आंगनवाड़ी सहायिका को कार्यकर्ता पद पर पदोन्नति में प्राथमिक अधिकार, ट्रांसफर से नहीं छीना जा सकता: हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट
Amir Ahmad
16 March 2026 1:52 PM IST

हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि किसी आंगनवाड़ी केंद्र में कार्यकर्ता का पद खाली होने पर वहां कार्यरत आंगनवाड़ी सहायिका को पदोन्नति के लिए प्राथमिक अधिकार होता है। विवाह के आधार पर किए गए स्थानांतरण से इस अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।
चीफ जस्टिस जी.एस. संधावालिया और जस्टिस बिपिन सी. नेगी की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि विवाह के आधार पर स्थानांतरण का प्रावधान केवल अनुशंसात्मक है अनिवार्य नहीं। इसलिए इससे सहायिका के पदोन्नति के अधिकार को प्रभावित नहीं किया जा सकता।
मामले में याचिकाकर्ता सहायिका पिछले लगभग 24 वर्षों से गांव काशपो स्थित आंगनवाड़ी केंद्र में लगातार कार्यरत थी। जब उसी केंद्र में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का पद खाली हुआ तो उसे उम्मीद थी कि 19 जून, 2010 की अधिसूचना के अनुसार उसे पदोन्नति का अवसर दिया जाएगा।
इस अधिसूचना के नियम 5 के अनुसार जिस केंद्र में सहायिका कार्यरत है, वहां कार्यकर्ता का पद खाली होने पर सबसे पहले उसी सहायिका को नियुक्ति का अवसर दिया जाना चाहिए और इसके लिए अलग से विज्ञापन जारी करने की आवश्यकता नहीं होती।
हालांकि उसके दावे पर विचार होने से पहले ही एक अन्य महिला, जो किसी दूसरे केंद्र में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में कार्यरत थी, का स्थानांतरण काशपो केंद्र में कर दिया गया। यह स्थानांतरण विवाह के आधार पर किया गया, क्योंकि उस महिला की शादी काशपो गांव में हुई।
इससे आहत होकर सहायिका ने हाइकोर्ट में याचिका दायर की। एकल पीठ ने उसके पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि वह 24 वर्षों से उस केंद्र में सेवा दे रही है और पद खाली होने पर उसे पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार है।
इस निर्णय के खिलाफ स्थानांतरित की गई महिला ने खंडपीठ में अपील दायर की। उसने तर्क दिया कि अधिसूचना के नियम 4 के अनुसार यदि किसी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का विवाह किसी अन्य स्थान पर होता है और वहां पद खाली है, तो वह अपने पति के निवास स्थान के आधार पर स्थानांतरण का अनुरोध कर सकती है।
खंडपीठ ने कहा कि नियम 5 के तहत उस केंद्र में कार्यरत सहायिका को पदोन्नति के लिए प्राथमिक अधिकार मिलता है। वहीं विवाह के आधार पर स्थानांतरण का प्रावधान अनिवार्य नहीं बल्कि केवल अनुशंसात्मक है।
अदालत ने कहा कि पद खाली होने के साथ ही सहायिका को पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार मिल गया था और स्थानांतरण आदेश के जरिए उस अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।
हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि 24 वर्षों की सेवा के बाद सहायिका को यह वैध अपेक्षा थी कि उसी केंद्र में कार्यकर्ता का पद खाली होने पर उसे पदोन्नति के लिए प्राथमिकता दी जाएगी।
इन टिप्पणियों के साथ खंडपीठ ने एकल पीठ का फैसला बरकरार रखते हुए अपील खारिज की।

