हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
1 Nov 2026 8:00 AM IST

देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (26 अक्टूबर, 2026 से 30 अक्टूबर, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
वकील के ऑफिस में जातिसूचक गालियां देना भी पब्लिक व्यू' के दायरे में: कर्नाटक हाईकोर्ट ने SC/ST Act के तहत कार्यवाही रद्द करने से किया इनकार
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के तहत किसी वकील का कार्यालय भी 'पब्लिक व्यू' यानी सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में आ सकता है, यदि वहां आम लोग या अन्य मुवक्किल मौजूद हों। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी स्थान का निजी होना अपने आप में उसे सार्वजनिक दृष्टि के दायरे से बाहर नहीं करता।
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना एक महिला और उसकी मां की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। दोनों ने एक वकील द्वारा शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। उनके खिलाफ SC/ST Act की धाराओं 3(1)(r) और 3(1)(s) के साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 352 और 3(5) के तहत आरोप लगाए गए।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
सिर्फ पुलिस में शिकायत दर्ज कराना मानहानि नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस में की गई शिकायत में लगाए गए आरोप अपने आप में मानहानि नहीं माने जा सकते। कोर्ट ने कहा कि संबंधित बयान को उसके सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए, और सिविल मानहानि के मामले में यह देखना जरूरी है कि क्या बयान को सार्वजनिक किया गया है और क्या इससे किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने वकील की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। वकील ने एक अन्य वकील के खिलाफ 10 लाख रुपये का मानहानि का मुकदमा दायर किया, जिसे निचली अदालत ने खारिज किया।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
POCSO ट्रायल शुरू होने तक पीड़िता बालिग हो जाए, तब भी बंद कमरे में होगी गवाही: गुजरात हाईकोर्ट
गुजरात हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कथित यौन अपराध के समय पीड़िता नाबालिग थी, लेकिन POCSO मामले का ट्रायल शुरू होने तक वह 18 वर्ष की हो गई, तो भी उसकी गवाही बंद कमरे (In-camera Proceedings) में दर्ज करने संबंधी POCSO Act के प्रावधान लागू रहेंगे।
जस्टिस मूल चंद त्यागी ने कहा कि केवल इस आधार पर कि ट्रायल शुरू होने के समय पीड़िता 18 वर्ष से अधिक उम्र की हो चुकी थी, POCSO Act के तहत उसकी गवाही दर्ज करने की प्रक्रिया लागू होने से इनकार नहीं किया जा सकता।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
बच्चे के यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट करने से माता-पिता को रोकना, POCSO Act की धारा 21 के तहत 'रिपोर्ट न करने' का अपराध नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार (28 अक्टूबर) को कहा कि किसी नाबालिग के माता-पिता को 'प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस' एक्ट (POCSO Act) के तहत आने वाले अपराध की रिपोर्ट करने से रोकना, इस एक्ट की धारा 21 के तहत दंडनीय नहीं है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि धारा 21 केवल अपराध की रिपोर्ट न करने (यानी जानकारी न देने) पर ही सजा का प्रावधान करती है।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
एक ही घटना के दौरान बच्चे के स्तनों को दो बार छूना 'गंभीर यौन हमला' माना जाएगा: सिक्किम हाईकोर्ट
सिक्किम हाईकोर्ट ने कहा कि एक ही घटना के दौरान किसी बच्चे के स्तनों को दो बार छूना, 'यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण' अधिनियम (POCSO Act), 2012 की धारा 9(l) के तहत 'गंभीर यौन हमला' (एग्रवेटेड सेक्सुअल असॉल्ट) माना जाएगा। धारा 9(l) तब लागू होती है, जब कोई व्यक्ति किसी बच्चे के साथ एक से अधिक बार या बार-बार यौन हमला करता है।
जस्टिस भास्कर राज प्रधान ने टिप्पणी की, "एक ही घटना के दौरान अपीलकर्ता द्वारा पीड़िता के स्तनों को दो बार छूना, POCSO Act की धारा 9(l) की शर्तों को पूरा करता है। अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की अपनी गवाही के जरिए इसे साबित भी कर दिया। पीड़िता का यह बयान कि अपीलकर्ता ने उसके साथ बार-बार यौन हमला किया, 'गंभीर यौन हमला' (एग्रवेटेड सेक्सुअल असॉल्ट) के अपराध को साबित करता है।"
