हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
27 Sept 2026 8:00 AM IST

देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (21 सिंतबर, 2026 से 25 सितंबर, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
पत्नी के पहले पति से हुए बच्चे को अपनाने के बाद पति उसके भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी से इनकार नहीं कर सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के पहले पति से हुए बच्चे को 'जान-बूझकर' अपने परिवार का हिस्सा मानने के बाद, बाद में उसके भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी से "मुकर" नहीं सकता।
जस्टिस आलोक महरा ने कहा, "मौजूदा हालात की पूरी जानकारी के साथ वैवाहिक रिश्ते को होशपूर्वक स्वीकार करने के बाद" वह व्यक्ति अब बच्चे के "भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।"
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जालसाजी के आरोप पर गिफ्ट डीड रद्द नहीं कर सकता सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल, सिविल कोर्ट में जाना होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सीनियर सिटीजन का आरोप हो कि उसकी संपत्ति का गिफ्ट डीड जाली है और उसने ऐसा दस्तावेज बनाया ही नहीं, तो सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत गठित न्यायाधिकरण उसे जाली घोषित कर रद्द नहीं कर सकता। ऐसे मामले में सीनियर सिटीजन को सक्षम सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि माता-पिता और सीनियर सिटीजन का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 23(1) तभी लागू होती है, जब संपत्ति का वैध हस्तांतरण इस शर्त पर किया गया हो कि हस्तांतरण पाने वाला सीनियर सिटीजन की मूलभूत जरूरतों और शारीरिक आवश्यकताओं की देखभाल करेगा और बाद में उस शर्त का उल्लंघन हो।
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अनुच्छेद 227 पत्नी के दाम्पत्य अधिकारों की बहाली का मामला रद्द करने की याचिका सुनवाई योग्य नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। [2026 लाइव लॉ (एमपी) 387]
जस्टिस अमित सेठ की पीठ ने कहा: "इस न्यायालय की सुविचारित राय है कि याचिकाकर्ता द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर वर्तमान विविध याचिका, जिसमें फैमिली कोर्ट, ग्वालियर के समक्ष हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 9 के तहत प्रतिवादी द्वारा शुरू की गई कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई, सुनवाई योग्य नहीं है। इस प्रकार, जो मुद्दा तैयार किया गया, उसका उत्तर याचिकाकर्ता के खिलाफ दिया गया।"
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बिना सूचना के कार्रवाई न करने पर पुलिस अधिकारी को लापरवाही का दोषी नहीं ठहरा सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी पुलिस अधिकारी को केवल इसलिए लापरवाह नहीं ठहराया जा सकता कि उसने कार्रवाई नहीं की, जबकि उसके पास कार्रवाई की जरूरत बताने वाली कोई सूचना या खुफिया जानकारी ही उपलब्ध नहीं थी।
जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने कहा, “पुलिस सूचना के आधार पर कार्रवाई करती है। कार्रवाई के लिए सूचना का अभाव होने पर कार्रवाई न करना लापरवाही नहीं कहा जा सकता।”
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'टिप्पणियां जाति और जातिगत श्रेष्ठता का स्पष्ट संदर्भ': दिल्ली हाईकोर्ट ने अजीत भारती को जमानत देने से इनकार किया
दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को यूट्यूबर अजीत भारती की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि भारती ने नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ जातिसूचक गालियां, जातिसूचक शब्द और अपमानजनक टिप्पणियां कीं, जिनका उद्देश्य उन्हें शर्मिंदा और अपमानित करना था।
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि FIR में प्रथम दृष्टया ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जो SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध का संकेत देते हैं। कोर्ट ने कहा कि आजाद के संदर्भ में बार-बार जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल महज सामान्य या आकस्मिक टिप्पणी नहीं थी।
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समझौते से मुकदमा खत्म होने पर पूरी कोर्ट फीस लौटाना कानूनी अधिकार, अलग अर्जी जरूरी नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किसी मुकदमे, प्रति-दावे या अपील का आपसी समझौते के आधार पर निपटारा होने पर पक्षकारों को पूरी कोर्ट फीस वापस पाने का कानूनी अधिकार है। इसके लिए अलग से अर्जी या याचिका दाखिल करने की जरूरत नहीं है।
जस्टिस अनिल खेतरपाल और जस्टिस भरत पाराशर की खंडपीठ ने कहा कि कोर्ट फीस अधिनियम, 1870 की संशोधित धारा 16 के तहत समझौते के आधार पर मामला खत्म होने पर पूरी कोर्ट फीस वापस करना एक वैधानिक अधिकार है।
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कालकाजी मंदिर में महिला उत्तराधिकारियों को पुरुष प्रतिनिधियों के जरिए पूजा सेवा का अधिकार: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कालकाजी मंदिर में पूजा सेवा के अधिकार को लेकर अहम आदेश देते हुए चार महिला उत्तराधिकारियों को अपने परिवार के पुरुष सदस्यों को प्रतिनिधि नियुक्त कर पूजा सेवा करने की अनुमति दी। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह ने निर्देश दिया कि मंदिर में मिलने वाले चढ़ावे और दान में उनका हिस्सा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा कराया जाए।
