के लिए सहमत नहीं होगा।इसने आगे कहा कि ऐसा महत्वपूर्ण तथ्य व्यक्ति के चरित्र से संबंधित होना चाहिए।धारा 12 हिंदू विवाह अधिनियम शून्यकरणीय विवाहों से संबंधित है। धारा 12(1)(सी) में कहा गया कि इस अधिनियम के लागू होने से पहले या बाद...
धारा 34(3) के तहत परिसीमा के लिए अनिवार्य शर्त के लिए पक्षकार द्वारा आर्बिट्रल अवार्ड की प्राप्ति शुरू करने के लिए सामान्य खंड अधिनियम लागू नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि पक्षकार द्वारा पंचाट की प्राप्ति मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 (3) के तहत शुरू करने के लिए एक अनिवार्य शर्त है और सामान्य खंडों की धारा 27 के तहत "डाक द्वारा सेवा" की परिभाषा लागू नहीं होती है।न्यायालय ने कहा कि सामान्य खंड अधिनियम की धारा 27 जो केंद्रीय विधान में डाक द्वारा सेवा को परिभाषित करती है यदि शब्द 'सेवा' या अभिव्यक्ति 'देना' या 'भेजना' या किसी अन्य अभिव्यक्ति का अर्थ यह है कि सेवा उस समय से प्रभावित मानी जाती है जिस समय पत्र डाक के सामान्य...
नए कारणों के अभाव में दूसरा अनंतिम कुर्की नोटिस मनमाना: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि नए या नए कारण बताए बिना दूसरा अनंतिम कुर्की नोटिस जारी करना मनमाना माना जाता है।जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा,“विभाग को बिना कोई नया कारण बताए दूसरा नोटिस, उसके बाद तीसरा और चौथा नोटिस जारी करने और चार से पांच साल तक अनंतिम कुर्की जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अगर ऐसा करने की अनुमति दी गई तो केंद्रीय माल और सेवा कर अधिनियम, 2017 की धारा 83 की उपधारा 2 निरर्थक हो जाएगी। इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं होगी।”केंद्रीय माल और सेवा कर...
सार्वजनिक ट्रस्टों के सदस्यों और प्रबंधन से संबंधित विवाद मध्यस्थता योग्य नहीं, धारा 92 सीपीसी के तहत मुकदमा दायर करना होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 92 के अंतर्गत सूचीबद्ध सार्वजनिक ट्रस्टों से संबंधित विवाद मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 के अंतर्गत मध्यस्थता योग्य नहीं हैं। चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस विकास बधवार की पीठ ने आगे कहा कि सीपीसी की धारा 89 जो न्यायालय के बाहर विवादों के निपटारे का प्रावधान करती है, धारा 92 को ओवरराइड नहीं करती है क्योंकि धारा 92 ट्रस्टों से संबंधित विवादों से निपटने के लिए एक विशिष्ट प्रावधान है।न्यायालय ने कहा कि “..धारा 89 न्यायालय के बाहर...
फैमिली कोर्ट तलाक की कार्यवाही के दौरान बाद में वापस ली गई सहमति के आधार पर तलाक नहीं दे सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट तलाक की याचिका दायर करने के समय दी गई सहमति के आधार पर तलाक नहीं दे सकता, यदि तलाक की कार्यवाही के बाद के चरण में सहमति वापस ले ली गई हो।दोनों पक्षों की शादी 2006 में हुई थी। अपीलकर्ता द्वारा अपने पति को तलाक दिए जाने के बाद उसने अपीलकर्ता-पत्नी के कारण बांझपन के आधार पर तलाक की कार्यवाही शुरू की। अपने लिखित बयान में अपीलकर्ता ने इस तथ्य पर विवाद किया और मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा गया जो विफल रही।इसके बाद मामला 2 साल तक लंबित रहा, जिसके बाद...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना मकान को गिराए जाने पर उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा
पिछले सप्ताह इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के आजमगढ़ जिले में कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना मकान को गिराए जाने पर राज्य सरकार से जवाब मांगा।जस्टिस प्रकाश पाडिया की पीठ ने उपस्थित सरकारी वकील को राजस्व विभाग के किसी सीनियर अधिकारी का हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया हो कि किन परिस्थितियों में कानून की प्रक्रिया का पालन किए बिना संबंधित मकान को गिराया गया।इसके अलावा अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर को निर्धारित की और निर्देश दिया कि जब तक अदालत उस तारीख को...
