मृत किरायेदार के गैर-आश्रित कानूनी वारिस एक साल बाद किराया अधिनियम का संरक्षण खो देते हैं: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
21 March 2026 8:22 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि मृत किरायेदार के ऐसे कानूनी वारिस जो किरायेदार पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं थे, किरायेदार की मृत्यु के एक साल से ज़्यादा समय तक दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत लगातार संरक्षण का दावा नहीं कर सकते।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने अधिनियम की धारा 2(L) के स्पष्टीकरण II का हवाला देते हुए कहा,
“यह साफ़ है कि किसी ऐसे व्यक्ति का, जिसे उत्तराधिकार से किरायेदारी मिली हो और जो मृत व्यक्ति की मृत्यु के दिन उस पर आर्थिक रूप से निर्भर न हो, किरायेदारी खत्म होने के बाद भी कब्ज़े में बने रहने का अधिकार केवल एक साल की सीमित अवधि के लिए होगा। इस अवधि के खत्म होने पर या उसकी मृत्यु होने पर (जो भी पहले हो), किरायेदारी खत्म होने के बाद भी कब्ज़े में बने रहने का ऐसे उत्तराधिकारी का अधिकार समाप्त हो जाएगा।”
इस तरह बेंच ने किरायेदार के बेटे द्वारा दायर अपील खारिज की, जिसमें मकान मालिक के पक्ष में दिए गए कब्ज़े के आदेश को चुनौती दी गई; बेंच ने माना कि अपीलकर्ता ने कानूनी संरक्षण खो दिया था और वह परिसर पर अनाधिकृत कब्ज़ा किए हुए था।
मूल किरायेदार की मृत्यु जनवरी, 2013 में हुई थी। कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता-बेटा उस पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं था; कोर्ट ने उन दस्तावेज़ों पर भरोसा किया, जिनमें एक पार्टनरशिप डीड भी शामिल थी, जिससे पता चलता था कि उसकी आय का एक स्वतंत्र स्रोत था। नतीजतन, किराया अधिनियम के तहत उपलब्ध कोई भी संरक्षण एक साल बाद समाप्त हो गया।
अपीलकर्ता के इस तर्क को खारिज करते हुए कि वह अभी भी किरायेदारी के अधिकारों का लाभ उठा रहा है, कोर्ट ने फैसला दिया कि कानूनी अवधि समाप्त होने के बाद वह अनाधिकृत कब्ज़ा करने वाला बन गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके बाद किराया देना या लेना, मकान मालिक के खिलाफ कोई रोक (Estoppel) नहीं बनाता और न ही किरायेदारी के अधिकारों को फिर से जीवित करता है।
कोर्ट ने आगे कहा कि एक बार जब किराया अधिनियम के तहत संरक्षण समाप्त हो जाता है तो पक्षकारों के बीच का संबंध 'संपत्ति अंतरण अधिनियम' (Transfer of Property Act) द्वारा नियंत्रित होता है और मकान मालिक कब्ज़े की मांग करने का हकदार होता है।
इस प्रकार, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए कब्ज़े का आदेश बरकरार रखा और अपील खारिज की।
Case title: Pawan Kumar Goel v. Jyoti Sikka

