बच्चे के यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट करने से माता-पिता को रोकना, POCSO Act की धारा 21 के तहत 'रिपोर्ट न करने' का अपराध नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

  • बच्चे के यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट करने से माता-पिता को रोकना, POCSO Act की धारा 21 के तहत रिपोर्ट न करने का अपराध नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार (28 अक्टूबर) को कहा कि किसी नाबालिग के माता-पिता को 'प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस' एक्ट (POCSO Act) के तहत आने वाले अपराध की रिपोर्ट करने से रोकना, इस एक्ट की धारा 21 के तहत दंडनीय नहीं है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि धारा 21 केवल अपराध की रिपोर्ट न करने (यानी जानकारी न देने) पर ही सजा का प्रावधान करती है।

    एक नाबालिग बच्ची के यौन उत्पीड़न की घटना की रिपोर्ट करने से माता-पिता को रोकने के आरोप में फंसाए गए व्यक्ति को बरी करते हुए जस्टिस हितेन वेनेगावकर ने कहा कि धारा 21 केवल पुलिस को ऐसी जानकारी न देने पर सजा देती है। इस धारा में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि माता-पिता को अपराध की रिपोर्ट करने से रोकना, उन्हें धमकाना या उन पर दबाव डालना भी कोई अपराध है।

    जस्टिस वेनेगावकर ने कहा,

    "किसी अपराध की रिपोर्ट न करने और किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे को रिपोर्ट करने से रोकने के आरोप के बीच फर्क करना जरूरी है। धारा 21(1) कानूनी रूप से रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी न निभाने पर सजा देती है। यह धारा किसी व्यक्ति को शिकायत दर्ज करने से रोकने, धमकाने या बहकाने को अलग से कोई अपराध नहीं बनाती है। अगर इसके सभी जरूरी तत्व साबित हो जाते हैं, तो ऐसा बर्ताव किसी अन्य कानूनी प्रावधान के तहत अपराध हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति खुद कानूनी रूप से रिपोर्ट करने के लिए बाध्य था, तो उसके द्वारा जानबूझकर रिपोर्ट न करने के मामले में, यह दबाव डालने वाली बात एक अहम सबूत हो सकती है। हालांकि, दबाव डालने के आरोप को धारा 21(1) के तहत जरूरी तत्वों की जगह नहीं माना जा सकता। कोर्ट को यह देखना होगा कि क्या उस व्यक्ति को इस बारे में पूरी जानकारी थी, और क्या उसके खिलाफ रिपोर्ट न करने के लिए कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं।"

    इसके अलावा, जज ने कहा कि केवल इसलिए कि नाबालिग के माता-पिता पर पुलिस को रिपोर्ट न करने के लिए दबाव डालने का आरोप गंभीर है, धारा 21 के दायरे को बढ़ाया नहीं जा सकता।

    जज ने कहा,

    "यह आरोप कि माता-पिता को पुलिस के पास जाने से रोका गया या उन पर दबाव डाला गया, एक गंभीर मामला है। अगर ऐसा बर्ताव साबित हो जाता है और यह किसी अन्य दंड प्रावधान की शर्तों को पूरा करता है तो कानून में इसके लिए उचित उपाय मौजूद हैं। हालांकि, किसी आरोप की गंभीरता के आधार पर किसी ऐसे प्रावधान के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जिसकी जरूरी शर्तें पूरी तरह से स्पष्ट न हों। अदालत केवल इसलिए धारा 21 का दायरा नहीं बढ़ा सकती, क्योंकि किसी आरोपी का बर्ताव आपत्तिजनक माना गया। POCSO Act का मुख्य उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा करना है, जिसे इसके प्रावधानों को सही ढंग से लागू करके ही हासिल किया जा सकता है, न कि कानूनी जरूरतों से आगे बढ़कर किसी पर आपराधिक जिम्मेदारी थोपकर।"

    हालांकि, जज ने यह स्पष्ट किया कि धारा 19 के तहत ऐसे अपराधों की तुरंत पुलिस को सूचना देने का कर्तव्य सभी पर लागू होता है। लेकिन, एक्ट की धारा 21 के तहत सूचना न देने के लिए किसी पर मुकदमा चलाने के लिए, उस व्यक्ति की भूमिका ठीक से साबित होनी चाहिए और उस प्रावधान की सभी शर्तें पूरी होनी चाहिए।

