RTE Act के तहत 25% सीटें आरक्षित करने की योजना का इस्तेमाल एक ही बच्चे के एडमिशन के लिए बार-बार नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट
Shahadat
17 March 2026 7:42 PM IST

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) के तहत वंचितों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की योजना इसलिए बनाई गई ताकि ज़्यादा से ज़्यादा योग्य बच्चों को शिक्षा के अवसर मिल सकें, लेकिन यह योजना किसी माता-पिता को यह अधिकार नहीं देती कि वे एक ही बच्चे के लिए बार-बार सीट की मांग करें। बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में यह फैसला सुनाया।
जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस हितेन वेनेगांवकर की डिवीज़न बेंच ने पिता की याचिका खारिज की। पिता ने अपने घर के पास के एक स्कूल में अपने बच्चे के लिए सीट देने की 'ज़िद' की थी, जबकि वह पहले ही इस योजना का लाभ उठा चुका था और अपने बच्चे का एडमिशन एक दूसरे स्कूल में करवा चुका था, जो उसके घर से थोड़ी दूरी पर था।
जजों ने कहा कि यह प्रावधान (25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का) उन बच्चों के लिए शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए है, जो अन्यथा निजी संस्थानों में शिक्षा का खर्च नहीं उठा पाते। कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान के तहत बच्चों को सीटें देने के लिए लॉटरी चयन सहित एक 'व्यवस्थित' एडमिशन प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है।
7 मार्च को सुनाए गए फैसले में कहा गया,
"अगर याचिकाकर्ता द्वारा सुझाए गए अर्थ को मान लिया जाए तो यह किसी माता-पिता को RTE योजना के तहत एक ही बच्चे के लिए बार-बार आवेदन करने की अनुमति देगा, जब तक कि उन्हें अपनी पसंद का स्कूल न मिल जाए, भले ही उन्होंने पहले इस योजना के तहत एडमिशन का लाभ उठा लिया हो। ऐसी प्रथा धारा 12(1)(c) के उद्देश्य को गंभीर रूप से कमज़ोर करेगी और इसका नतीजा यह होगा कि अन्य योग्य बच्चों को एडमिशन से अन्यायपूर्ण तरीके से वंचित होना पड़ेगा, जो सीमित 25 प्रतिशत कोटे के तहत एडमिशन का इंतज़ार कर रहे हैं। यह योजना शिक्षा के अवसरों को ज़्यादा से ज़्यादा योग्य बच्चों के बीच बांटने के लिए बनाई गई, न कि एक ही लाभार्थी को बार-बार सीटें देने के लिए।"
मौजूदा मामले में बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता के बेटे को शैक्षणिक सत्र 2024-2025 में कक्षा I के लिए RTE कोटे के तहत पहले ही एडमिशन मिल चुका था। इस तरह उसने इस योजना का लाभ उठा लिया था। हालांकि, याचिकाकर्ता ने अपनी निजी असुविधा के कारण स्वेच्छा से उस स्कूल में अपने बेटे की पढ़ाई बीच में ही छुड़वा दी। जब उन्होंने RTE के तहत सीट अलॉट करने के लिए दोबारा अर्ज़ी दी तो अधिकारियों ने उनकी अर्ज़ी खारिज करते हुए बच्चे को पहले से अलॉट किए गए स्कूल में ही रखने का प्रस्ताव दिया और पॉलिसी के मुताबिक ट्रांसफर की संभावना भी बताई। हालांकि, जजों ने पाया कि याचिकाकर्ता ने इस विकल्प को ठुकरा दिया और 2025–2026 के एकेडमिक साल के लिए इस स्कीम के तहत पहली क्लास में नए एडमिशन पर ही ज़ोर दिया।
जजों ने कहा,
"इस कोर्ट की राय में इस तरह का ज़ोर RTE Act की भावना और स्कीम के खिलाफ है। अधिकारियों द्वारा एडमिशन रद्द करने का यह आधार कि याचिकाकर्ता के बेटे ने 2024–2025 के एकेडमिक साल में RTE की 25 प्रतिशत आरक्षण स्कीम का फ़ायदा पहले ही उठा लिया था, मनमाना, गैर-कानूनी या किसी भी कानूनी या संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करने वाला नहीं कहा जा सकता।"
जस्टिस वेनेगावकर द्वारा लिखे गए इस फ़ैसले में कहा गया कि अधिकारियों का यह फ़ैसला, इस स्कीम के तहत आरक्षित सीमित सीटों का सही बँटवारा सुनिश्चित करने के उद्देश्य के अनुरूप है।
बेंच ने ज़ोर देकर कहा,
"अनुच्छेद 21-A के तहत शिक्षा का अधिकार प्राथमिक शिक्षा तक पहुंच की गारंटी देता है, लेकिन यह किसी माता-पिता को एक बार फ़ायदा उठा लेने के बाद किसी खास कल्याण कोटे के तहत बार-बार एडमिशन का दावा करने का अधिकार नहीं देता।"
इन्हीं कारणों से कोर्ट को याचिका में कोई दम नहीं लगा और उसने अर्ज़ी खारिज की।
Case Title: Sampatrao Ramrao Teli vs State of Maharashtra (Writ Petition 1885 of 2026)

