फ्लैट मालिकों की लिखित सहमति के बिना बिल्डर नहीं बदल सकता बिल्डिंग का नक्शा, अवैध निर्माण तोड़ने और FIR दर्ज करने का आदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • फ्लैट मालिकों की लिखित सहमति के बिना बिल्डर नहीं बदल सकता बिल्डिंग का नक्शा, अवैध निर्माण तोड़ने और FIR दर्ज करने का आदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिल्डर या प्रमोटर को उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (निर्माण, स्वामित्व और रखरखाव संवर्धन) अधिनियम 2010 की धारा 5(3)(a) के तहत बिल्डिंग का नक्शा, निर्माण संबंधी विनिर्देश या साझा क्षेत्रों में बदलाव करने से पहले सभी अपार्टमेंट मालिकों की लिखित सहमति लेनी होगी। यह वही नक्शा और विवरण हैं, जिनकी जानकारी फ्लैट खरीदते समय उन्हें दी गई।

    जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि बिल्डिंग के स्वीकृत नक्शे या साझा सुविधाओं में बदलाव किया जाता है तो केवल यह तर्क देना पर्याप्त नहीं है कि निर्माण स्वीकृत फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) की सीमा के भीतर है। सभी फ्लैट मालिकों की लिखित सहमति और सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी आवश्यक है।

    कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत प्रत्येक अपार्टमेंट मालिक का साझा क्षेत्रों और सुविधाओं में अविभाजित हिस्सेदारी का प्रतिशत स्थायी प्रकृति का है। इसे सभी अपार्टमेंट मालिकों की लिखित सहमति और सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी के बिना बदला नहीं जा सकता। कानून की धारा 4(1)(c) और 4(1)(d) के तहत प्रमोटर के लिए यह भी जरूरी है कि वह फ्लैट बेचने से पहले पूरी बिल्डिंग के स्वीकृत नक्शे, निर्माण विनिर्देशों और साझा क्षेत्रों व सुविधाओं का विवरण लिखित रूप में उपलब्ध कराए।

    यह मामला गाजियाबाद के साहिबाबाद स्थित 95, कटोरी मिल, मोहन नगर के ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़ा है। इस परियोजना का नक्शा 29 मई 2006 को 34 टावरों और 904 आवासीय इकाइयों के लिए स्वीकृत किया गया। हालांकि, हिंदन एयर बेस के अधिकारियों द्वारा प्रमोटर के भूमि स्वामित्व पर आपत्ति जताए जाने के बाद 3 जुलाई 2010 को नक्शा रद्द कर दिया गया।

    इसके बाद गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने 15 नवंबर 2011, 13 जनवरी 2015 और 18 दिसंबर 2024 को तीन बार नक्शे की कंपाउंडिंग की। अंतिम कंपाउंडिंग के जरिए टावर 16, 17, 18 और 19 की नौवीं व दसवीं मंजिलों के साथ दो नए टावरों को भी नियमित करने का प्रयास किया गया।

    ग्यारह अपार्टमेंट मालिकों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा कि नक्शे में बदलाव से पहले उनकी सहमति नहीं ली गई। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास प्राधिकरण प्रमोटर के साथ मिलीभगत कर रहा था और स्वीकृत FAR की गणना करते समय भारतीय वायुसेना की जमीन को भी शामिल किया गया।

    प्रमोटर और विकास प्राधिकरण ने दलील दी कि धारा 5(3)(a) के तहत सहमति तभी जरूरी है जब मूल लेआउट में स्वीकृत आवासीय इकाइयों की संख्या बढ़ाई जाए। उनका कहना था कि उपलब्ध FAR के तहत 1,603 इकाइयों का निर्माण संभव था, जबकि 1,096 इकाइयों को मंजूरी दी गई थी। इसलिए उनके अनुसार साझा क्षेत्रों या सुविधाओं में कोई कमी नहीं हुई। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता उन टावरों में नहीं रहते, जिनमें अतिरिक्त मंजिलें बनाई गईं, इसलिए उन्हें शिकायत करने का अधिकार नहीं है।

