हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
21 March 2026 9:30 PM IST

देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (16 मार्च, 2026 से 20 मार्च, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
मृत किरायेदार के गैर-आश्रित कानूनी वारिस एक साल बाद किराया अधिनियम का संरक्षण खो देते हैं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि मृत किरायेदार के ऐसे कानूनी वारिस जो किरायेदार पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं थे, किरायेदार की मृत्यु के एक साल से ज़्यादा समय तक दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत लगातार संरक्षण का दावा नहीं कर सकते।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने अधिनियम की धारा 2(L) के स्पष्टीकरण II का हवाला देते हुए कहा, “यह साफ़ है कि किसी ऐसे व्यक्ति का, जिसे उत्तराधिकार से किरायेदारी मिली हो और जो मृत व्यक्ति की मृत्यु के दिन उस पर आर्थिक रूप से निर्भर न हो, किरायेदारी खत्म होने के बाद भी कब्ज़े में बने रहने का अधिकार केवल एक साल की सीमित अवधि के लिए होगा। इस अवधि के खत्म होने पर या उसकी मृत्यु होने पर (जो भी पहले हो), किरायेदारी खत्म होने के बाद भी कब्ज़े में बने रहने का ऐसे उत्तराधिकारी का अधिकार समाप्त हो जाएगा।”
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पीड़ित की लापरवाही रेल दुर्घटना में मुआवज़ा देने से मना करने का आधार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह साफ़ कर दिया कि रेल दुर्घटनाओं के मामलों में पीड़ित की लापरवाही मुआवज़ा देने से मना करने का आधार नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा कि एक बार जब कोई "अप्रत्याशित घटना" (Untoward Incident) साबित हो जाती है तो रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत रेलवे की ज़िम्मेदारी सख़्त हो जाती है।
जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने यह टिप्पणी एक महिला की अपील मंज़ूरी देते हुए की। इस महिला के मुआवज़े के दावे को रेलवे दावा अधिकरण (Railway Claims Tribunal) ने खारिज कर दिया था।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
SC/ST Act के तहत आरोप तय करने वाले अंतरिम आदेश के खिलाफ अपील स्वीकार्य नहीं: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के तहत आरोप तय करने वाले आदेश के खिलाफ अपील स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यह आदेश एक अंतरिम आदेश है और पक्षों के अंतिम अधिकारों का निर्धारण नहीं करता।
जस्टिस जिया लाल भारद्वाज ने टिप्पणी की: "...आरोप तय करने का आदेश पूरी तरह से एक अंतरिम आदेश है, क्योंकि यह कार्यवाही को समाप्त नहीं करता, बल्कि मुकदमा तब तक चलता रहता है जब तक कि उसका परिणाम बरी होने या दोषी ठहराए जाने के रूप में सामने नहीं आ जाता।"
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
संपत्ति के मालिकाना हक/टाइटल विवादों को सुलझाने के लिए सीनियर सिटिज़न्स एक्ट का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फिर दोहराया कि 'माता-पिता और सीनियर सिटीजन का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' और उसके तहत बनाए गए नियमों का इस्तेमाल उन तीसरे पक्षों के बीच संपत्ति के टाइटल और मालिकाना हक के विवादों को सुलझाने के लिए नहीं किया जा सकता, जिनका सीनियर सिटीजन से कोई संबंध नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि यह एक्ट सीनियर सिटीजन के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए है, जिसे उनकी संपत्ति के वारिसों को पूरा करना होता है; यह संपत्ति के टाइटल और मालिकाना हक का फैसला करने के लिए नहीं है। संपत्ति के टाइटल और मालिकाना हक का फैसला केवल सिविल कार्यवाही में सबूतों की जांच के बाद ही किया जा सकता है।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पत्नी का कमाना ही पति से गुज़ारा भत्ता न देने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता: गुजरात हाईकोर्ट
गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि कोई महिला कमा रही है, यह उसके पति से गुज़ारा भत्ता मांगने का दावा खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता। जस्टिस हसमुख डी. सुथार ने अपने आदेश में कहा, "दोनों पक्षकारों के वकीलों की दलीलें सुनने और अर्ज़ी की बातों के साथ-साथ फ़ैमिली कोर्ट के निष्कर्षों पर विचार करने के बाद यह साफ़ है कि पत्नी अपना गुज़ारा करने में असमर्थ है और उसके पति ने उसे नज़रअंदाज़ किया। इसके अलावा, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि सिर्फ़ इसलिए कि पत्नी कमा रही है, यह उसके गुज़ारा भत्ते का दावा खारिज करने का कोई वैध आधार नहीं है। इस संबंध में यह कोर्ट माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनीता कछवाहा और अन्य बनाम अनिल कछवाहा मामले में दिए गए फ़ैसले का ज़िक्र करना उचित समझता है, जो (2014) 16 SCC 715 में दर्ज है।"
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पैसे लेकर नौकरी का भरोसा देना धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बुधवार (18 मार्च) को एक व्यक्ति के खिलाफ धोखाधड़ी (IPC की धारा 420) के आरोप में दी गई सज़ा बरकरार रखी। इस व्यक्ति ने नीमच के पूर्व कलेक्टर होने का ढोंग किया और नौकरी के इच्छुक लोगों को सरकारी नौकरी दिलाने का झूठा भरोसा देकर उनसे धोखे से 2 लाख रुपये प्रति व्यक्ति ऐंठ लिए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि उसका यह कृत्य धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है, न कि आपराधिक विश्वासघात की।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
उत्तम नगर होली झड़प: हाईकोर्ट ने सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए पुलिस को ईद के दौरान जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश दिया
दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार (19 मार्च) को दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वह सभी ज़रूरी कदम उठाए ताकि ईद के त्योहार के दौरान आम जनजीवन में कोई रुकावट न आए। यह निर्देश उत्तम नगर में हुई एक घटना के संदर्भ में दिया गया, जहां होली के दौरान हुई एक झड़प में 26 साल के एक युवक की हत्या कर दी गई थी।
कोर्ट ने पुलिस को आगे यह भी निर्देश दिया कि वे ऐसी व्यवस्था करें जिससे "सभी लोगों में सुरक्षा और बचाव का एहसास पैदा हो" और अधिकारियों को यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि समाज के किसी भी तबके के "किसी भी व्यक्ति" को ऐसी "शरारत करने की इजाज़त न दी जाए जिससे कोई अप्रिय स्थिति पैदा होने की आशंका हो"।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
धारा 151 CPC के तहत निष्फल मुकदमों को समाप्त कर सकती है सिविल कोर्ट: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी मुकदमे का मूल कारण (cause of action) बाद की घटनाओं के चलते समाप्त हो जाता है, तो सिविल कोर्ट अपनी निहित शक्तियों (Section 151 CPC) का प्रयोग करते हुए ऐसे मुकदमे को निष्फल (infructuous) घोषित कर खारिज कर सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मुकदमों को केवल अंतरिम आदेश बनाए रखने या भविष्य की संभावनाओं के आधार पर लंबित नहीं रखा जा सकता।
यह टिप्पणी जस्टिस संदीप वी. मार्ने ने भारत संघ द्वारा दायर सिविल रिवीजन आवेदन पर सुनवाई करते हुए की। याचिका सिटी सिविल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देती थी, जिसमें मुकदमे को निष्फल घोषित करने की मांग खारिज कर दी गई थी।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
अनुच्छेद 25 पूजा के लिए इकट्ठा होने के अधिकार की रक्षा करता है, निजी जगहों पर प्रार्थनाओं पर कोई रोक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 देश में हर धार्मिक संप्रदाय को पूजा के लिए इकट्ठा होने के अधिकार की रक्षा करता है, लेकिन यह प्रार्थना की आड़ में एक धर्म द्वारा दूसरे धर्म को उकसाने को कोई सुरक्षा नहीं देता।
साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि किसी व्यक्ति की निजी जगह पर की जाने वाली प्रार्थनाओं या धार्मिक कार्यक्रमों को लेकर कोई रुकावट या रोक नहीं हो सकती, चाहे वह किसी भी धर्म या संप्रदाय का हो।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
फैमिली कोर्ट 'मुबारत' के ज़रिए आपसी तलाक़ की घोषणा के लिए मुस्लिम जोड़े की अर्ज़ी पर विचार करने के लिए अधिकृत: गुजरात हाईकोर्ट ने फिर की पुष्टि
