आउटसोर्स कर्मचारियों को पदोन्नति का अधिकार नहीं, बिना अधिकार बदला गया पदनाम सुधारा जा सकता है: उत्तराखंड हाईकोर्ट
Amir Ahmad
16 Jun 2026 1:43 PM IST

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि आउटसोर्स या संविदा कर्मचारी नियमित सरकारी कर्मचारियों जैसी स्थिति स्वतः प्राप्त नहीं कर लेते। केवल लंबे समय तक सेवा में बने रहने से राज्य सरकार और कर्मचारी के बीच प्रत्यक्ष नियोक्ता-कर्मचारी संबंध स्थापित नहीं माना जा सकता।
जस्टिस मनोज कुमार तिवारी की पीठ ने यह टिप्पणी उन दो कर्मचारियों की याचिका खारिज करते हुए की, जिन्हें उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम (UPNL) के माध्यम से संविदा पर स्टेनोग्राफर के रूप में नियुक्त किया गया।
मामले में याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वर्ष 2021 में तत्कालीन मुख्य महाप्रबंधक ने उनका पदनाम बढ़ाकर वरिष्ठ निजी सहायक कर दिया था।
हालांकि वर्ष 2026 में जारी एक आदेश के जरिए उत्तराखंड जल संस्थान ने उनका पदनाम पुनः स्टेनोग्राफर कर दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि एक बार उनका पदनाम वरिष्ठ निजी सहायक कर दिया गया तो उन्हें उसी पद पर बने रहने का अधिकार है। वहीं उत्तराखंड जल संस्थान ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता आउटसोर्स कर्मचारी हैं और उन्हें UPNL ने केवल स्टेनोग्राफर पद के लिए प्रायोजित किया।
ऐसे में उन्हें पदोन्नति देने या उच्च पद का दर्जा देने का कोई कानूनी अधिकार संस्थान के पास नहीं था।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के आदेशों और संबंधित नियमों का परीक्षण करते हुए कहा कि आउटसोर्स कर्मचारियों को पदोन्नति का कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि तत्कालीन मुख्य महाप्रबंधक द्वारा पदनाम बदलने का निर्णय विधिक अधिकार के बिना लिया गया।
अदालत ने कहा,
"कानून पूरी तरह स्पष्ट है कि आउटसोर्स कर्मचारियों को पदोन्नति का दावा करने का अधिकार नहीं है। इसलिए मुख्य महाप्रबंधक द्वारा किया गया पदनाम परिवर्तन विधिक अधिकार के बिना था और सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसे मूल स्थिति में बहाल करना पूरी तरह उचित है।"
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्ति किसी आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से होती है, इसलिए उनका संबंधित विभाग के साथ प्रत्यक्ष सेवा संबंध नहीं माना जा सकता।
ऐसी स्थिति में विभाग उन्हें नियमित कर्मचारियों की तरह पदोन्नति या उच्च पद का दर्जा नहीं दे सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को भविष्य में सरकार की किसी नीति के तहत जो भी लाभ मिल सकते हैं उन पर इस आदेश का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, वरिष्ठ निजी सहायक के पद पर बने रहने का उनका दावा कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की और उत्तराखंड जल संस्थान का आदेश बरकरार रखा।

