FIR दर्ज होने से पहले गिरफ्तारी मेमो पर केस नंबर होना गंभीर संदेह पैदा करता है: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने NDPS मामले में दी जमानत
Amir Ahmad
18 May 2026 1:13 PM IST

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मादक पदार्थ मामले में गिरफ्तार आरोपी को जमानत देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि गिरफ्तारी मेमो और जब्ती सूची पर FIR दर्ज होने से पहले ही FIR नंबर अंकित हो तो इससे पूरी कार्रवाई संदिग्ध हो जाती है और गिरफ्तारी प्रथम दृष्टया अवैध मानी जा सकती है।
जस्टिस आशीष नैथानी ने NDPS Act की धाराओं 8, 21 और 60 के तहत दर्ज मामले में आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।
अभियोजन के अनुसार पुलिस टीम नियमित जांच और अपराध नियंत्रण ड्यूटी के दौरान मोटरसाइकिल सवार आरोपी को रोककर तलाशी ली थी। पुलिस का दावा था कि NDPS Act की धारा 50 की जानकारी देने के बाद आरोपी के बैग की तलाशी ली गई, जिसमें से 1.042 किलोग्राम स्मैक बरामद हुई।
FIR में यह भी कहा गया कि आरोपी जिस मोटरसाइकिल को चला रहा था वह किसी अन्य व्यक्ति की थी और वह वाहन के दस्तावेज तथा वैध ड्राइविंग लाइसेंस प्रस्तुत नहीं कर पाया। इसके बाद मोटर वाहन अधिनियम के तहत भी कार्रवाई की गई।
वहीं आरोपी ने अदालत में दावा किया कि उसे झूठा फंसाया गया और कथित बरामदगी मौके से नहीं बल्कि उसके गोदाम से दिखाई गई। आरोपी की ओर से कहा गया कि गिरफ्तारी के बाद जो गिरफ्तारी मेमो और जब्ती सूची तैयार की गई, उन दस्तावेजों पर पहले से ही FIR नंबर दर्ज था, जबकि उस समय तक FIR दर्ज ही नहीं हुई थी।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि किसी भी अपराध संख्या का अस्तित्व FIR दर्ज होने के बाद ही संभव है। ऐसे में दस्तावेजों पर पहले से FIR नंबर होना यह दर्शाता है कि रिकॉर्ड बाद में तैयार कर उसे पूर्व समय का दिखाया गया।
राज्य सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि कोई रिकॉर्ड फर्जी नहीं है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि FIR दर्ज होने के बाद पेन से एफआईआर नंबर जोड़ा गया था। साथ ही आरोपी के आपराधिक इतिहास का भी हवाला दिया गया।
हालांकि, रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी मेमो और जब्ती सूची, जिन्हें FIR से पहले तैयार बताया गया, उन पर FIR नंबर का होना पूरी प्रक्रिया को स्वाभाविक रूप से संदिग्ध बनाता है।
अदालत ने कहा,
“यह स्थिति दर्शाती है कि या तो FIR पहले ही दर्ज हो चुकी थी लेकिन बाद में दर्ज दिखाया गया, या फिर दस्तावेज FIR के बाद तैयार कर उन्हें पूर्व समय का दर्शाया गया। दोनों ही परिस्थितियों में NDPS Act के तहत निर्धारित प्रक्रिया की पवित्रता प्रभावित होती है।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी परिस्थितियों में गिरफ्तारी प्रथम दृष्टया अवैध प्रतीत होती है।
मामले के समग्र तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आरोपी को जमानत देने योग्य माना और निजी मुचलका तथा जमानतदार प्रस्तुत करने की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया।