गुजरात हाईकोर्ट ने दोहराया कि फैमिली कोर्ट आपसी सहमति से तलाक़ के आधार पर शादी को खत्म करने की अर्ज़ी पर विचार करने के लिए सक्षम और अधिकृत है। इस आपसी सहमति को मुस्लिम जोड़ों के बीच हुए 'मुबारत' समझौते के रूप में भी जाना जाता है।
जस्टिस ए.वाई. कोगजे और जस्टिस निशा एम. ठाकोर की खंडपीठ ने 'आसिफ़ दाऊदभाई करवा और अन्य बनाम कोई नहीं (2025)' मामले में हाईकोर्ट के फ़ैसले का हवाला दिया और कहा कि कोर्ट ने समझौते के ज़रिए मुस्लिम शादी को खत्म करने के मामले पर विस्तार से विचार किया था।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
स्काउट्स और गाइड्स कोटा का लाभ 'हिंदुस्तान स्काउट्स' को भी दिया जाए: दिल्ली हाईकोर्ट ने रेलवे को निर्देश दिया
दिल्ली हाईकोर्ट ने रेल मंत्रालय को निर्देश दिया कि स्काउट्स और गाइड्स कोटा के तहत भर्ती का लाभ 'हिंदुस्तान स्काउट्स एंड गाइड्स एसोसिएशन' को भी दिया जाए। कोर्ट ने माना कि इस तरह के लाभ से इनकार करना मनमाना था और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन था।
जस्टिस मिनी पुष्करणा ने फैसला सुनाया कि याचिकाकर्ता एसोसिएशन, जिसे युवा मामले और खेल मंत्रालय (MOYA) से मान्यता प्राप्त है, उसे इस कोटे से बाहर नहीं रखा जा सकता, जबकि इसी तरह की स्थिति वाले दूसरे संगठन, 'भारत स्काउट्स एंड गाइड्स' को यह लाभ दिया जा रहा है।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
सरकारी स्कूल टीचर की नियुक्ति से पहले की दूसरी शादी दुराचार नहीं, बल्कि योग्यता की जड़ पर ही वार है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि कोई महिला, जिसने सरकारी स्कूल टीचर के तौर पर नियुक्त होने से पहले दूसरी शादी (Bigamous Marriage) की थी, उसे इस आधार पर यूपी सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली और यूपी सरकारी कर्मचारी (अनुशासन और अपील) नियमावली के तहत दुराचार के लिए दंडित नहीं किया जा सकता।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि वह उम्मीदवार, जिसने 2009 में ऐसे व्यक्ति से शादी की, जिसकी पहली शादी अभी भी कायम थी, वह 'उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा शिक्षक सेवा नियमावली, 1981' के नियम 12 के तहत टीचर के तौर पर नियुक्ति के लिए अयोग्य मानी जाएगी, क्योंकि यह कमी नियुक्ति की जड़ पर ही वार करती है, जिससे नियुक्ति शुरू से ही (Ab Initio) अमान्य हो जाती है।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
ससुराल के साथ रहने या परिवार की मदद करने को कहना क्रूरता नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट
दिल्ली हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पत्नी से ससुराल वालों के साथ रहने या परिवार के सदस्यों की देखभाल में मदद करने को कहना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (CrPC) की धारा 498ए के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने यह टिप्पणी करते हुए पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज FIR (धारा 498ए/406/34) और घरेलू हिंसा कानून के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
मजिस्ट्रेट खुद करेंगे प्रारंभिक जांच, पुलिस को नहीं सौंप सकते जिम्मेदारी: कलकत्ता हाइकोर्ट
कलकत्ता हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट पुलिस को “जांच” (इन्क्वायरी) करने का निर्देश नहीं दे सकते। यह जिम्मेदारी स्वयं मजिस्ट्रेट को निभानी होगी, और उसके बाद ही वे जांच के आदेश दे सकते हैं।
जस्टिस अजय कुमार मुखर्जी ने कहा कि कानून के तहत जांच का अर्थ न्यायिक प्रक्रिया से है, जिसे केवल मजिस्ट्रेट या अदालत ही कर सकती है। यदि इस कार्य को पुलिस को सौंप दिया जाए खासकर तब जब पुलिस पहले ही FIR दर्ज करने से इनकार कर चुकी हो तो यह कानून की मंशा के खिलाफ होगा।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पत्नी भरण-पोषण की कार्यवाही के लिए RTI Act के तहत पति का IT रिटर्न नहीं मांग सकती, यह 'निजी जानकारी' के तहत छूट प्राप्त है: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि कोई भी जीवनसाथी, दूसरे जीवनसाथी का इनकम टैक्स रिटर्न और वित्तीय रिकॉर्ड, सूचना का अधिकार (RTI) एक्ट, 2005 के तहत आवेदन करके प्राप्त नहीं कर सकता; क्योंकि ऐसी जानकारी RTI Act की धारा 8(1)(j) के तहत 'निजी जानकारी' मानी जाती है, जिसे सार्वजनिक करने से छूट प्राप्त है।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
