इलाहाबाद हाईकोट
देरी की माफ़ी के लिए दी गई सफ़ाई की विश्वसनीयता पहले जांची जानी चाहिए: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि देरी की माफ़ी पर विचार करते समय कोर्ट को सबसे पहले उस पक्ष द्वारा दी गई सफ़ाई की विश्वसनीयता (Bona Fides) की जांच करनी चाहिए, जो ऐसी माफ़ी चाहता है।एक शादी को अमान्य घोषित करने वाले फ़ैसले के ख़िलाफ़ 654 दिनों की देरी से दायर एक अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्य वीर सिंह की बेंच ने कहा,“कोर्ट का यह फ़र्ज़ है कि वह सबसे पहले उस पक्ष द्वारा दी गई सफ़ाई की विश्वसनीयता की जांच करे, जो माफ़ी चाहता है। केवल तभी, जब मुक़दमा लड़ने वाले पक्ष...
मुकदमे में मुद्दे तय होने के 18 साल बाद शुरुआती मुद्दा नहीं उठाया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि किसी मुकदमे में, ट्रायल के दौरान मुद्दे तय होने के 18 साल बाद कोई शुरुआती मुद्दा नहीं उठाया जा सकता।जस्टिस मनीष कुमार निगम ने फैसला दिया,“मुकदमे की स्वीकार्यता (Maintainability) के संबंध में दलील पहली बार में ही प्लीडिंग (लिखित बयान) में उठाई जानी चाहिए; तभी ट्रायल कोर्ट ऐसी दलील पर, ऑर्डर XIV नियम 2 CPC के तहत शुरुआती मुद्दे के तौर पर उसके गुण-दोष के आधार पर फैसला दे सकता है।”वादी-प्रतिवादियों ने 2006 में एक मुकदमा दायर किया, जिसमें 21.05.1988 को राम आसरे...
लंबे समय तक आउटसोर्सिंग से भर्ती टालना अनुचित: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने राज्य को लगाई फटकार
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने सरकारी संस्थानों द्वारा नियमित नियुक्तियों को दरकिनार कर लंबे समय तक आउटसोर्सिंग के जरिए कर्मचारियों से काम लेने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने इसे शोषण और अन्याय को बढ़ावा देने वाला बताया।जस्टिस विक्रम डी चौहान की पीठ ने बरेली नगर निगम को निर्देश दिया कि 13 वर्षों से आउटसोर्स आधार पर काम कर रहे कंप्यूटर ऑपरेटर के नियमितीकरण पर पुनर्विचार किया जाए।कोर्ट ने कहा कि जब किसी कर्मचारी से लंबे समय तक लगातार काम लिया जाता है और उसका कार्य विभाग के लिए आवश्यक और स्थायी...
पति की मृत्यु के बाद एक्स-पार्टी तलाक रद्द नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाइकोर्ट का अहम फैसला
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पति या पत्नी की मृत्यु के बाद एक्स-पार्टी तलाक के डिक्री को रद्द नहीं किया जा सकता।अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में मुकदमा आगे नहीं बढ़ सकता और इसे पुनर्जीवित करना कानूनन संभव नहीं है।जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने यह निर्णय देते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें 30 साल पुराने तलाक को बहाल कर दिया गया था।मामले में पहली पत्नी का विवाह 1991 में एक्स-पार्टी डिक्री के जरिए समाप्त हो गया। इसके बाद पति ने...
जमीन आवंटन के बाद भी खत्म नहीं होती SDM की जिम्मेदारी: इलाहाबाद हाइकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि जमीन का आवंटन करने के बाद भी उपजिलाधिकारी (SDM) की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती बल्कि उन्हें आवंटी के कब्जे की सुरक्षा तब तक करनी होती है, जब तक जमीन का स्वामित्व राज्य के पास रहता है।जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा 65 के तहत SDM को यह अधिकार और कर्तव्य है कि वह अवैध कब्जे को हटाकर आवंटी को जमीन पर कब्जा दिलाएं और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करें।अदालत ने कहा कि यदि SDM की भूमिका...