    हाईकोर्ट ने एम/एस डिजाइनआर्च इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम वाइस चेयरमैन, गाजियाबाद विकास प्राधिकरण मामले में अपनी खंडपीठ के फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया था कि अपार्टमेंट की डीड में दर्ज साझा क्षेत्रों में अविभाजित हिस्सेदारी का प्रतिशत स्थायी होता है और सभी मालिकों की लिखित सहमति तथा सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी के बिना इसे बदला नहीं जा सकता। साझा क्षेत्रों को बेचा या विभाजित भी नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सुपरटेक लिमिटेड बनाम एमराल्ड कोर्ट ओनर्स रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन फैसले पर भी भरोसा किया। उस मामले में संशोधित नक्शों के कारण फ्लैट मालिकों की साझा क्षेत्रों में अविभाजित हिस्सेदारी का मूल्य कम होने और आवश्यक सहमति नहीं लेने को कानून का उल्लंघन माना गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून की धारा 4(4) के तहत अनुमत छोटे बदलावों के अलावा, प्रमोटर इच्छित खरीदार की पूर्व सहमति के बिना नक्शे और निर्माण विनिर्देश नहीं बदल सकता।

    हाईकोर्ट ने गौर किया कि पहली याचिका दाखिल करने वाले फ्लैट मालिक की सेल डीड 7 सितंबर 2012 को, यानी पहली कंपाउंडिंग के बाद निष्पादित हुई। इसके बावजूद डीड में केवल 29 मई 2006 को स्वीकृत लेआउट का उल्लेख था और 15 नवंबर 2011 की कंपाउंडिंग के बारे में कुछ नहीं बताया गया। डीड की तीसरी शर्त के तहत खरीदार को परिसर के नीचे की फ्रीहोल्ड जमीन और साझा क्षेत्रों व सुविधाओं में आनुपातिक अविभाजित स्वामित्व अधिकार दिए गए।

    कोर्ट ने कहा कि यदि सेल डीड निष्पादित होने के बाद प्रमोटर उस नक्शे या निर्माण विनिर्देशों में बदलाव करता है, जो फ्लैट खरीदते समय खरीदार को दिखाए गए, और इससे खुले क्षेत्र, साझा क्षेत्र या अन्य सुविधाएं कम होती हैं तो यह प्रत्येक फ्लैट मालिक की स्थायी अविभाजित हिस्सेदारी में कटौती होगी। कानून के तहत ऐसा बदलाव सभी अपार्टमेंट मालिकों की लिखित सहमति के बिना नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने पाया कि अतिरिक्त FAR का इस्तेमाल बेसमेंट, मुमटी, ग्राउंड फ्लोर और बालकनियों में किया गया। रिकॉर्ड के अनुसार, कई टावरों में अनेक फ्लैटों की बालकनियों को बढ़ाकर FAR का उपयोग किया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि इससे पता चलता है कि प्रमोटर ने अधिक कीमत पर फ्लैट बेचकर अधिकतम आर्थिक लाभ कमाने के उद्देश्य से ये बदलाव किए।

    हाईकोर्ट ने अपार्टमेंट मालिकों की एसोसिएशन की वर्ष 2015 की याचिका में साझा क्षेत्रों को ग्राउंड फ्लोर के फ्लैटों के साथ बेचने के आरोप को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि विकास प्राधिकरण के अपने रिकॉर्ड में ऐसे 85 लोगों की पहचान की गई थी, जिन्हें साझा क्षेत्र हस्तांतरित किए गए थे और जिन्होंने वहां चारदीवारी तथा कमरे बना लिए थे।

    कोर्ट ने कहा कि 2010 के कानून की धारा 5(4) साझा क्षेत्रों और सुविधाओं की बिक्री पर रोक लगाती है और धारा 25 के तहत ऐसा करना अपराध है।