अगर अपॉइंटमेंट गैर-कानूनी नहीं है तो प्रमोशन के लिए एड-हॉक सर्विस को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर अपॉइंटमेंट गैर-कानूनी नहीं है तो सरकार किसी कर्मचारी की एड-हॉक सर्विस को प्रमोशन के लिए नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस कर्मचारी के दावे को गैर-कानूनी तरीके से नज़रअंदाज़ किया गया, उसे प्रमोशन उसी तारीख से दिया जाना चाहिए, जिस तारीख को उसके जूनियर को प्रमोशन दिया गया।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
RTE Act के तहत 25% सीटें आरक्षित करने की योजना का इस्तेमाल एक ही बच्चे के एडमिशन के लिए बार-बार नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) के तहत वंचितों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की योजना इसलिए बनाई गई ताकि ज़्यादा से ज़्यादा योग्य बच्चों को शिक्षा के अवसर मिल सकें, लेकिन यह योजना किसी माता-पिता को यह अधिकार नहीं देती कि वे एक ही बच्चे के लिए बार-बार सीट की मांग करें। बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में यह फैसला सुनाया।
जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस हितेन वेनेगांवकर की डिवीज़न बेंच ने पिता की याचिका खारिज की। पिता ने अपने घर के पास के एक स्कूल में अपने बच्चे के लिए सीट देने की 'ज़िद' की थी, जबकि वह पहले ही इस योजना का लाभ उठा चुका था और अपने बच्चे का एडमिशन एक दूसरे स्कूल में करवा चुका था, जो उसके घर से थोड़ी दूरी पर था।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
SSC Recruitment | उम्मीदवार द्वारा स्वतंत्र रूप से प्राप्त मेडिकल राय, नए मेडिकल टेस्ट का आधार नहीं बन सकती: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) का आदेश रद्द किया, जिसमें स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (SSC) द्वारा आयोजित कांस्टेबल (एग्जीक्यूटिव) पद की भर्ती प्रक्रिया के दौरान मेडिकल रूप से अनफिट घोषित किए गए एक उम्मीदवार का फिर से मेडिकल टेस्ट कराने का निर्देश दिया गया।
जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीज़न बेंच ने फैसला सुनाया कि भर्ती नियमों के तहत गठित विशेषज्ञ बोर्डों की मेडिकल राय में दखल देते समय अदालतों को संयम बरतना चाहिए, और वे केवल स्वतंत्र रूप से प्राप्त मेडिकल सर्टिफिकेट के आधार पर बार-बार मेडिकल टेस्ट कराने का निर्देश नहीं दे सकतीं।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पूर्व सैनिक कोटा: आवेदन की अंतिम तिथि नहीं, रिजल्ट की तारीख से गिना जाएगा एक साल- दिल्ली हाइकोर्ट
दिल्ली हाइकोर्ट ने पूर्व सैनिक (ESM) कोटे से जुड़ी भर्ती में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि एक वर्ष की सेवा समाप्ति अवधि की गणना आवेदन की अंतिम तिथि से नहीं बल्कि परीक्षा परिणाम घोषित होने की तारीख से की जाएगी। जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब पात्रता नियम अस्पष्ट हों तो उनकी व्याख्या उम्मीदवार के पक्ष में की जानी चाहिए।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
सिर्फ रिश्तेदारी के आधार पर संपत्ति जब्त नहीं: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने दिया बड़ा फैसला
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति की संपत्ति केवल इस आधार पर जब्त नहीं की जा सकती कि वह किसी गैंगस्टर का रिश्तेदार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति जब्ती के लिए अपराध और संपत्ति के बीच सीधा संबंध (नेक्सस) साबित होना जरूरी है। जस्टिस राज बीर सिंह की पीठ ने मंसूर अंसारी की अपील स्वीकार करते हुए उनकी संपत्ति जब्त करने का आदेश रद्द कर दिया। मंसूर अंसारी, कुख्यात गैंगस्टर मुख्तार अंसारी के चचेरे भाई हैं।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
