पत्नी का कमाना ही पति से गुज़ारा भत्ता न देने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता: गुजरात हाईकोर्ट

Shahadat

20 March 2026 2:28 PM IST

  • पत्नी का कमाना ही पति से गुज़ारा भत्ता न देने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता: गुजरात हाईकोर्ट

    गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि कोई महिला कमा रही है, यह उसके पति से गुज़ारा भत्ता मांगने का दावा खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता।

    जस्टिस हसमुख डी. सुथार ने अपने आदेश में कहा,

    "दोनों पक्षकारों के वकीलों की दलीलें सुनने और अर्ज़ी की बातों के साथ-साथ फ़ैमिली कोर्ट के निष्कर्षों पर विचार करने के बाद यह साफ़ है कि पत्नी अपना गुज़ारा करने में असमर्थ है और उसके पति ने उसे नज़रअंदाज़ किया। इसके अलावा, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि सिर्फ़ इसलिए कि पत्नी कमा रही है, यह उसके गुज़ारा भत्ते का दावा खारिज करने का कोई वैध आधार नहीं है। इस संबंध में यह कोर्ट माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनीता कछवाहा और अन्य बनाम अनिल कछवाहा मामले में दिए गए फ़ैसले का ज़िक्र करना उचित समझता है, जो (2014) 16 SCC 715 में दर्ज है। उस मामले में अलग रह रही पत्नी ने अपने पति से गुज़ारा भत्ता मांगा था। पति ने इस आधार पर आपत्ति जताई थी कि पत्नी के पास अपना गुज़ारा करने के लिए पर्याप्त साधन हैं, लेकिन माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया था। यह माना गया था कि सिर्फ़ इसलिए कि पत्नी कमा रही है और हो सकता है कि वह बहुत ज़्यादा पढ़ी-लिखी हो, यह उसके गुज़ारा भत्ते के दावे को खारिज करने का कोई कारण नहीं हो सकता... उपरोक्त बातों को देखते हुए, कोर्ट की यह सुविचारित राय है कि पत्नी की कमाई उसके गुज़ारा भत्ते को खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती। पत्नी के गुज़ारा भत्ते के दावे पर पति की आपत्ति टिकने लायक नहीं है।"

    कोर्ट एक ऐसे व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसने फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें याचिकाकर्ता को अपनी पत्नी को हर महीने 15,000 रुपये गुज़ारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया।

    पत्नी ने फ़ैमिली कोर्ट में आपराधिक मामला दायर कर गुज़ारा भत्ते की राशि बढ़ाकर 30,000 रुपये प्रति माह करने की मांग की थी। उसने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता हर महीने लगभग 70,000 से 75,000 रुपये कमाता है और उसने 06.04.2018 को उसे वैवाहिक घर से बाहर निकालने से पहले उसके साथ मानसिक और शारीरिक क्रूरता की थी।

    याचिकाकर्ता ने अपना जवाब दायर करते हुए कहा कि उसकी कुल सैलरी... 69,354/- रुपये थी और हाथ में आने वाली (नेट) सैलरी 54,499/- रुपये थी, जिसमें से उसे अपने माता-पिता के भरण-पोषण, किराया और लोन की किस्तों जैसी वित्तीय जिम्मेदारियां निभानी हैं। फैमिली कोर्ट ने पत्नी की अर्जी को आंशिक रूप से स्वीकार किया और अर्जी दाखिल करने की तारीख से उसे हर महीने 15,000/- रुपये भरण-पोषण के तौर पर देने का आदेश दिया।

    पत्नी ने 2018 में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भी एक अर्जी दाखिल की, जिस पर 20.09.2019 को फैसला आया। उस फैसले में उसे अर्जी दाखिल करने की तारीख से हर महीने 5,000/- रुपये भरण-पोषण के तौर पर देने का आदेश दिया गया।

    हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यदि कोई अंतिम आदेश पारित किया जाता है तो ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया जाता है कि वह भरण-पोषण की राशि को उचित रूप से समायोजित करे और इस मामले पर हाई कोर्ट के आदेश से प्रभावित हुए बिना शीघ्रता और स्वतंत्र रूप से फैसला करे।

    कोर्ट ने कहा कि जून, 2019 में पति की सैलरी 54,385/- रुपये थी। उसके बाद उसकी सैलरी में काफी बढ़ोतरी हुई और अब यह लगभग 70,000/- से 75,000/- रुपये हो गई। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी पाया कि पति पर कोई अन्य बड़ी वित्तीय जिम्मेदारी नहीं है, क्योंकि उसकी माँ एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगी हैं, उसके पिता अपना खर्च खुद उठाते हैं और उसकी बहन भी नौकरी करती है।

    कोर्ट ने कहा,

    "अतः, उसकी मुख्य जिम्मेदारी अर्जी देने वाली (पत्नी) का भरण-पोषण करना है। उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए माननीय फैमिली जज ने अपने अधिकार क्षेत्र का सही इस्तेमाल किया और भरण-पोषण के पिछले आदेश में संशोधन करते हुए एक ऐसी पर्याप्त राशि तय की, जो प्रतिवादी (पति) की हैसियत और आय के अनुरूप हो। तदनुसार, भरण-पोषण की राशि को 5,000/- रुपये से बढ़ाकर 15,000/- रुपये कर दिया गया, यानी इसमें 10,000/- रुपये की बढ़ोतरी की गई।"

    कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता किसी भी स्पष्ट त्रुटि को इंगित करने में असफल रहा और फैमिली कोर्ट ने अपने निष्कर्षों के लिए उचित कारण बताए।

    इसके साथ ही याचिका खारिज कर दी गई।

    Case title: LALITKUMAR JIVRAJBHAI VAGHELA v/s STATE OF GUJARAT & ANR.

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