साक्ष्य के स्तर पर पत्नी के मानसिक स्वास्थ्य पर विशेषज्ञ की राय मांगने में कोई त्रुटि नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तलाक की कार्यवाही में साक्ष्य के स्तर पर पत्नी के मानसिक स्वास्थ्य पर विशेषज्ञ की राय मांगने वाले ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।अपीलकर्ता-पत्नी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसमें प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, हाथरस के आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें पति द्वारा शुरू की गई तलाक की कार्यवाही में प्रतिवादी-पति द्वारा उसकी चिकित्सा जांच के लिए आवेदन को अनुमति दी गई।अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने इसी तरह के आवेदन पर आदेश दिया कि इसे अंतिम चरण में निपटाया जाएगा।...
मिलाद-उन-नबी जुलूस | शांतिपूर्ण जुलूस निकाले जाने पर शांति सुनिश्चित करना राज्य ट्रिब्यूनल का दायित्व: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि शांतिपूर्ण जुलूस निकाले जाने पर शांति और सौहार्द सुनिश्चित करना राज्य ट्रिब्यूनल का दायित्व है।जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की पीठ ने उप-मंडल मजिस्ट्रेट, नजीबाबाद (जिला बिजनौर) को 16 सितंबर को ईद मिलादुन्नबी/बारावफात का जुलूस निकालने की अनुमति मांगने वाले आवेदन पर 15 सितंबर तक तर्कसंगत आदेश पारित करने का निर्देश देते हुए यह टिप्पणी की।खंडपीठ ने अपने आदेश में निर्देश दिया,“हम संबंधित उप-मंडल मजिस्ट्रेट को 15 सितंबर, 2024 तक तर्कसंगत आदेश पारित करने और...
न्यायिक पृथक्करण के अनुमोदन के पश्चात एक वर्ष तक पक्षकारों के बीच कोई सहवास नहीं होने पर तलाक का निर्णय बरकरार रखा जा सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 10 के तहत यदि वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के निर्णय अथवा न्यायिक पृथक्करण के निर्णय के पश्चात एक वर्ष तक पक्षकारों के बीच कोई सहवास नहीं होता है तो पृथक्करण का निर्णय बरकरार रखा जाएगा।पक्षकारों ने 08.12.2001 को विवाह किया। प्रतिवादी-पति ने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता-पत्नी ने 2002 में उसे छोड़ दिया। अपीलकर्ता ने पक्षों के बीच वैवाहिक संबंध को पुनर्जीवित नहीं किया, इसलिए उसने अपने वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की मांग करते हुए...
फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत तलाक की घोषणा के लिए मुकदमा दायर करने की कोई सीमा नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना है कि पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 7 के तहत तलाक की घोषणा के लिए मुकदमा दायर करने की कोई सीमा नहीं है। पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 7 पारिवारिक न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र का प्रावधान करती है। स्पष्टीकरण (बी) में प्रावधान है कि विवाह की वैधता या किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति के बारे में घोषणा के लिए मुकदमा या कार्यवाही पारिवारिक न्यायालय के समक्ष दायर की जा सकती है।जस्टिस विवेक कुमार बिड़ला और जस्टिस सैयद कमर हसन रिजवी की पीठ ने कहा,"यह पूरी...