नाबालिग से छेड़छाड़ के बाद आत्महत्या का मामला: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने POCSO आरोपी की जमानत रद्द की
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने गंभीर मामले में POCSO आरोपी की जमानत रद्द की, जिस पर आरोप है कि जमानत पर छूटने के बाद उसने नाबालिग पीड़िता को फिर से परेशान किया, जिसके चलते उसने आत्महत्या कर ली।जस्टिस बृज राज सिंह की पीठ ने पाया कि आरोपी ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया और मिली स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया। अदालत ने उसे दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।मामले में पीड़िता के पिता ने अदालत का रुख करते हुए आरोपी की जमानत रद्द करने की मांग की थी।आरोप है कि आरोपी पहले से ही नाबालिग के साथ...
एटा में मिली जैन प्रतिमा को प्रयागराज के सेंट्रल म्यूजियम में सुरक्षित रखने का निर्देश, विशेषज्ञ समिति गठित करने को कहा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एटा में मिली एक प्राचीन जैन प्रतिमा को प्रयागराज के सेंट्रल म्यूजियम में सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है। साथ ही, कोर्ट ने प्रतिमा के स्वरूप, प्रकृति और उससे जुड़े जैन समुदाय के संप्रदाय (दिगंबर या श्वेतांबर) की पहचान तय करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने को कहा है।जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने कहा कि प्रतिमा ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और इसे 9वीं-10वीं शताब्दी का बताया जा रहा है। साथ ही, जैन समुदाय के दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदायों के...
पेड़ काटने की अनुमति से इनकार से पहले सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि उत्तर प्रदेश वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 1976 की धारा 5 के तहत यदि सक्षम प्राधिकारी किसी व्यक्ति के पेड़ काटने या हटाने के आवेदन को खारिज करना चाहता है, तो उससे पहले आवेदक को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने कहा कि धारा 5(2) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि बिना सुनवाई का अवसर दिए अनुमति को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अधिकारी धारा 5(1) के तहत प्राप्त रिपोर्ट से...
पेपर लीक होने पर परीक्षा पूरी कराने का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला देते हुए कहा कि यदि किसी परीक्षा में पेपर लीक हो जाए और उससे अभ्यर्थियों को लाभ मिलने की आशंका हो तो उम्मीदवार राज्य को परीक्षा प्रक्रिया पूरी कराने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा कि चयन का कोई अटूट अधिकार नहीं होता और यदि परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठ जाए तो उसे रद्द करना उचित है।कोर्ट ने कहा,“परीक्षा की निष्पक्षता सर्वोपरि है और किसी भी स्थिति में इससे समझौता नहीं किया जा सकता।”मामला उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग द्वारा सहायक...
अनुशासनात्मक कार्रवाई की समय-सीमा कोर्ट खुद बढ़ा सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि गंभीर कदाचार के मामलों में सजा से बचने की स्थिति न बने, इसके लिए अदालत अपने आप (स्वतः संज्ञान लेते हुए) अनुशासनात्मक कार्यवाही की तय समय-सीमा बढ़ा सकती है।जस्टिस संगीता चंद्रा और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कहा कि यदि नियोक्ता समय बढ़ाने के लिए कोर्ट नहीं भी जाता है तब भी अदालत मामले की सुनवाई करते समय परिस्थितियों का आकलन कर सकती है और आवश्यक होने पर समय-सीमा बढ़ा सकती है।कोर्ट ने कहा,“ऐसे मामलों में जहां कार्यवाही तय समय में पूरी...
