वकील के ऑफिस में जातिसूचक गालियां देना भी पब्लिक व्यू' के दायरे में: कर्नाटक हाईकोर्ट ने SC/ST Act के तहत कार्यवाही रद्द करने से किया इनकार
Amir Ahmad
31 Oct 2026 12:59 PM IST

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के तहत किसी वकील का कार्यालय भी 'पब्लिक व्यू' यानी सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में आ सकता है, यदि वहां आम लोग या अन्य मुवक्किल मौजूद हों।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी स्थान का निजी होना अपने आप में उसे सार्वजनिक दृष्टि के दायरे से बाहर नहीं करता।
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना एक महिला और उसकी मां की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। दोनों ने एक वकील द्वारा शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। उनके खिलाफ SC/ST Act की धाराओं 3(1)(r) और 3(1)(s) के साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 352 और 3(5) के तहत आरोप लगाए गए।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने पहले वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में शिकायतकर्ता वकील की सेवाएं ली थीं। आरोप है कि बाद में दोनों ने वकील के कार्यालय में अन्य मुवक्किलों की मौजूदगी में उनकी जाति का उल्लेख करते हुए जातिसूचक अपशब्द कहे।
SC/ST Act की धाराएं 3(1)(r) और 3(1)(s) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने या जातिसूचक गालियां देने से संबंधित हैं, बशर्ते ऐसा कृत्य सार्वजनिक स्थान पर या सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में किया गया हो।
'पब्लिक प्लेस' और 'प्लेस विदिन पब्लिक व्यू' के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्वर्ण सिंह बनाम राज्य (2008) के फैसले का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में कहा था कि 'प्लेस विदिन पब्लिक व्यू' और 'पब्लिक प्लेस' को एक जैसा नहीं समझना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि कोई स्थान निजी स्वामित्व वाला होने के बावजूद सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में आ सकता है। दूसरी ओर, 'पब्लिक प्लेस' आम तौर पर ऐसे स्थान को कहा जाता है, जिसका स्वामित्व या पट्टा सरकार, नगरपालिका, किसी अन्य स्थानीय निकाय, ग्राम सभा या राज्य से संबद्ध संस्था के पास हो, न कि किसी निजी व्यक्ति या निजी संस्था के पास।
मौजूदा मामले में कोर्ट ने शिकायत और आरोपपत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि उनमें स्पष्ट रूप से आरोप है कि शिकायतकर्ता के कार्यालय में कई मुवक्किलों की मौजूदगी में याचिकाकर्ताओं ने उनकी जाति का नाम लेकर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया।
कोर्ट ने कहा कि किसी कार्यालय का निजी होना उसे अनिवार्य रूप से सार्वजनिक स्थान नहीं बनाता, लेकिन वहां अन्य मुवक्किलों की मौजूदगी और उनके द्वारा कथित अपशब्द सुने जाने के कारण यह जांच का विषय है कि क्या याचिकाकर्ताओं ने जानबूझकर शिकायतकर्ता को उसकी जाति के आधार पर अपमानित किया।
याचिकाकर्ताओं पर यह आरोप भी है कि उन्होंने शिकायतकर्ता के गूगल बिजनेस प्रोफाइल पर अपमानजनक टिप्पणियां पोस्ट कीं।
आरोप है कि इन टिप्पणियों में शिकायतकर्ता की जाति का उल्लेख किया गया, जिससे उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया इन घटनाओं को SC/ST Act के तहत अपराधों के दायरे में माना।
कोर्ट ने BNS की धारा 352 के तहत लगाए गए आरोप को भी रद्द करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने के कृत्य में आपराधिक धमकी का पहलू भी निहित हो सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अब याचिकाकर्ताओं को सुनवाई के दौरान इन आरोपों के संबंध में अपनी बेगुनाही साबित करनी होगी। इसके साथ ही कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज की।

