'हस्तक्षेप करने वाले द्वारा उठाई गई आपत्तियां, डिक्री धारक के निष्पादन कार्यवाही वापस लेने के अधिकार को खत्म नहीं कर सकतीं': उत्तराखंड हाईकोर्ट

Shahadat

22 May 2026 7:32 PM IST

  • हस्तक्षेप करने वाले द्वारा उठाई गई आपत्तियां, डिक्री धारक के निष्पादन कार्यवाही वापस लेने के अधिकार को खत्म नहीं कर सकतीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि किसी हस्तक्षेप करने वाले (Intervener) द्वारा उठाई गई आपत्तियां, डिक्री धारक के निष्पादन कार्यवाही वापस लेने के अधिकार को खत्म नहीं कर सकतीं; खासकर तब, जब मूल कार्यवाही में हस्तक्षेप करने वाले के खिलाफ कोई ठोस फैसला (Substantive Adjudication) कभी नहीं दिया गया हो। कोर्ट ने टिप्पणी की कि निष्पादन कार्यवाही को किसी तीसरे पक्ष के अधिकारों पर फैसला देने के लिए एक स्वतंत्र मंच में नहीं बदला जा सकता, जो मूल मामले में कभी पक्षकार नहीं था।

    जस्टिस आलोक मेहरा 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' की धारा 12 के तहत दायर आवेदन से उपजी कार्यवाही में एग्जिक्यूटिंग कोर्ट द्वारा पारित एक आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक विविध याचिका (Criminal Miscellaneous Application) पर सुनवाई कर रहे थे।

    याचिकाकर्ता ने मूल रूप से अपने पति और सास के खिलाफ घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत राहत की मांग करते हुए कार्यवाही शुरू की थी। न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उसे निवास का अधिकार देने के साथ-साथ 25,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था; जिसे बाद में अपील में घटाकर 20,000 रुपये प्रति माह कर दिया गया, जबकि निवास के अधिकार को बरकरार रखा गया।

    इसके बाद प्रतिवादी ने अपील वाले आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन कार्यवाहियों के लंबित रहने के दौरान, प्रतिवादी की सौतेली बहन ने हस्तक्षेप के लिए आवेदन दायर किया और उसे भरण-पोषण की बकाया राशि की वसूली के लिए शुरू की गई निष्पादन कार्यवाही में एग्जिक्यूटिंग कोर्ट के समक्ष आपत्तियां उठाने की अनुमति दी गई। बाद में पति-पत्नी के बीच सुलह के प्रयास शुरू किए गए।

    याचिकाकर्ता ने एग्जिक्यूटिंग कोर्ट में एक आवेदन दायर कर निष्पादन कार्यवाही वापस लेने की मांग की। हालांकि, एग्जिक्यूटिंग कोर्ट ने इस आधार पर वापसी के आवेदन पर विचार करना टाल दिया कि हस्तक्षेप करने वाले द्वारा उठाई गई आपत्तियां अभी भी विचाराधीन थीं।

    कोर्ट ने टिप्पणी की कि हस्तक्षेप करने वाला न तो घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मूल कार्यवाही में कोई पक्षकार था, और न ही निष्पादन कार्यवाही में कोई 'निर्णय-ऋणी' (judgment-debtor) था। कोर्ट ने आगे कहा कि मूल मामले में हस्तक्षेप करने वाले के खिलाफ कभी कोई राहत नहीं मांगी गई। कोर्ट ने फैसला दिया कि जब डिक्री धारक स्वयं ही पति-पत्नी के बीच सुलह के प्रयासों के कारण निष्पादन कार्यवाही को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी तो निष्पादन कोर्ट को निष्पादन मामले को वापस लेने की अनुमति दे देनी चाहिए थी।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "हस्तक्षेप करने वाले द्वारा उठाई जाने वाली आपत्तियां याचिकाकर्ता के अपनी स्वयं की निष्पादन कार्यवाही वापस लेने के अधिकार पर भारी नहीं पड़ सकती थीं; खासकर तब, जब मूल कार्यवाही में हस्तक्षेप करने वाले के खिलाफ कभी कोई ठोस फैसला नहीं दिया गया।"

    अदालत ने यह माना कि निष्पादन कार्यवाही का दायरा केवल उस डिक्री या आदेश को लागू करने तक ही सीमित है, जिसका निष्पादन चाहा गया। इसे तीसरे पक्षों के अधिकारों का निर्धारण करने के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक मंच के रूप में विस्तृत नहीं किया जा सकता। इसलिए अदालत ने यह माना कि एग्जिक्यूटिंग कोर्ट ने निष्कासन आवेदन पर विचार को केवल इस आधार पर स्थगित करके स्पष्ट रूप से अवैध कार्य किया कि हस्तक्षेपकर्ता की आपत्तियां अभी लंबित थीं।

    तदनुसार, अदालत ने आवेदन स्वीकार किया, दिनांक 16 अप्रैल 2025 का विवादित आदेश रद्द किया और निष्पादन कार्यवाही को वापस लेने की अनुमति दी।

    Case Title: Nirmaljit Kaur v. Trilok Singh [C528 No.709 of 2025]

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