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पत्नी, बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता का भरण-पोषण पति का 'पवित्र दायित्व': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मनुस्मृति के श्लोक का दिया हवाला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पत्नी, नाबालिग बच्चों और आर्थिक रूप से असमर्थ बुजुर्ग माता-पिता का भरण-पोषण करना पति का न केवल कानूनी, बल्कि 'पवित्र दायित्व' भी है। कोर्ट ने इस संदर्भ में मनुस्मृति के अध्याय 11, श्लोक 10 का हवाला दिया।
जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की पीठ ने यह टिप्पणी कानपुर नगर की फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग को लेकर पत्नी की ओर से दाखिल क्रिमिनल रिवीजन पर सुनवाई करते हुए की।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
फ्लैट मालिकों की लिखित सहमति के बिना बिल्डर नहीं बदल सकता बिल्डिंग का नक्शा, अवैध निर्माण तोड़ने और FIR दर्ज करने का आदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिल्डर या प्रमोटर को उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (निर्माण, स्वामित्व और रखरखाव संवर्धन) अधिनियम 2010 की धारा 5(3)(a) के तहत बिल्डिंग का नक्शा, निर्माण संबंधी विनिर्देश या साझा क्षेत्रों में बदलाव करने से पहले सभी अपार्टमेंट मालिकों की लिखित सहमति लेनी होगी। यह वही नक्शा और विवरण हैं, जिनकी जानकारी फ्लैट खरीदते समय उन्हें दी गई।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि बिल्डिंग के स्वीकृत नक्शे या साझा सुविधाओं में बदलाव किया जाता है तो केवल यह तर्क देना पर्याप्त नहीं है कि निर्माण स्वीकृत फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) की सीमा के भीतर है। सभी फ्लैट मालिकों की लिखित सहमति और सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी आवश्यक है।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
डुअल पैन कार्ड मामला: आजम खान और बेटे अब्दुल्ला आजम को राहत, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सजा पर लगाई रोक; जमानत मंजूर
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुरुवार को कथित दो पैन कार्ड मामले में उत्तर प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खान और उनके बेटे एवं पूर्व विधायक अब्दुल्ला आजम खान की सजा पर रोक लगाई। कोर्ट ने दोनों की जमानत याचिकाएं भी मंजूर कर लीं। इस आदेश के बाद दोनों के जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हो सकता है। जस्टिस समित गोपाल की पीठ ने सजा निलंबित करने की मांग वाली अर्जियों को स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट की ट्रस्टीशिप को पहली नज़र में वसीयत के ज़रिए किसी और को नहीं सौंपा जा सकता: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि किसी पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट का कोई ट्रस्टी, पहली नज़र में, अपनी वसीयत के ज़रिए अपने पद के लिए किसी उत्तराधिकारी को नियुक्त नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि ट्रस्टीशिप विश्वास का एक व्यक्तिगत पद है, जो विरासत में नहीं मिलता। साथ ही किसी पब्लिक ट्रस्ट का प्रबंधन "पारिवारिक या वंशानुगत अधिकार" नहीं बन सकता। जस्टिस दीपक गुप्ता ने फरीदाबाद के 'जनहित सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट' द्वारा दायर एक रिवीजन याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पिछली सजा रद्द होने के बावजूद लंबित विभागीय जांच के कारण प्रमोशन नहीं मिल सकता: त्रिपुरा हाईकोर्ट
त्रिपुरा हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी के खिलाफ लंबित विभागीय कार्यवाही उसे प्रमोशन मिलने से रोक सकती है, भले ही उस पर पहले लगाई गई कोई सजा रद्द की गई हो। त्रिपुरा पुलिस सेवा (TPS) ग्रेड-II के पद पर पूर्व-प्रभावी प्रमोशन की मांग करने वाले एक पुलिस इंस्पेक्टर की याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि जब तक बाद में शुरू हुई विभागीय कार्यवाही पूरी नहीं हो जाती तब तक प्रमोशन देने का कोई आदेश नहीं दिया जा सकता।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
'शराब पीने को लेकर अचानक हुई बहस के दौरान चाकू का एक वार, पूर्व-नियोजित हत्या नहीं': झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि अचानक हुई बहस के दौरान, आवेश में आकर और बिना किसी पूर्व योजना के चाकू से किया गया वार IPC की धारा 300 के 'अपवाद 4' (Exception 4) के दायरे में आ सकता है। ऐसे मामले में अपराध 'हत्या' की श्रेणी में न आकर 'गैर-इरादतन हत्या' (Culpable Homicide not Amounting to Murder) माना जाएगा।
