सिर्फ पुलिस में शिकायत दर्ज कराना मानहानि नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

  • सिर्फ पुलिस में शिकायत दर्ज कराना मानहानि नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस में की गई शिकायत में लगाए गए आरोप अपने आप में मानहानि नहीं माने जा सकते। कोर्ट ने कहा कि संबंधित बयान को उसके सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए, और सिविल मानहानि के मामले में यह देखना जरूरी है कि क्या बयान को सार्वजनिक किया गया है और क्या इससे किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है।

    जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने वकील की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। वकील ने एक अन्य वकील के खिलाफ 10 लाख रुपये का मानहानि का मुकदमा दायर किया, जिसे निचली अदालत ने खारिज किया।

    यह विवाद मार्च 2022 में पटियाला हाउस कोर्ट में दो वकीलों के बीच हुई बहस के बाद शुरू हुआ, जिसके बाद प्रतिवादी (सामने वाले वकील) ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में प्रतिवादी ने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता (मुकदमा करने वाले वकील) ने उस पर हमला किया और उसे धमकी दी। साथ ही उसने अपीलकर्ता को एक प्रभावशाली व्यक्ति बताते हुए कहा कि उसके "गुंडों और समाज के बुरे तत्वों" के साथ संबंध हैं।

    अपीलकर्ता का दावा था कि यह बयान झूठा, दुर्भावनापूर्ण और मानहानि करने वाला है। इसे कानूनी बिरादरी में उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के इरादे से दिया गया। उसने मुआवजे के तौर पर 10 लाख रुपये की मांग की।

    वहीं, प्रतिवादी का तर्क था कि यह बयान एक कथित हमले और जान से मारने की धमकी की रिपोर्ट करने के संदर्भ में दिया गया, और पुलिस में शिकायत दर्ज कराना मानहानि नहीं माना जा सकता।

    ट्रायल कोर्ट ने CPC (सिविल प्रक्रिया संहिता) के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत मुकदमा खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि शिकायत में मानहानि का कोई ठोस आधार (कॉज ऑफ एक्शन) नहीं बनता।

    अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने जांच की कि क्या पुलिस शिकायत में अपीलकर्ता के "गुंडों और समाज के बुरे तत्वों" से जुड़े होने का आरोप लगाने वाला बयान, अपने आप में मानहानि माना जा सकता है।

    कोर्ट ने कानून लागू करने वाली एजेंसियों (जैसे पुलिस) के सामने दिए गए बयानों से जुड़े कई न्यायिक फैसलों का हवाला दिया और कहा कि केवल पुलिस में शिकायत दर्ज कराना मानहानि नहीं है।

    कोर्ट ने कहा,

    "आरोप की प्रकृति और संदर्भ, क्या इसे सार्वजनिक किया गया, और क्या इसमें कोई विशेषाधिकार (प्रिविलेज) लागू होता है - इन सभी बातों पर विचार किया जाना चाहिए।"

    कोर्ट ने यह भी कहा कि इस बयान को प्रतिवादी के उस आरोप के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए, जिसमें उसने कहा था कि उसे जान से मारने की धमकी दी गई और उसे अपनी जान का खतरा महसूस हो रहा था। अदालत ने आगे कहा कि शिकायत में ऐसा कोई ठोस दावा नहीं किया गया, जिससे पता चले कि किसी अन्य व्यक्ति ने वह बयान सुना हो, या उनकी नज़र में अपीलकर्ता की प्रतिष्ठा कम हुई हो।

    आगे कहा गया,

    “किसी ऐसे व्यक्ति का नाम नहीं बताया गया, जिसने इस घटना को देखा हो और जिसकी नज़र में वादी की प्रतिष्ठा कम हुई हो। इसके अलावा, ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया, जिससे पता चले कि वादी की प्रतिष्ठा को कोई नुकसान पहुंचा है।”

    अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि प्रतिवादी ने अपीलकर्ता की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के इरादे से वह बयान दिया था।

    इसलिए अदालत ने अपील खारिज की।

    Case Title : Jai Gupta v. Sunil Kumar Roy

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