PMLA से पहले 'अपराध से मिली रकम' से खरीदी गई प्रॉपर्टी को ED बाद में भी ज़ब्त कर सकती है: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि अगर आरोपी, प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 (PMLA) के लागू होने के बाद भी प्रॉपर्टी पर कब्ज़ा बनाए रखता है तो PMLA लागू होने से पहले, अपराध से मिली रकम से खरीदी गई प्रॉपर्टी को इस एक्ट के तहत अभी भी ज़ब्त किया जा सकता है।
जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की डिवीज़न बेंच ने यह टिप्पणी की: “अगर कोई व्यक्ति अपराध से मिली रकम पर कब्ज़ा बनाए रखता है, या उसका इस्तेमाल करता रहता है—जिसमें अपराध से मिली रकम से सीधे या परोक्ष रूप से हासिल की गई प्रॉपर्टी भी शामिल है—तो PMLA लागू होते ही वह निश्चित रूप से मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध का दोषी माना जाएगा। यह PMLA के मकसद और उद्देश्य के अनुरूप है; यह एक ऐसा कानून है, जिसका मकसद उन गंभीर आर्थिक अपराधों पर रोक लगाना है, जो देश की आर्थिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाते हैं।”
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
आंगनवाड़ी सहायिका को कार्यकर्ता पद पर पदोन्नति में प्राथमिक अधिकार, ट्रांसफर से नहीं छीना जा सकता: हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि किसी आंगनवाड़ी केंद्र में कार्यकर्ता का पद खाली होने पर वहां कार्यरत आंगनवाड़ी सहायिका को पदोन्नति के लिए प्राथमिक अधिकार होता है। विवाह के आधार पर किए गए स्थानांतरण से इस अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।
चीफ जस्टिस जी.एस. संधावालिया और जस्टिस बिपिन सी. नेगी की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि विवाह के आधार पर स्थानांतरण का प्रावधान केवल अनुशंसात्मक है अनिवार्य नहीं। इसलिए इससे सहायिका के पदोन्नति के अधिकार को प्रभावित नहीं किया जा सकता।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
फीस बकाया होने के आधार पर छात्रों के मूल प्रमाणपत्र रोकना अवैध: तेलंगाना हाईकोर्ट
तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा है कि शैक्षणिक संस्थान केवल फीस बकाया होने के आधार पर छात्रों के मूल शैक्षणिक प्रमाणपत्र रोक नहीं सकते, क्योंकि ये प्रमाणपत्र छात्र की संपत्ति होते हैं और उन्हें बकाया वसूली के लिए दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
जस्टिस सुरेपल्ली नंदा की एकल पीठ ने कहा कि विश्वविद्यालय किसी भी बहाने से छात्र के मूल शैक्षणिक प्रमाणपत्र (मार्कशीट और डिग्री प्रमाणपत्र सहित) अपने पास नहीं रख सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि फीस बकाया है तो संस्थान को उसकी वसूली के लिए संबंधित सक्षम अदालत में उचित कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए, न कि छात्रों के प्रमाणपत्र रोककर दबाव बनाना चाहिए।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
NI Act में 90 दिन से अधिक देरी से दायर अपील स्वीकार नहीं: हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी कानून 2008 के तहत 90 दिन की अधिकतम समयसीमा के बाद दायर की गई आपराधिक अपील सुनवाई योग्य नहीं होती। अदालत ने स्पष्ट किया कि विशेष कानून में तय अधिकतम समयसीमा के बाद देरी माफ नहीं की जा सकती। इसके लिए लिमिटेशन कानून, 1963 का सहारा भी नहीं लिया जा सकता।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
रिश्तेदार की वैवाहिक घर में महज़ मौजूदगी या निष्क्रिय पारिवारिक जुड़ाव IPC की धारा 498A के तहत कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
एक शादीशुदा व्यक्ति के परिवार के कुछ सदस्यों के खिलाफ IPC की धारा 498-A के तहत जारी समन रद्द करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि किसी रिश्तेदार की वैवाहिक घर में महज़ मौजूदगी के आधार पर आपराधिक दायित्व नहीं ठहराया जा सकता, खासकर तब जब क्रूरता के आरोपों में उन परिवार के सदस्यों की भूमिका को लेकर कोई स्पष्ट आरोप न हो।
जस्टिस फरजंद अली की बेंच ने राय दी कि अपराध का संबंध जानबूझकर किए गए आचरण से होता है, न कि निष्क्रिय पारिवारिक जुड़ाव से। IPC की धारा 498-A के तहत आने वाले अपराधों में पति के हर रिश्तेदार पर बिना किसी स्वतंत्र आचरण का ज़िक्र किए लगाए गए सामान्य आरोप, आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए ज़रूरी न्यूनतम शर्तों को पूरा नहीं करते।