RTI Act के तहत जानकारी देने में जानबूझकर देरी या बाधा हो तभी लगेगा जुर्माना: इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूचना के अधिकार कानून (RTI Act) को लेकर एक अहम फैसला देते हुए कहा कि केवल देरी या कमी के आधार पर दंड नहीं लगाया जा सकता।अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो कि सूचना देने में जानबूझकर बाधा डाली गई या दुर्भावना से देरी की गई तब तक दंड नहीं लगाया जा सकता।जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने कहा कि RTI Act, 2005 की धारा 20 के तहत दंड लगाने से पहले आयोग को यह संतोष करना जरूरी है कि संबंधित अधिकारी ने बिना उचित कारण के सूचना देने से इनकार किया, गलत...
बेटे-बेटी की शादी तय करने के लिए पैरोल नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि किसी दोषी कैदी को केवल अपने बच्चों की शादी तय करने या उसके लिए प्रयास करने के आधार पर पैरोल नहीं दी जा सकती।अदालत ने यह भी कहा कि जिन कैदियों के खिलाफ अन्य आपराधिक मामले लंबित हैं, वे कानूनन पैरोल के हकदार नहीं हैं।यह फैसला पूर्व विधायक अंगद यादव की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती की खंडपीठ ने दिया।बता दें, अंगद यादव 1995 के एक हत्या मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं और उनकी अपीलें पहले ही हाइकोर्ट और...
रजिस्ट्रार, सब-रजिस्ट्रार 'कोर्ट' नहीं, रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत कार्यवाही में लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 लागू नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत रजिस्ट्रार और सब-रजिस्ट्रार 'कोर्ट' नहीं हैं। इसलिए रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत होने वाली कार्यवाहियों पर लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 लागू नहीं होगी।जस्टिस इरशाद अली ने फैसला सुनाया:“रजिस्ट्रार, एडिशनल रजिस्ट्रार या सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय को 'कोर्ट' नहीं माना जा सकता। तदनुसार, रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत होने वाली कार्यवाही में लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 में निहित प्रावधान लागू नहीं होगा। लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 स्पष्ट रूप से समय सीमा (Limitation...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1983 के हत्या के प्रयास के मामले में व्यक्ति की सज़ा बरकरार रखने के लिए पीड़ित पत्नी की गवाही पर भरोसा किया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते एक व्यक्ति की सज़ा और 7 साल की कठोर कारावास बरकरार रखी। इस व्यक्ति ने फ़रवरी 1983 में अपने वैवाहिक घर के अंदर अपनी पत्नी को गोली मार दी थी, क्योंकि मोटरसाइकिल की दहेज की मांग पूरी नहीं हुई।1985 में पति द्वारा दायर की गई आपराधिक अपील खारिज करते हुए कोर्ट ने घायल पत्नी की गवाही पर बहुत ज़्यादा भरोसा किया और उसे एक "बेहतरीन गवाह" बताया, जिसकी गवाही पूरी तरह से भरोसेमंद थी।पति की सज़ा बरकरार रखने वाले अपने 16-पृष्ठ के आदेश में जस्टिस अब्दुल शाहिद की बेंच ने पत्नी की...
CrPC की धारा 482 याचिका NIA कोर्ट द्वारा डिस्चार्ज से इनकार के खिलाफ स्वीकार्य नहीं, भले ही राज्य पुलिस ने शेड्यूल अपराध की जांच की हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) एक्ट के तहत एक स्पेशल कोर्ट द्वारा डिस्चार्ज से इनकार करने वाले आदेश के खिलाफ CrPC की धारा 482 या BNSS की धारा 528 के तहत दायर याचिका स्वीकार्य नहीं है, भले ही राज्य पुलिस ने शेड्यूल अपराध की जांच की हो।कोर्ट ने माना कि ऐसे आदेशों के खिलाफ उपाय NIA Act, 2008 की धारा 21(1) के तहत एक वैधानिक अपील दायर करना है।इस प्रकार, जस्टिस बृज राज सिंह की बेंच ने मोहम्मद फैजान और 2 अन्य द्वारा दायर याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने स्पेशल जज...
