पत्नी, बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता का भरण-पोषण पति का 'पवित्र दायित्व': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मनुस्मृति के श्लोक का दिया हवाला
Praveen Mishra
29 Oct 2026 4:22 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पत्नी, नाबालिग बच्चों और आर्थिक रूप से असमर्थ बुजुर्ग माता-पिता का भरण-पोषण करना पति का न केवल कानूनी, बल्कि 'पवित्र दायित्व' भी है। कोर्ट ने इस संदर्भ में मनुस्मृति के अध्याय 11, श्लोक 10 का हवाला दिया।
जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की पीठ ने यह टिप्पणी कानपुर नगर की फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग को लेकर पत्नी की ओर से दाखिल क्रिमिनल रिवीजन पर सुनवाई करते हुए की।
कोर्ट ने मनुस्मृति के श्लोक को उद्धृत किया:
“वृद्धौ च मातापितरौ साध्वी भार्या सुतः शिशुः।
अपकार्यशतं कृत्वा भर्तव्या मनुर्ब्रवीत॥”
कोर्ट द्वारा दिए गए अंग्रेजी अनुवाद के अनुसार, वृद्ध माता-पिता, सदाचारी पत्नी और छोटे बच्चे का भरण-पोषण किया जाना चाहिए, भले ही इसके लिए सौ अनुचित कार्य क्यों न करने पड़ें—ऐसा मनु कहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने 22 अक्टूबर के अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले Anju Garg and Another v. Deepak Kumar Garg (2022) का भी उल्लेख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा था कि पत्नी और नाबालिग बच्चों को आर्थिक सहायता देना पति का पवित्र दायित्व है। यदि पति शारीरिक रूप से सक्षम है, तो उसे वैध साधनों से कमाई करनी चाहिए और वह केवल अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए कमाने से इनकार नहीं कर सकता, सिवाय उन परिस्थितियों के जिन्हें कानून मान्यता देता है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की कार्यवाही का उद्देश्य परित्यक्त पत्नी को भोजन, कपड़ा और आश्रय उपलब्ध कराकर उसे निराश्रित होने से बचाना है।
पत्नी ने ₹40,000 मासिक भरण-पोषण की मांग की
मामले में फैमिली कोर्ट ने पत्नी और उसकी नाबालिग बेटी के लिए ₹19,000 प्रति माह भरण-पोषण निर्धारित किया था। पत्नी ने इस राशि को बढ़ाकर ₹40,000 प्रति माह करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।
पति उन्नाव जिले में इंडियन बैंक में विंडो ऑपरेटर के पद पर कार्यरत है।
पत्नी की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि कर्ज की किस्तों जैसी स्वैच्छिक वित्तीय प्रतिबद्धताओं के कारण पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण की प्राथमिक जिम्मेदारी कम नहीं हो सकती।
इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के Deepa Joshi v. Gaurav Joshi (2026) फैसले का हवाला दिया गया। इसमें कहा गया था कि विशेष रूप से संपत्ति बनाने या हासिल करने से जुड़े कर्ज का भुगतान आवश्यक या अपरिहार्य खर्च के समान नहीं माना जा सकता।
वहीं, पति के वकील ने कहा कि वह पत्नी और नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए अपने वेतन का 25% कटवाने को तैयार है।
वेतन से 25% कटौती का निर्देश
मामले का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में संशोधन किया। कोर्ट ने इंडियन बैंक के संबंधित वरिष्ठ अधिकारी को निर्देश दिया कि पति के सकल वेतन में से आयकर की कटौती करने के बाद बची राशि का 25% काटकर पत्नी के सत्यापित बैंक खाते में जमा किया जाए।
कोर्ट ने इसी निर्देश के साथ क्रिमिनल रिवीजन का निपटारा कर दिया।

