इलाहाबाद हाईकोर्ट ने POCSO पीड़िताओं को आर्थिक सहायता के लिए अनिवार्य इंजरी रिपोर्ट की शर्त असंवैधानिक घोषित की
Amir Ahmad
24 Oct 2026 1:15 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष योजना 2015 के तहत यौन अपराध की शिकार बच्चियों को आर्थिक सहायता देने के लिए पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट यानी प्रवेशात्मक यौन हमला दर्शाने वाली इंजरी रिपोर्ट अनिवार्य करने की शर्त को असंवैधानिक घोषित किया।
कोर्ट ने कहा कि यह शर्त मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है क्योंकि इसके कारण पीड़िता को ऐसी मेडिकल रिपोर्ट न होने पर सहायता से वंचित किया जा सकता है जो कानूनी या व्यावहारिक कारणों से उपलब्ध ही न हो।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने कहा कि इंजरी रिपोर्ट का उपलब्ध न होना न तो यौन हमले के आरोप को गलत साबित करता है और न ही पीड़िता की तत्काल आर्थिक, चिकित्सा और पुनर्वास संबंधी सहायता की जरूरत को कम करता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कल्याणकारी योजना की प्रक्रिया ऐसी बाधा नहीं बन सकती जो पात्र पीड़िता को केवल ऐसे दस्तावेज के अभाव में सहायता से बाहर कर दे, जिसका योजना के उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध नहीं है।
कोर्ट नाबालिग बच्ची की ओर से उसकी मां द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में योजना के तहत आर्थिक सहायता का दावा खारिज किए जाने को चुनौती दी गई।
राज्य ने यह कहते हुए सहायता देने से इनकार किया था कि प्रवेशात्मक यौन हमले से संबंधित विशेष मेडिकल जांच सहमति नहीं मिलने के कारण नहीं हो सकी और इसलिए निर्धारित इंजरी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं थी।
मामले के अनुसार कथित घटना 28 जनवरी 2024 को हुई थी जब बच्ची आठ वर्ष की थी। आरोप था कि आरोपी ने बच्ची के निजी अंग में उंगली डाली और फिर अपना निजी अंग उसके मुंह में रखा। इस संबंध में भारतीय दंड संहिता और POCSO Act की संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई।
अगले दिन बच्ची की मेडिकल जांच कराई गई लेकिन प्रवेशात्मक यौन हमले से संबंधित विशेष जांच के लिए सहमति नहीं दी गई। इस कारण मेडिकल जांच का रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बावजूद योजना में निर्धारित इंजरी रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी। बाद में पुलिस ने POCSO Act की संबंधित धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की लेकिन जिला संचालन समिति ने इंजरी रिपोर्ट न होने के आधार पर आर्थिक सहायता का दावा खारिज किया।
योजना के नियमों के अनुसार गंभीर प्रवेशात्मक यौन हमले के लिए POCSO Act की धारा 6 के तहत तीन लाख रुपये की आर्थिक सहायता का प्रावधान है। इसके लिए FIR, चार्जशीट और प्रवेशात्मक यौन हमला दर्शाने वाली इंजरी रिपोर्ट को आवश्यक दस्तावेज बनाया गया। योजना के तहत शुरुआती एक लाख रुपये 15 दिनों के भीतर और शेष दो लाख रुपये चार्जशीट दाखिल होने के एक महीने के भीतर दिए जाने का प्रावधान है।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में दलील दी कि यह योजना एक स्वतंत्र कल्याणकारी व्यवस्था है और इसके तहत निर्धारित दस्तावेजी शर्तों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।
राज्य ने यह भी कहा कि पहले के एक खंडपीठ के फैसले में केवल दिखाई देने वाली शारीरिक चोट की अनिवार्यता से राहत दी गई थी इंजरी रिपोर्ट प्रस्तुत करने की शर्त समाप्त नहीं की गई।
हाईकोर्ट ने राज्य की दलील खारिज करते हुए कहा कि योजना का उद्देश्य गंभीर अपराधों की पीड़िताओं को तत्काल आर्थिक और चिकित्सा सहायता देना तथा उनके भरण-पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्वास में मदद करना है। इसलिए योजना की किसी भी शर्त को इस तरह लागू नहीं किया जा सकता जिससे उसका मूल उद्देश्य ही विफल हो जाए।