पश्चिमी यूपी में 'गैंग' मौत के बिस्तर पर पड़े लोगों का इंश्योरेंस करवा रहा है, पुलिस सहयोग नहीं कर रही: HDFC Life ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में बताया
HDFC Life Insurance Company ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक संगठित गैंग काम कर रहा है, जो उन लोगों के लिए जीवन बीमा पॉलिसी हासिल करने में कामयाब हो जाता है, जो पहले से ही मौत के बिस्तर पर पड़े हैं या जिनकी मौत हो चुकी है।कंपनी ने यह भी बताया कि शिकायतें मिलने के बावजूद, इनमें से ज़्यादातर मामलों में पुलिस निष्पक्ष जांच करके दोषियों को सज़ा दिलाने में सहयोग नहीं करती है।यह बात जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच के सामने रखी गई, जिसने हाल ही में बिचौलियों के ज़रिए...
कथित तौर पर 45 साल पहले हुई बिक्री विलेख के आधार पर म्यूटेशन की अनुमति नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि भले ही राजस्व रिकॉर्ड में म्यूटेशन (नाम परिवर्तन) के लिए कोई समय सीमा निर्धारित न हो, लेकिन कथित तौर पर 45 साल पहले हुई किसी बिक्री विलेख (Sale Deed) के आधार पर इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।जस्टिस चंद्र कुमार राय ने टिप्पणी की:"यह बताना महत्वपूर्ण है कि निजी प्रतिवादियों ने 45 साल से भी अधिक समय बाद म्यूटेशन के लिए आवेदन दायर किया। यह आवेदन उस सेल डीड के आधार पर किया गया, जिसके बारे में दावा है कि वह उनके पक्ष में निष्पादित किया गया। इसकी अनुमति नहीं दी जानी...
केवल एक ही वारिस हो और कोई प्रतिस्पर्धी दावा न हो, वहां उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए ज़मानत की आवश्यकता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 375 के तहत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने के लिए ज़मानत की शर्त हर मामले में बिना सोचे-समझे नहीं लगाई जा सकती। कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में केवल एक ही वारिस हो, या किसी एक वारिस को प्रमाण पत्र जारी करने पर कोई आपत्ति न हो, वहां ऐसी शर्तें नहीं लगाई जानी चाहिए।भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 उन आवेदनों के बारे में बताती है, जो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए ज़िला जज के समक्ष किए जा सकते हैं।...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी वकील के दफ़्तर में डिजिटल काम को बेहतर बनाने के लिए टेक-सेवी युवा वकीलों को रखने का सुझाव दिया
डिजिटल काम को बेहतर बनाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुझाव दिया कि उत्तर प्रदेश सरकार को सरकारी वकील के दफ़्तर और हाईकोर्ट में जॉइंट डायरेक्टर, प्रॉसिक्यूशन के दफ़्तर में टेक-सेवी युवा वकीलों और नए लॉ ग्रेजुएट्स को मानद रिसर्च एसोसिएट के तौर पर रखना चाहिए।जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने यह सुझाव दिया। बेंच ने कहा कि सरकारी वकील के दफ़्तर में डिजिटलीकरण के प्रयासों को तेज़ करना और कर्मचारियों की भारी कमी को तुरंत दूर करना समय की ज़रूरत है।कोर्ट असल में एक ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई कर रहा...
अधिकारियों की देरी, किसान कल्याण दावे को खारिज करने का आधार नहीं; लाभार्थी की दुर्दशा के प्रति उदासीनता अस्वीकार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाओं के तहत एक मृत किसान के परिवार द्वारा मांगी गई वित्तीय सहायता से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अधिकारियों की निष्क्रियता के कारण किसी कल्याणकारी योजना के तहत ऐसी सहायता पाने के लिए किसान की विधवा को बार-बार कोर्ट के चक्कर लगवाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने टिप्पणी की,“इस तरह की प्रशासनिक कार्रवाई, जिसमें किसी कल्याणकारी योजना के लाभार्थी की दुर्दशा के...


















