10 साल से जेल में बंद हत्या के आरोपी को जमानत: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा- त्वरित न्याय के लिए सभी पक्षों को निभानी होगी जिम्मेदारी

Amir Ahmad

23 Jun 2026 1:33 PM IST

  • 10 साल से जेल में बंद हत्या के आरोपी को जमानत: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा- त्वरित न्याय के लिए सभी पक्षों को निभानी होगी जिम्मेदारी

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने लगभग दस वर्षों से न्यायिक हिरासत में बंद एक हत्या के आरोपी को जमानत देते हुए कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुकदमे के जल्द पूरा होने की संभावना न होने पर किसी विचाराधीन कैदी को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।

    जस्टिस आलोक महरा ने यह आदेश हत्या और शस्त्र अधिनियम से जुड़े एक मामले में नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।

    मामले के अनुसार आरोपी 13 जुलाई 2016 से न्यायिक हिरासत में था। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उसने एक बार के भीतर मृतक पर गोली चलाई, जबकि उसके दो सह-आरोपी हथियारों के साथ मौके पर मौजूद थे।

    याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि अब तक 16 गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं लेकिन मुकदमा अभी तक पूरा नहीं हुआ। विशेष रूप से अभियोजन पक्ष के गवाह संख्या-14, जो एक पुलिस अधिकारी हैं बार-बार अदालत में उपस्थित नहीं हुए। वर्ष 2019 से 2025 के बीच उनकी जिरह के लिए लगभग 50 तारीखें तय की गईं, लेकिन अधिकांश अवसरों पर वह अदालत नहीं पहुंचे।

    राज्य सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी पर हत्या जैसा गंभीर आरोप है। साथ ही यह भी दलील दी गई कि संबंधित पुलिस अधिकारी सरकारी दायित्वों में व्यस्त रहने के कारण निकट भविष्य में भी उनकी जिरह पूरी होने की संभावना कम है।

    अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि आरोपी लगभग दस वर्षों से विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में है और मुकदमे का समापन अभी दूर दिखाई देता है। अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोपी को पूर्व में कई बार अल्पकालिक जमानत मिली थी और उसने कभी भी उस स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं किया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार अनुच्छेद 21 का महत्वपूर्ण हिस्सा है और मुकदमे के निष्कर्ष की कोई स्पष्ट संभावना न होने की स्थिति में लंबे समय तक कारावास उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को जमानत दी।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने गवाहों की अनुपस्थिति पर भी गंभीर चिंता जताई। हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित पुलिस अधिकारी 50 से अधिक तारीखों पर जिरह के लिए अदालत में उपस्थित नहीं हुए, जिसके कारण मुकदमे की कार्यवाही लंबे समय तक बाधित रही।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    "ऐसा आचरण, विशेष रूप से एक लोक सेवक द्वारा, जो आपराधिक न्याय व्यवस्था में अदालत की सहायता करने के लिए बाध्य है मुकदमे में अनावश्यक देरी का कारण बना है।"

    हाईकोर्ट ने कहा कि बार-बार स्थगन और गवाहों की अनुपस्थिति से केवल आरोपी ही नहीं, बल्कि पीड़ित पक्ष, गवाह और पूरा समाज प्रभावित होता है। अदालत ने जोर देकर कहा कि त्वरित न्याय की संवैधानिक अवधारणा तभी साकार हो सकती है, जब जांच एजेंसियां, अभियोजन पक्ष और ट्रायल कोर्ट सभी पूरी जिम्मेदारी और तत्परता के साथ कार्य करें।

    अदालत ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि गवाह संख्या-14 की उपस्थिति सुनिश्चित कर उनकी जिरह शीघ्र पूरी कराई जाए। यदि वह बिना पर्याप्त कारण के फिर अनुपस्थित रहते हैं तो अदालत उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने तथा संबंधित विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति करने के लिए स्वतंत्र होगी।

    इसके अलावा, हाईकोर्ट ने वर्ष 2016 से लंबित सत्र वाद का जल्द निस्तारण करने का निर्देश दिया और अनावश्यक स्थगन देने से बचने को कहा।

    अदालत ने राज्यभर के अभियोजन अधिकारियों और पुलिस कर्मियों को भी निर्देश दिया कि वे ट्रायल कोर्टों को पूरा सहयोग दें, ताकि गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित हो सके और लंबे समय से लंबित आपराधिक मुकदमों का शीघ्र निपटारा हो।

    हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति राज्य के सभी जिला जजों और पुलिस महानिदेशक को भेजने का भी निर्देश दिया ताकि आदेश का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जा सके।

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