HAMA के तहत वैकल्पिक उपाय होने के बावजूद, बालिग अविवाहित बेटी CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा कर सकती है: बॉम्बे हाईकोर्ट

  • HAMA के तहत वैकल्पिक उपाय होने के बावजूद, बालिग अविवाहित बेटी CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा कर सकती है: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि 'हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956' (HAMA) के तहत कोई वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने का मतलब यह नहीं है कि एक बालिग अविवाहित बेटी 'दंड प्रक्रिया संहिता' (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती।

    कोर्ट ने कहा कि बेटी को केवल इसलिए भरण-पोषण देने से मना नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके पास HAMA की धारा 20(3) के तहत कोई दूसरा उपाय मौजूद है।

    जस्टिस मेहरोज़ के. पठान एक पिता द्वारा दायर 'क्रिमिनल रिवीजन याचिका' (Criminal Revision Petition) पर सुनवाई कर रहे थे। पिता ने नागपुर की फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी बेटी और बेटे में से प्रत्येक को 7,000 रुपये का भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया।

    पिता ने तर्क दिया कि बेटी, जो अब बालिग हो चुकी है, वह केवल HAMA की धारा 20(3) के तहत ही भरण-पोषण का दावा कर सकती है। इस धारा के अनुसार, अविवाहित हिंदू बेटी, जो अपना खर्च खुद उठाने में असमर्थ है, शादी होने तक अपने पिता से भरण-पोषण मांग सकती है। पिता का कहना था कि फैमिली कोर्ट का CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण देने का आदेश रद्द किया जाना चाहिए।

    कोर्ट ने कहा कि HAMA के तहत कोई वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने मात्र से बेटी को CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा करने से नहीं रोका जा सकता।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "...इस तरह के वैकल्पिक उपाय का उपलब्ध होना, CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा करने में कोई रुकावट नहीं बन सकता। खासकर तब, जब याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहा हो कि दूसरी पक्षकार (बेटी) अपना खर्च खुद उठाने में सक्षम है।"

    'जगदीश जुगतावत बनाम मंजू लता व अन्य' मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट के उस फैसले में कोई गलती नहीं है, जिसमें अविवाहित बालिग बेटी को भरण-पोषण देना जारी रखने का आदेश दिया गया।

    अदालत ने कहा,

    “जगदीश जुगतावत बनाम मंजू लता व अन्य (उपर्युक्त) मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए—जो HAMA, 1956 की धारा 20(3) के प्रावधानों को देखते हुए दी गई थीं—ऐसा लगता है कि फैमिली कोर्ट ने अविवाहित बालिग बेटी को भी भरण-पोषण (मेंटेनेंस) देने में कोई गलती नहीं की।”

    जहां तक बेटे की बात है, जो रिवीजन याचिका लंबित रहने के दौरान बालिग हो गया, अदालत ने कहा कि पिता इस मुद्दे को उचित मंच के समक्ष CrPC की धारा 127 के तहत आवेदन दायर करके उठा सकते हैं।

    इसके अनुसार, अदालत ने रिवीजन याचिका खारिज की।

    Case Title: Anand Harishchandra Chouhan v. Smt. Shaila [Criminal Revision No. 53 of 2022]

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