बेंच ने कहा कि प्रवेशात्मक यौन हमला ऐसा अपराध नहीं है, जिसमें हर स्थिति में दिखाई देने वाली शारीरिक चोट होना जरूरी हो। POCSO Act की धारा 3 के तहत अपराध साबित करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाली चोट अनिवार्य नहीं है। मेडिकल साक्ष्य आरोप की पुष्टि में सहायक हो सकते हैं लेकिन अपराध का अस्तित्व किसी प्रदर्शित शारीरिक चोट पर निर्भर नहीं करता।
इस संबंध में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले दलिप कुमार उर्फ डल्ली बनाम उत्तराखंड राज्य का हवाला देते हुए कहा कि यौन हमले को साबित करने के लिए शारीरिक चोटों का होना आवश्यक नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि इंजरी रिपोर्ट प्रासंगिक हो सकती है लेकिन उसे प्रवेशात्मक यौन हमले को पहचानने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
बेंच ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164-ए(7) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 184(7) का भी उल्लेख किया। इन प्रावधानों के अनुसार, महिला की सहमति या उसकी ओर से सहमति देने के लिए सक्षम व्यक्ति की सहमति के बिना संबंधित मेडिकल जांच नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि जब कानून सहमति देने से इनकार करने के अधिकार की रक्षा करता है और आंतरिक जांच न होने मात्र से आपराधिक मामला समाप्त नहीं होता, तो इसी आधार पर पीड़िता को कल्याणकारी योजना के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि किसी कल्याणकारी योजना के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी जांच के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जिसे संबंधित कानून सहमति के बिना करने की अनुमति नहीं देता। इंजरी रिपोर्ट को अनिवार्य बनाने से पीड़िता के सामने ऐसी स्थिति पैदा होती है, जिसमें उसे या तो विशेष मेडिकल जांच के लिए सहमति देनी होगी या फिर अपने पुनर्वास के लिए निर्धारित आर्थिक सहायता खोने का जोखिम उठाना पड़ेगा।
संविधान के अनुच्छेद 14 के संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि यह शर्त एक ही तरह के अपराध की पीड़िताओं को दो वर्गों में बांटती है। एक वर्ग में वे पीड़िताएं हैं जिनकी इंजरी रिपोर्ट उपलब्ध है, जबकि दूसरे में वे हैं, जिनकी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है। दूसरे वर्ग में ऐसी पीड़िताएं भी हो सकती हैं जिन्होंने संबंधित जांच के लिए सहमति नहीं दी, जिनकी जांच शारीरिक लक्षण समाप्त होने के बाद हुई या जिनके साथ कथित कृत्य में सामान्यतः दिखाई देने वाली चोट नहीं आती।
बेंच ने कहा कि दोनों वर्गों की पीड़िताओं ने समान अपराध और आघात का सामना किया हो सकता है और उन्हें तत्काल देखभाल तथा पुनर्वास की समान आवश्यकता हो सकती है। इंजरी रिपोर्ट की उपलब्धता से न तो आरोप की गंभीरता तय होती है न पीड़िता की विश्वसनीयता और न ही उसकी आर्थिक सहायता की जरूरत।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने प्रवेशात्मक यौन हमला दर्शाने वाली इंजरी रिपोर्ट को अनिवार्य करने की शर्त को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त किया।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि मेडिकल रिपोर्ट या इंजरी रिपोर्ट उपलब्ध है, तो सक्षम प्राधिकारी उसे देख और उस पर विचार कर सकता है।
हाईकोर्ट ने जिला संचालन समिति के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत नाबालिग पीड़िता की आर्थिक सहायता का दावा खारिज किया गया।
कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि फैसले की तारीख से दस दिनों के भीतर पीड़िता को तीन लाख रुपये की आर्थिक सहायता जारी की जाए। इसके साथ ही याचिका स्वीकार की गई।

