सुप्रीम कोर्ट

IBC प्रक्रिया, डिक्री के निष्पादन या वसूली की कार्यवाही का विकल्प नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (23 अप्रैल) को फिर दोहराया कि कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) का इस्तेमाल, पैसे से जुड़ी किसी डिक्री को लागू करने के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब कंपनी आर्थिक रूप से सक्षम हो और काम कर रही हो।जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच कॉर्पोरेट देनदार द्वारा NCLAT के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें देनदार के खिलाफ CIRP शुरू करने की अनुमति दी गई।विवाद का मुख्य मुद्दा यह था कि क्या कोई डिक्री-धारक लेनदार...

सरकारी अनुदान वाली संपत्तियों पर किराया कानून लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के खिलाफ बेदखली आदेश रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि Government Grants Act, 1895 के तहत दी गई संपत्तियों पर किराया नियंत्रण कानून लागू नहीं होते और ऐसे मामलों में पक्षकारों के अधिकार केवल लीज (अनुदान) की शर्तों से तय होंगे। इसी आधार पर अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें भारत सरकार को किराया न चुकाने के कारण बेदखल करने का निर्देश दिया गया था।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि लीज डीड में किराया न देने पर बेदखली का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो...

अगर घायल चश्मदीद की गवाही बहुत मज़बूत हो तो स्वतंत्र गवाह की जांच न होना केस के लिए घातक नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हत्या के मामले में सज़ा को सही ठहराते हुए कहा कि अगर घायल चश्मदीद की अकेली गवाही भरोसेमंद, विश्वसनीय और एक जैसी हो तो किसी स्वतंत्र गवाह की जाँच न होना अभियोजन पक्ष के केस के लिए घातक साबित नहीं होगा।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने टिप्पणी की,"...सिर्फ़ एक चश्मदीद की गवाही के आधार पर भी सज़ा देना जायज़ है। आख़िरकार, रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों को उनकी गुणवत्ता के आधार पर मापा जाना चाहिए, न कि उनकी संख्या के आधार पर।" बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए...

S. 225 BNSS | मजिस्ट्रेट को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले जांच का आदेश देना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि मजिस्ट्रेट को अपने क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 225 के तहत जांच करनी चाहिए या जांच का निर्देश देना चाहिए।दूसरे शब्दों में, यदि किसी व्यक्ति पर किसी आपराधिक शिकायत में आरोप लगाया गया और वह अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहता है तो अदालत ने कहा कि मैजिस्ट्रेट धारा 225 BNSS के आदेश का पालन किए बिना तुरंत समन जारी नहीं कर सकता।बेंच ने कहा,"...मजिस्ट्रेट के लिए यह...

Order 7 Rule 11 CPC | मूल्यांकन या कोर्ट फीस में कमी के आधार पर वाद-पत्र को बिना सुधार का मौका दिए खारिज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यह फैसला दिया कि किसी वाद के मूल्यांकन में कमी या कोर्ट फीस के भुगतान में कमी के आधार पर किसी वादी को CPC के आदेश 7 नियम 11 के तहत अपने आप ही खारिज (Non-Suited) नहीं किया जा सकता। चूंकि ये दोनों कमियां सुधारी जा सकने वाली हैं, इसलिए वादी को सुधार का मौका दिया जाना चाहिए। साथ ही वाद को तभी खारिज किया जाना चाहिए, जब वह इस मौके का पालन न करे।कोर्ट ने कहा,"आदेश VII नियम 11(b) या (c) के तहत किसी वाद-पत्र खारिज करना, केवल कम मूल्यांकन या कोर्ट फीस में कमी पाए जाने पर अपने...

जरूरी पक्षकारों को शामिल किए बिना और तथ्य छुपाकर लिया गया प्रोबेट रद्द होगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि यदि किसी वसीयत (Will) का प्रोबेट जरूरी पक्षकारों को शामिल किए बिना और महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाकर प्राप्त किया गया हो, तो उसे रद्द (revoked) किया जा सकता है।जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि जिस व्यक्ति का मृतक की संपत्ति में थोड़ा भी हित (interest) हो, उसे प्रोबेट कार्यवाही में सुना जाना जरूरी है।मामले का विवरणमामला कोयंबटूर की एक संपत्ति से जुड़ा है, जिसे एक व्यक्ति ने 1976 में अपनी बेटी...