    इस मामले में 11 अप्रैल 2018 को आईपीसी की धाराओं 420, 467, 468 और 471 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। हालांकि, जांच के बाद यह कहते हुए फाइनल रिपोर्ट दाखिल की गई कि विवाद दीवानी प्रकृति का है और कंपाउंड किया जा सकता है।

    इस पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा,

    “यह देखकर हम स्तब्ध हैं कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों की जांच किए बिना फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी गई।”

    कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी ने न तो घटनास्थल का निरीक्षण किया और न ही प्रमोटर का बयान दर्ज किया। उसने केवल सोसायटी के जनरल मैनेजर का बयान दर्ज किया। हाईकोर्ट ने इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह को निलंबित करने और कर्तव्य में लापरवाही के लिए उनके खिलाफ जांच करने का निर्देश दिया। साथ ही, गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को फाइनल रिपोर्ट को मंजूरी देने वाले अधिकारी की पहचान करने को कहा, ताकि राज्य सरकार उसके आचरण की जांच कर सके।

    हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि प्रमोटर ने कंप्लीशन सर्टिफिकेट के बिना फ्लैट हस्तांतरित किए और कब्जा सौंप दिया। इसे उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 15A और 2010 के अपार्टमेंट कानून की धारा 4(5) का उल्लंघन माना गया। कोर्ट ने प्रमोटर की यह दलील स्वीकार नहीं की कि कंप्लीशन सर्टिफिकेट को स्वतः जारी हुआ माना जाना चाहिए। उसने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में फ्लैटों में रहने वाले मालिकों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

    कोर्ट ने कहा,

    “यह स्पष्ट मामला है जिसमें प्रमोटर ने सही तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया और साझा क्षेत्रों को बेचकर अपार्टमेंट मालिकों के साथ धोखाधड़ी की। इस तरह उसने अपराध किया।”

    हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि प्रमोटर ने भारतीय वायुसेना के स्वामित्व वाली जमीन को परियोजना में शामिल किया और विकास प्राधिकरण ने भी FAR की गणना में उस जमीन को शामिल किया। कोर्ट ने इसे प्रथम दृष्टया पूरी तरह अवैध माना।

    हाईकोर्ट के प्रमुख निर्देश

    कोर्ट ने प्रमोटर के खिलाफ धोखाधड़ी, गलत तथ्यों के प्रस्तुतीकरण और 2010 के अपार्टमेंट कानून के उल्लंघन के आरोपों में दो सप्ताह के भीतर FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। मामले की जांच गाजियाबाद में एडिशनल पुलिस कमिश्नर से नीचे के रैंक का अधिकारी नहीं करेगा।

    गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के वाइस चेयरमैन की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित करने का आदेश दिया गया। समिति 85 लोगों को नोटिस देकर सुनवाई करेगी, उनके पक्ष में बेचे गए साझा क्षेत्रों की पहचान करेगी, वहां किए गए निर्माण को ध्वस्त कराएगी और छह महीने के भीतर उन क्षेत्रों को सोसायटी को वापस दिलाएगी।

    प्रमोटर को उन साझा क्षेत्रों की बिक्री से मिली रकम वापस करने का निर्देश दिया गया। इसके साथ समिति द्वारा निर्धारित निर्माण लागत और भुगतान की तारीख से 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

    हाईकोर्ट ने 18 दिसंबर 2024 की तीसरी कंपाउंडिंग रद्द की। कोर्ट ने टावर 16, 17, 18 और 19 की नौवीं तथा दसवीं मंजिलों और टावर 27 व 28 को पूरी तरह दो महीने के भीतर ध्वस्त करने का आदेश दिया।

    प्रमोटर पर 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया, जबकि विकास प्राधिकरण को प्रत्येक याचिकाकर्ता को 50,000 रुपये देने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने दोनों रिट याचिकाओं को स्वीकार किया।

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