धारा 151 CPC के तहत निष्फल मुकदमों को समाप्त कर सकती है सिविल कोर्ट: बॉम्बे हाईकोर्ट

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    बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी मुकदमे का मूल कारण (cause of action) बाद की घटनाओं के चलते समाप्त हो जाता है, तो सिविल कोर्ट अपनी निहित शक्तियों (Section 151 CPC) का प्रयोग करते हुए ऐसे मुकदमे को निष्फल (infructuous) घोषित कर खारिज कर सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मुकदमों को केवल अंतरिम आदेश बनाए रखने या भविष्य की संभावनाओं के आधार पर लंबित नहीं रखा जा सकता।

    यह टिप्पणी जस्टिस संदीप वी. मार्ने ने भारत संघ द्वारा दायर सिविल रिवीजन आवेदन पर सुनवाई करते हुए की। याचिका सिटी सिविल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देती थी, जिसमें मुकदमे को निष्फल घोषित करने की मांग खारिज कर दी गई थी।

    मामला वर्ष 2004 के उन आदेशों से जुड़ा था, जिनके जरिए लीज पर दी गई नमक भूमि से संबंधित अधिकार समाप्त किए गए थे। वादी ने इन आदेशों को चुनौती देते हुए सिविल सूट दायर किया था। हालांकि, मुकदमे के लंबित रहने के दौरान ही संबंधित लीज की अवधि 14 अक्टूबर 2016 को समाप्त हो गई। इसके बाद प्रतिवादियों ने अदालत में आवेदन देकर कहा कि अब मुकदमे का आधार ही समाप्त हो चुका है और इसे निष्फल घोषित किया जाना चाहिए।

    हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता के Order VII Rule 11 का प्रयोग केवल उन मामलों में किया जा सकता है, जहां मुकदमा दायर करते समय ही कारण का अभाव हो। लेकिन यदि बाद की परिस्थितियों में कारण समाप्त हो जाए, तो ऐसे मामलों में अदालत को अपनी धारा 151 CPC के तहत निहित शक्तियों का सहारा लेना होगा।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मुकदमे को केवल इसलिए जारी नहीं रखा जा सकता कि उसके खारिज होने से अंतरिम आदेश समाप्त हो जाएगा। इसी प्रकार, भविष्य में संभावित दावों या संशोधन की संभावना के आधार पर भी किसी मुकदमे को जीवित नहीं रखा जा सकता।

    कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने इन सिद्धांतों की अनदेखी करते हुए मुकदमे को निष्फल घोषित करने से इनकार कर दिया, जो कि एक अधिकार क्षेत्र संबंधी त्रुटि (jurisdictional error) है।

    इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने सिटी सिविल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और संबंधित मुकदमे को निष्फल घोषित करते हुए खारिज कर दिया।

    इस फैसले में हाईकोर्ट ने दोहराया कि न्यायालयों का कर्तव्य है कि वे ऐसे मुकदमों को समाप्त करें, जिनका मूल आधार समाप्त हो चुका हो, ताकि न्यायिक संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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