यूपी ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम के तहत ज़मीन का वर्गीकरण बदलने का SDO के पास कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 के तहत एक उप-विभागीय अधिकारी (SDO) के पास सार्वजनिक उपयोग की ज़मीन के तौर पर दर्ज ज़मीन का वर्गीकरण बदलने का कोई अधिकार नहीं है, ताकि उस पर भूमिधरी अधिकार दिए जा सकें।कोर्ट ने टिप्पणी की,"वैसे भी, उन्मूलन अधिनियम उप-विभागीय अधिकारी को ज़मीन की श्रेणी बदलने का कोई अधिकार नहीं देता है ताकि उसे धारा 132 के निषेधात्मक दायरे से बाहर लाया जा सके। ज़मीन की श्रेणी में किसी भी बदलाव के लिए उन्मूलन अधिनियम में...

हाईकोर्ट सिर्फ़ देरी की वजह से वैधानिक अपीलीय प्राधिकरण के सामने लंबित अपील पर फ़ैसला नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फ़ैसला दिया कि हाईकोर्ट वैधानिक अपीलीय प्राधिकरणों की भूमिका नहीं निभा सकते, सिर्फ़ इसलिए कि कार्यवाही में देरी हो रही है। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द किया, जिनमें हाईकोर्ट ने वैधानिक अपील पर फ़ैसला होने देने के बजाय सीधे ही म्यूटेशन (नाम परिवर्तन) विवाद पर फ़ैसला दे दिया था।जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि जब आंध्र प्रदेश भूमि में अधिकार और पट्टादार पास बुक अधिनियम, 1971 के तहत वैधानिक अपील का विकल्प मौजूद था तो...

S. 100 CPC | तथ्यों पर आधारित निष्कर्ष, भले ही गलत हों, दूसरी अपील में बदले नहीं जा सकते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि दूसरी अपील की सुनवाई करते समय, हाई कोर्ट के लिए यह स्वीकार्य नहीं है कि वह सबूतों का फिर से मूल्यांकन करके निचली अदालत के तथ्यों पर आधारित निष्कर्षों को फिर से खोले या उनमें बदलाव करे।जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने प्रतिवादी द्वारा दायर अपील खारिज की। प्रतिवादी हाई कोर्ट द्वारा पहली अपीलीय अदालत के 'विशिष्ट पालन' (specific performance) के आदेश की पुष्टि किए जाने से असंतुष्ट था। अपीलकर्ता-प्रतिवादी ने आरोप लगाया कि पहली अपीलीय अदालत द्वारा...

POCSO Act | धारा 29 के तहत दोष की धारणा केवल पीड़ित बच्चे की गवाही के आधार पर नहीं बनती, अगर वह अविश्वसनीय हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 29 के तहत दोष की धारणा तभी बनेगी, जब अभियोजन पक्ष कथित यौन हमले के मूल तथ्यों को साबित कर दे। अगर पीड़ित बच्चे की गवाही ही पूरी तरह से विश्वसनीय और भरोसेमंद न हो, तो यह धारणा लागू नहीं की जा सकती।जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसने अपीलकर्ता की बरी होने की सज़ा पलट दी और उसे POCSO Act की धारा 8 के तहत दोषी ठहराया। कोर्ट ने...

सिर्फ़ ज़्यादा क्वालिफ़िकेशन होना, कम-से-कम अनुभव की शर्त की जगह नहीं ले सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी विज्ञापित पद के लिए ज़रूरी क्वालिफ़िकेशन से सिर्फ़ इसलिए समझौता नहीं किया जा सकता, क्योंकि उम्मीदवार के पास उससे ज़्यादा क्वालिफ़िकेशन है।जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने उम्मीदवार की अपील पर सुनवाई की। इस उम्मीदवार ने हिमाचल प्रदेश बोर्ड ऑफ़ स्कूल एजुकेशन के तहत कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियर के पद के लिए आवेदन किया था। हालाँकि उसने चयन प्रक्रिया में टॉप किया था और उसके पास M. Tech की डिग्री भी थी, लेकिन वह इस पद के लिए तय पाँच साल के काम...