    जज ने कहा,

    "यह ध्यान रखना जरूरी है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की सूचना देने की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि पीड़ित को समय पर सुरक्षा मिले और अपराधी को कानून के सामने लाया जाए। धाराओं 19 और 21 की व्याख्या करते समय अदालतों को कानून बनाने के पीछे के उद्देश्य को ध्यान में रखना चाहिए। साथ ही, धारा 21 के तहत मिलने वाली सजा के लिए यह जरूरी है कि कानून की शर्तों की बारीकी से जांच की जाए। जिन लोगों के खिलाफ जरूरी शर्तें पूरी नहीं होतीं, उन पर अंधाधुंध मुकदमा चलाने से बच्चों की सुरक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं होता। यह उद्देश्य तब पूरा होता है जब तुरंत सूचना दी जाए, प्रभावी जांच हो, पीड़ितों को सुरक्षा मिले और उन लोगों पर मुकदमा चले जिनका बर्ताव कानून के दायरे में आता है।"

    जज ने समझाया कि इस निष्कर्ष का मतलब यह नहीं है कि सोशल वर्कर, गांव के बुजुर्ग, चुने हुए प्रतिनिधि या उनके रिश्तेदार अनिवार्य रूप से सूचना देने के नियम से छूट पा सकते हैं। इसका यह भी मतलब नहीं है कि अगर किसी व्यक्ति को पीड़ित के माता-पिता से किसी यौन अपराध के बारे में विश्वसनीय जानकारी मिलती है तो वह धारा 19 के दायरे से बाहर हो जाता है। यह कानूनी जिम्मेदारी हर उस वयस्क पर लागू होती है जिसे ऐसी जानकारी मिलती है। जज ने कहा कि इस मामले में यह निष्कर्ष इसलिए निकला है क्योंकि आरोपी के खिलाफ लगाए गए अपराध के लिए उसकी व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं हैं।

    जज ने आगे कहा,

    "यहां अपनाई गई व्याख्या, कानून के उद्देश्य और आपराधिक कानून में निहित सुरक्षा उपायों, दोनों को बनाए रखती है। धारा 19 के तहत रिपोर्ट करने की बाध्यता काफी व्यापक है और जैसे ही आवश्यक जानकारी मिलती है, इसका पालन किया जाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को यह विश्वसनीय जानकारी मिलती है कि किसी बच्चे के साथ यौन उत्पीड़न हुआ है तो वह व्यक्ति निजी जांच करके, समझौता कराने की कोशिश करके या मेडिकल पुष्टि का इंतजार करके अपनी इस जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। साथ ही धारा 21 के तहत मुकदमा चलाने का आधार ऐसा ठोस सबूत होना चाहिए जो संबंधित आरोपी के खिलाफ कानून में बताई गई शर्तों को पूरा करता हो। कानून यह नहीं कहता कि जो भी व्यक्ति माता-पिता के संपर्क में आता है या घटना के बाद की बातचीत में शामिल होता है, उस पर अपने आप मुकदमा चला दिया जाए।"

    यह विस्तृत फैसला जस्टिस वेनेगावकर ने तब सुनाया, जब वे एक व्यक्ति की 'डिस्चार्ज' (आरोप मुक्त होने) की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। उस व्यक्ति पर धारा 21 के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोप यह था कि उसने अन्य ग्रामीणों के साथ मिलकर, एक नाबालिग बच्ची के माता-पिता को पुलिस में शिकायत दर्ज कराने से रोका था। बच्ची के साथ उसके स्कूल के शिक्षक ने यौन उत्पीड़न किया।

    आरोप यह था कि याचिकाकर्ता - जो गांव के सरपंच का पति है और एक समाज सेवी भी है - ने अन्य ग्रामीणों के साथ मिलकर माता-पिता पर दबाव डाला था कि वे इस अपराध की रिपोर्ट न करें, क्योंकि आरोपी शिक्षक ने अपना गुनाह मान लिया था और इसके लिए माफी भी मांग ली थी।

    जज ने कहा कि विशेष अदालत ने धारा 21 की गलत व्याख्या की, इसलिए याचिकाकर्ता को मामले से मुक्त करने से इनकार करके गलती की। जज ने उसे मामले से मुक्त किया, लेकिन विशेष अदालत को यह छूट दी कि यदि मुकदमे के दौरान उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत सामने आता है तो कानून के उचित प्रावधानों का उपयोग करते हुए उसे फिर से आरोपी बनाया जा सकता है।

    इन टिप्पणियों के साथ पीठ ने याचिका का निपटारा किया।

    Case Title : Rajendra Suryabhan Darade vs State of Maharashtra

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