'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत कस्टडी की अर्जी पर उसी कोर्ट में सुनवाई होनी चाहिए, जहां बच्चा रहता है: गुजरात हाईकोर्ट
Shahadat
23 Oct 2026 6:31 PM IST

गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' (अभिभावक और वार्ड अधिनियम) के तहत बच्चे की कस्टडी से जुड़ी कार्यवाही उसी फैमिली कोर्ट में सुनी जानी चाहिए, जिसके अधिकार क्षेत्र में बच्चा रहता है।
कोर्ट एक अलग रह रही पत्नी की उस अर्जी पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसने पति द्वारा दायर वैवाहिक मामले को हिम्मतनगर के फैमिली कोर्ट से राजकोट के फैमिली कोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग की थी। महिला अभी राजकोट में अपने माता-पिता के साथ रह रही है।
महिला ने बताया कि वह अनपढ़ है और अपने बच्चों से बहुत दूर रह रही है। अपने बच्चों की कस्टडी पाने के लिए - जो अभी उनके पिता (पति) के पास हैं - उसने हिम्मतनगर के फैमिली कोर्ट में 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत कार्यवाही शुरू की है। पत्नी ने अभिभावक नियुक्त करने और नाबालिग बच्चे की कस्टडी/वापसी के लिए अर्जी दाखिल की थी।
उसने कहा कि पति ने भी हिम्मतनगर के फैमिली कोर्ट में उसके खिलाफ एक मामला दायर किया। हिम्मतनगर और राजकोट के बीच लगभग 300 किमी की दूरी है, जिससे महिला को पति द्वारा शुरू की गई कार्यवाही में शामिल होने के लिए काफी परेशानी और असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
पति का तर्क था कि चूंकि महिला ने खुद हिम्मतनगर के फैमिली कोर्ट में 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत मामला दायर किया। उसे वहां मौजूद रहना ही होगा, इसलिए पति द्वारा दायर मामले को हिम्मतनगर से राजकोट के फैमिली कोर्ट में ट्रांसफर करने का कोई मतलब नहीं है।
जस्टिस मौलिक जे. शेलत ने गौर किया कि पत्नी ने खुद हिम्मतनगर के फैमिली कोर्ट में 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत कार्यवाही शुरू की है। उसे उस कार्यवाही में शामिल होना ही होगा।
कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं है कि कानून के प्रावधानों के अनुसार, कस्टडी के लिए अर्जी "उस कोर्ट में दायर की जानी चाहिए जहाँ बच्चे रह रहे हैं," यानी हिम्मतनगर के फैमिली कोर्ट में।
अदालत ने कहा,
"मेरी राय में, अगर ऐसी स्थिति है तो 1890 के अधिनियम के प्रावधानों के तहत आवेदक द्वारा शुरू की गई कार्यवाही को हिम्मतनगर फैमिली कोर्ट से राजकोट फैमिली कोर्ट में ट्रांसफर नहीं किया जा सकता, क्योंकि राजकोट फैमिली कोर्ट के पास इन पक्षों के बीच के विवाद पर फैसला सुनाने का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) नहीं है। पक्षों के बीच के इस विवाद के अलावा, बच्चे के कल्याण का सवाल भी है, जिसे किसी भी अदालत के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
चूंकि यह आवेदन 1890 के अधिनियम के तहत दायर किया गया। इस पर फैसला लेने के लिए संबंधित अदालत को कोई भी आदेश पारित करने से पहले बच्चे से बात करनी होगी, इसलिए यह बेहतर होगा कि इस मामले की सुनवाई और फैसला उसी अदालत में हो, जिसके अधिकार क्षेत्र में बच्चे रह रहे हैं—यानी हिम्मतनगर फैमिली कोर्ट में।"
अदालत ने पति की इस बात पर भी ध्यान दिया कि अगर पत्नी व्यक्तिगत रूप से कार्यवाही में शामिल होती है, तो वह उसके यात्रा खर्च का भुगतान करेगा।
अदालत ने आगे कहा,
"आवेदक के पास यह विकल्प है कि वह संबंधित अदालत से दोनों कार्यवाहियों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शामिल होने की अनुमति मांगे। जब भी ऐसा अनुरोध किया जाएगा तो संबंधित फैमिली कोर्ट उसे स्वीकार कर लेगी, बशर्ते कि जिरह (Cross-Examination) या किसी अन्य कारण से उसकी शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य न हो।"
पत्नी की याचिका खारिज करते हुए अदालत ने हिम्मतनगर फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह दोनों कार्यवाहियों में तेजी लाए और कानून के अनुसार जल्द-से-जल्द फैसला करे। अदालत ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट के आदेश की प्रति मिलने की तारीख से एक साल के भीतर फैसला आ जाना चाहिए।
Case Title : X v/s Y