कोर्ट ने 88 वर्षीय एक पिता की हत्या की सजा को बदलकर IPC की धारा 304 (भाग II) के तहत अपराध में बदल दिया। इस पिता ने शराब पीने को लेकर हुई बहस के बाद अपने बेटे को चाकू घोंप दिया था, जिससे उसकी मौत हो गई।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
IPC की धारा 467 के तहत जालसाजी का अपराध JJ Act के तहत 'जघन्य' नहीं, बल्कि 'गंभीर': इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 467 के तहत आने वाला अपराध, जिसमें कम-से-कम 7 साल की सजा का प्रावधान नहीं है, उसे 'जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015' (JJ Act) के उद्देश्यों के लिए "जघन्य अपराध" (Heinous Offence) नहीं माना जा सकता। जस्टिस जय प्रकाश तिवारी की बेंच ने कहा कि यह अपराध JJ Act के तहत "गंभीर अपराधों" (Serious Offences) की श्रेणी में आता है।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
अविवाहित बहन भी किसान बीमा योजना के तहत 5 लाख रुपये की हकदार, परिवार की सूची में नाम होना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी अविवाहित बहन को केवल इस आधार पर दुर्घटना मृत्यु बीमा की पांच लाख रुपये की राशि से वंचित नहीं किया जा सकता कि योजना के तहत परिवार के सदस्यों की सूची में बहन का उल्लेख नहीं है। यदि वह मृतक की कानूनी वारिस है, तो वह बीमा राशि पाने की हकदार हो सकती है।
जस्टिस प्रकाश पाडिया और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि योजना के तहत बीमित परिवार के सदस्यों की सूची और परिवार के मुखिया या कमाने वाले व्यक्ति की दुर्घटना में मृत्यु होने पर नामित व्यक्ति अथवा कानूनी वारिस को बीमा राशि देने का प्रावधान अलग-अलग हैं। कानूनी वारिस की पात्रता को केवल परिवार के सदस्यों की सूची तक सीमित नहीं किया जा सकता।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
उम्र अधिक होने का मतलब यह नहीं कि गृहिणी परिवार में योगदान देना बंद कर देती है: दिल्ली हाईकोर्ट ने बढ़ाया दुर्घटना मुआवजा
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना के मामलों में केवल अधिक उम्र होने के आधार पर किसी गृहिणी को घर के कामकाज और परिवार की देखभाल के लिए दी जाने वाली अवैतनिक सेवाओं के बदले मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि बुजुर्ग महिलाएं भी घर के कामकाज, बच्चों और पोते-पोतियों की देखभाल सहित परिवार के लिए कई तरह की सेवाएं देती रहती हैं। केवल इसलिए उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि इसके बदले उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
HAMA के तहत वैकल्पिक उपाय होने के बावजूद, बालिग अविवाहित बेटी CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा कर सकती है: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि 'हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956' (HAMA) के तहत कोई वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने का मतलब यह नहीं है कि एक बालिग अविवाहित बेटी 'दंड प्रक्रिया संहिता' (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि बेटी को केवल इसलिए भरण-पोषण देने से मना नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके पास HAMA की धारा 20(3) के तहत कोई दूसरा उपाय मौजूद है।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने POCSO पीड़िताओं को आर्थिक सहायता के लिए अनिवार्य इंजरी रिपोर्ट की शर्त असंवैधानिक घोषित की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष योजना 2015 के तहत यौन अपराध की शिकार बच्चियों को आर्थिक सहायता देने के लिए पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट यानी प्रवेशात्मक यौन हमला दर्शाने वाली इंजरी रिपोर्ट अनिवार्य करने की शर्त को असंवैधानिक घोषित किया।
कोर्ट ने कहा कि यह शर्त मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है क्योंकि इसके कारण पीड़िता को ऐसी मेडिकल रिपोर्ट न होने पर सहायता से वंचित किया जा सकता है जो कानूनी या व्यावहारिक कारणों से उपलब्ध ही न हो।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत कस्टडी की अर्जी पर उसी कोर्ट में सुनवाई होनी चाहिए, जहां बच्चा रहता है: गुजरात हाईकोर्ट
गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' (अभिभावक और वार्ड अधिनियम) के तहत बच्चे की कस्टडी से जुड़ी कार्यवाही उसी फैमिली कोर्ट में सुनी जानी चाहिए, जिसके अधिकार क्षेत्र में बच्चा रहता है।
कोर्ट एक अलग रह रही पत्नी की उस अर्जी पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसने पति द्वारा दायर वैवाहिक मामले को हिम्मतनगर के फैमिली कोर्ट से राजकोट के फैमिली कोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग की थी। महिला अभी राजकोट में अपने माता-पिता के साथ रह रही है।

