संपत्ति के मालिकाना हक/टाइटल विवादों को सुलझाने के लिए सीनियर सिटिज़न्स एक्ट का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
21 March 2026 7:39 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फिर दोहराया कि 'माता-पिता और सीनियर सिटीजन का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' और उसके तहत बनाए गए नियमों का इस्तेमाल उन तीसरे पक्षों के बीच संपत्ति के टाइटल और मालिकाना हक के विवादों को सुलझाने के लिए नहीं किया जा सकता, जिनका सीनियर सिटीजन से कोई संबंध नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि यह एक्ट सीनियर सिटीजन के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए है, जिसे उनकी संपत्ति के वारिसों को पूरा करना होता है; यह संपत्ति के टाइटल और मालिकाना हक का फैसला करने के लिए नहीं है। संपत्ति के टाइटल और मालिकाना हक का फैसला केवल सिविल कार्यवाही में सबूतों की जांच के बाद ही किया जा सकता है।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने कहा,
“सीनियर सिटीजन की संपत्ति की सुरक्षा का दायरा अचल संपत्ति के टाइटल से जुड़े विरोधी दावों का फैसला करने तक नहीं फैलता है। यह काम केवल एक सक्षम सिविल/राजस्व कोर्ट ही एक नियमित मुकदमे के ज़रिए कर सकता है, जहां पक्षकारों को अपने-अपने दावों के समर्थन में सबूत पेश करने का मौका दिया जाता है। भरण-पोषण एक्ट के तहत काम करने वाले अधिकारियों के सामने यह मौका उपलब्ध नहीं होता है।”
याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी ने एक विवादित ज़मीन, सीताराम और राजाराम नाम के दो व्यक्तियों से 'सेल डीड' (बिक्रीनामा) के ज़रिए खरीदी थी। याचिकाकर्ता के हिस्से सहित पूरी ज़मीन का रिकॉर्ड राधे श्याम, राजाराम, सीताराम आदि के नाम पर दर्ज था। हालांकि, सीताराम और राजाराम के अलावा, किसी अन्य सह-मालिक ने याचिकाकर्ता के पक्ष में कोई सेल डीड निष्पादित नहीं की थी।
प्रतिवादी नंबर 6 ने ज़मीन के उस बड़े टुकड़े में से कुछ हिस्सा खरीदा था। यह दावा करते हुए कि प्रतिवादी अवैध रूप से याचिकाकर्ता की संपत्ति पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहा है, याचिकाकर्ता ने उक्त विपक्षी पक्ष के खिलाफ कार्रवाई के लिए उप-विभागीय अधिकारी (SDO), बीकापुर, अयोध्या से संपर्क किया।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने 'सीनियर सिटिज़न एक्ट' के तहत सुरक्षा की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
'सीनियर सिटिज़न एक्ट' के उद्देश्यों के विवरण (Statement of Objects) की पड़ताल करने के बाद कोर्ट ने पाया कि यह एक्ट सीनियर सिटीजन के वारिसों पर उनके भरण-पोषण और सुरक्षा की ज़िम्मेदारी डालने के उद्देश्य से बनाया गया। कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता और विपक्षी पक्ष के बीच किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं था।
आगे कहा गया,
“अचल संपत्तियों के मालिकाना हक और कब्ज़े को लेकर किए गए आपसी दावों का फ़ैसला जल्दबाज़ी में नहीं किया जा सकता। इनका फ़ैसला केवल इस तरह से किया जा सकता है: दलीलें पेश करना, मुद्दे तय करना, सबूत पेश करना, गवाहों से क्रॉस-एग्जामिनेशन करना और उसके बाद दोनों पक्षों की बातें सुनकर एक विस्तृत फ़ैसला देना, जिसमें दोनों पक्षों के बीच के सभी मुद्दों का हल बताया गया हो। इसलिए भरण-पोषण अधिनियम (Maintenance Act) के तहत आने वाले अधिकारियों का काम अचल संपत्तियों के मालिकाना हक और कब्ज़े से जुड़े आपसी दावों का फ़ैसला करना नहीं है।”
अदालत ने आगे यह भी कहा कि अधिनियम की धारा 22, जो राज्य सरकार को सीनियर सिटीजन के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए अधिकारी नियुक्त करने और नियम बनाने का अधिकार देती है, वह भी इन अधिकारियों को दोनों पक्षों के बीच संपत्ति के मालिकाना हक से जुड़े विवादों का फ़ैसला करने का अधिकार नहीं देती है।
हालांकि धारा 27, सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत आने वाले मामलों से जुड़े किसी भी मुक़दमे पर रोक लगाती है। हालांकि, अदालत ने यह साफ़ किया कि यह रोक उन मामलों पर लागू नहीं होगी, जहां संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर विवाद ऐसे पक्षकारों के बीच हो, जिनका आपस में कोई संबंध न हो। अदालत ने कहा कि ऐसे मुद्दों पर सुनवाई करने और फ़ैसला देने का अधिकार केवल सक्षम सिविल कोर्ट या रेवेन्यू कोर्ट को ही है।
तदनुसार, रिट याचिका ख़ारिज की।
Case Title: Magghu Ram v. State Of U.P. Thru. Prin. Secy. (Revenue Deptt. ) Lko. And 5 Others