जनहित याचिका | इलाहाबाद हाईकोर्ट का नाम बदलकर 'हाईकोर्ट ऑफ उत्तर प्रदेश' करने की मांग, केंद्र और हाईकोर्ट से जवाब मांगा गया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार और हाईकोर्ट से एक जनहित याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें हाईकोर्ट का नाम बदलकर आधिकारिक दस्तावेजों में "हाईकोर्ट ऑफ उत्तर प्रदेश" करने की मांग की गई है। अदालत के आदेश में कहा गया है, "याचिका की स्थिरता के सवाल और राहत दावों के लिए आपत्तियों को जनहित याचिका सिविल संख्या 14171/2020 में समन्वय पीठ के फैसले के मद्देनजर अगली तारीख पर विचार के लिए खुला रखते हुए और उस समय उठाई जाने वाली आपत्तियों को भी ध्यान में रखते हुए, विरोधी पक्षों द्वारा चार सप्ताह के...
SC/ST Act के तहत सहायक जिला सरकारी वकील द्वारा प्रथम दृष्टया शक्ति का दुरुपयोग: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जांच के निर्देश दिए
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को उस मामले की जांच करने का निर्देश दिया है जिसमें सहायक जिला सरकारी वकील के पद का दुरुपयोग अधिकारी द्वारा SC/ST Act, 1989 के तहत प्राथमिकी दर्ज करने और अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग में किया जा रहा है।याचिकाकर्ता नंबर 1 वर्तमान में जिला समाज कल्याण अधिकारी, झांसी के रूप में तैनात है और याचिकाकर्ता नंबर 2 पहले उसी पद पर तैनात था। उन्होंने प्रतिवादी-मुखबिर के इशारे पर उनके खिलाफ IPC और SC/ST Act के तहत दर्ज एफआईआर के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, इस...
लंबे समय तक अलग रहना और साथ ही बिना किसी रिश्ते को फिर से पाने की इच्छा के आपराधिक मुकदमा चलाना, शादी के टूटने को दर्शाता है, जिसे कभी ठीक नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि लंबे समय तक अलग रहना और साथ ही आपराधिक मुकदमा चलाना और वैवाहिक रिश्ते को फिर से पाने की इच्छा के बिना कठोर शब्दों का इस्तेमाल करना शादी के टूटने को दर्शाता है, जिसे कभी ठीक नहीं किया जा सकता।21 साल से अलग चल रहे वैवाहिक मामले पर विचार करते हुए जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस दोनादी रमेश की पीठ ने कहा कि युवा विवाह में कई वर्षों तक परित्याग, कठोर शब्दों का प्रयोग, पति-पत्नी द्वारा सहवास की इच्छा और प्रयास की कमी तथा दहेज की मांग के आरोप में आपराधिक मामला दर्ज करना,...
प्रथम अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष क्रॉस अपील में चुनौती दिए गए आदेश के एकल मुकदमे से उत्पन्न होने पर दो द्वितीय अपील दायर करने की आवश्यकता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि जब एक ही मुकदमे में पारित डिक्री से अलग-अलग अपीलें दायर की जाती हैं, तो मुकदमे की डिक्री पक्षों के अधिकारों को निर्धारित करती है। यह माना गया है कि ऐसे मामलों में दो अलग-अलग दूसरी अपीलें दायर करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि डिक्री के खिलाफ दो अपीलें थीं। जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र ने कहा कि, "यदि एक ही मुकदमे में अलग-अलग पहली अपीलें होती हैं, बिना किसी प्रति-दावे या किसी अन्य समेकित मुकदमे के, तो उक्त एकल मुकदमे में तैयार की गई डिक्री पक्षों के अधिकारों को...
हाईकोर्ट फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 19 के तहत अपीलीय प्राधिकरण, अनुच्छेद 142 के तहत विवाह को समाप्त करने के लिए उसके पास व्यापक शक्तियां नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
तलाक की अपील खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि उसके पास विवाह को समाप्त करने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट के समान शक्ति नहीं है, क्योंकि वह फैमिली कोर्ट एक्ट 1984 की धारा 19 के अनुसार केवल अपीलीय न्यायालय है।भारत के संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को किसी भी लंबित मामले में “पूर्ण न्याय करने के लिए कोई भी डिक्री/आदेश पारित करने का अधिकार देता है, जिसे वह आवश्यक समझे।फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 19 में फैमिली कोर्ट के आदेश के विरुद्ध हाईकोर्ट में अपील करने का...

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