वर्दी वाली सेवाओं में नियुक्तियों के लिए ज़्यादा सावधानी ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल रूप से अनफिट यूपी कांस्टेबल की बर्खास्तगी बहाल की

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (20 अप्रैल) को कहा कि कोई भी उम्मीदवार, जो पुलिस जैसी सार्वजनिक नौकरी के लिए मेडिकल रूप से अनफिट है, सिर्फ़ प्रशासनिक गलतियों या अपने जैसे दूसरे लोगों के साथ बराबरी के आधार पर अपनी नियुक्ति बरकरार नहीं रख सकता। कोर्ट ने दोहराया कि योग्यता के मापदंड ही सार्वजनिक रोज़गार की बुनियाद होते हैं।जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल की नियुक्ति को सही ठहराया गया, जबकि...

नगरपालिका प्रॉपर्टी रजिस्टर में सिर्फ़ एंट्री होना मालिकाना हक़ का सबूत नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने MCD का दावा खारिज किया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी नगरपालिका अथॉरिटी द्वारा रखे गए प्रॉपर्टी रिकॉर्ड में सिर्फ़ एंट्री होना अपने आप में ज़मीन पर मालिकाना हक़ साबित नहीं कर सकता। कोर्ट ने कानूनी तौर पर मान्य मालिकाना दस्तावेज़ों और न्यायिक फ़ैसलों की अहमियत को फिर से दोहराया।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,"MCD द्वारा रखी गई प्रॉपर्टी की लिस्ट में सिर्फ़ एक एंट्री होना अपने आप में विवादित ज़मीन पर मालिकाना हक़ का कोई मान्य सबूत नहीं हो सकता।" बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच का फ़ैसला...

एग्जीक्यूटिंग कोर्ट व्यावहारिक मुश्किलों के आधार पर समझौते वाली डिक्री की शर्तों में बदलाव नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट डिक्री के पीछे जाकर उसकी जांच नहीं कर सकता, बल्कि उसे डिक्री को वैसे का वैसा ही लागू करना होता है।कोर्ट ने कहा,"(एग्जीक्यूटिंग कोर्ट) को डिक्री को बिना किसी बदलाव के, वैसे का वैसा ही लागू करना होता है। कानून में यह बात तय है कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट का अधिकार क्षेत्र सिर्फ़ पारित की गई डिक्री को प्रभावी बनाने तक ही सीमित है। उसे ट्रायल कोर्ट की भूमिका नहीं निभानी चाहिए, ताकि वह डिक्री में व्यक्त किए गए विचारों की जगह अपने खुद के विचार थोप...

लगातार सेवा में छोटे-मोटे ब्रेक से एड-हॉक कर्मचारी रेगुलराइजेशन के लिए अयोग्य नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एड-हॉक सेवा में सिर्फ़ छोटे-मोटे ब्रेक से सेवा की निरंतरता पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जिससे कोई कर्मचारी सेवा के रेगुलराइजेशन के फ़ायदे के लिए अयोग्य हो जाए।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें अपील करने वालों को रेगुलराइजेशन देने से मना कर दिया गया था। इन लोगों को 1995-96 में पंजाब सरकार के वित्त विभाग में चपरासी और क्लर्क के तौर पर एड-हॉक आधार पर नियुक्त किया गया। उन्हें रेगुलराइजेशन से सिर्फ़ इस...

बिना भर्ती विज्ञापन या इंटरव्यू के नियुक्त एड-हॉक कर्मचारियों को पक्का नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला आंशिक रूप से रद्द किया। इस फैसले में हरियाणा सरकार की उन नीतियों के एक समूह को रद्द कर दिया गया था, जिनका मकसद कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले एड-हॉक और दिहाड़ी मज़दूरी वाले कर्मचारियों को पक्का करना था। कोर्ट ने 16 जून, 2014 और 18 जून, 2014 को जारी दो नोटिफिकेशन की वैधता को बरकरार रखा, लेकिन 7 जुलाई, 2014 को जारी दो नोटिफिकेशन रद्द किए।जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने पाया कि जुलाई 2014 के नोटिफिकेशन उन एड-हॉक...