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फैमिली पेंशन और टर्मिनल बेनिफिट्स अनुकंपा नियुक्ति का विकल्प या रोक नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी की मौत के बाद परिवार को मिलने वाली फैमिली पेंशन, टर्मिनल बेनिफिट्स या उन पर मिलने वाले काल्पनिक ब्याज को परिवार की आय मानकर अनुकंपा नियुक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की राशि को परिवार की आय में शामिल करना अनुकंपा नियुक्ति देने के उद्देश्य को ही विफल कर देगा, जिसका मकसद मृत कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता देना है।
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PMLA में गिरफ्तारी बड़ी कार्रवाई, धारा 50 की पूछताछ छोड़कर उसी सामग्री पर ED नहीं कर सकती गिरफ्तारी: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि PMLA के तहत गिरफ्तारी एक गंभीर और कठोर कार्रवाई है। यदि प्रवर्तन निदेशालय ने किसी व्यक्ति से पूछताछ, उसका बयान दर्ज करने या दस्तावेजों के आधार पर उसका सामना कराने के लिए धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 50 के तहत अदालत से अनुमति ली है, तो वह प्रक्रिया पूरी किए बिना उसी सामग्री के आधार पर धारा 19 के तहत व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर सकता।
जस्टिस मिलिंद जाधव ने यह टिप्पणी PMLA के तहत आरोपी कारोबारी राजेंद्र लोढ़ा को जमानत देते हुए की। अदालत ने कहा कि यदि प्रवर्तन निदेशालय (ED) धारा 50 के तहत अपनी वैधानिक शक्ति का इस्तेमाल करता है और उसे पूरा किए बिना उसी सामग्री के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार करता है, तो ऐसी गिरफ्तारी कानूनन गलत मानी जा सकती है।
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सब्सिडी पर PG मेडिकल पढ़ाई के बाद सरकारी सेवा बांड से नहीं बच सकते डॉक्टर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने काउंसलिंग का मौका देने का दिया निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी संस्थान में रियायती दर पर पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा हासिल करने वाले डॉक्टर केवल इस आधार पर अनिवार्य सरकारी सेवा बांड से मुक्त नहीं हो सकते कि पढ़ाई पूरी होने के बाद सरकार ने उन्हें सेवा के लिए नियुक्ति देने में कुछ प्रशासनिक देरी की। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अनिवार्य सरकारी सेवा के लिए निर्धारित काउंसलिंग में डॉक्टर को शामिल होने का अवसर देना जरूरी है।
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18 साल से अधिक उम्र के उम्मीदवारों को कानूनी अभिभावक प्रमाणपत्र जरूरी नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया कहा है कि 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके NEET-UG उम्मीदवारों से एनआरआई कोटे के तहत प्रवेश के लिए Guardians and Wards Act, 1890 के तहत कानूनी अभिभावक प्रमाणपत्र मांगना लागू नहीं होता।
जस्टिस जस्मीत सिंह ने कहा कि Guardians and Wards Act मुख्य रूप से नाबालिगों और उनकी देखभाल करने वाले अभिभावकों से संबंधित है। इसलिए इसके प्रावधान 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के व्यक्तियों पर लागू होते नहीं दिखते।
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पार्टी की सदस्यता छोड़ने पर विधायक की अयोग्यता सिर्फ विधानसभा सदस्यता तक, लोकसभा चुनाव लड़ने पर रोक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई विधायक स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है और इसके कारण संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य हो जाता है, तो यह अयोग्यता केवल उस सदन की सदस्यता तक सीमित रहती है, जिसका वह उस समय सदस्य था। ऐसी अयोग्यता उसे संसद का चुनाव लड़ने से नहीं रोकती। जस्टिस राज बीर सिंह ने यह टिप्पणी 78-भदोही लोकसभा सीट से निर्वाचित डॉ. विनोद कुमार बिंद के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए की।
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शादीशुदा बेटे की मां भी फैमिली मेंबर सर्टिफिकेट के लिए आवेदन कर सकती है: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी की मां, उसके विवाहित होने और पत्नी या बच्चों के मौजूद होने के बावजूद फैमिली मेंबर सर्टिफिकेट के लिए स्वतंत्र रूप से आवेदन कर सकती है।
जस्टिस बी. एस. भानुमति की एकल पीठ ने तहसीलदार द्वारा मां के आवेदन को खारिज करने वाला आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने तहसीलदार को G.O.Ms.No.145, Revenue (SER.II) Department में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया।
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डेजर्टेशन के आधार पर तलाक मिलने से पत्नी का भरण-पोषण का अधिकार खत्म नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि यदि किसी महिला को पति से डेजर्टेशन यानी परित्याग के आधार पर तलाक मिला हो, तब भी वह सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पूर्व पति से भरण-पोषण मांग सकती है। इसके लिए शर्त है कि उसने दोबारा शादी न की हो और वह स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम न हो।
जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने सुल्तानपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। फैमिली कोर्ट ने महिला के भरण-पोषण का दावा खारिज किया था।
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अतिरिक्त जमीन की बिक्री एक बार शून्य घोषित हो गई तो रद्दीकरण कानून से दोबारा वैध नहीं हो सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि शहरी भूमि सीमा एवं विनियमन अधिनियम, 1976 के तहत अतिरिक्त घोषित जमीन की ऐसी बिक्री, जिसे कानून के तहत शून्य माना गया हो, शहरी भूमि सीमा एवं विनियमन निरसन अधिनियम, 1999 के लागू होने से दोबारा वैध नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा कि 1976 के कानून के तहत जिस समय जमीन का हस्तांतरण हुआ, उस समय यदि वह कानूनन शून्य था तो 1999 का निरसन कानून उस बिक्री को दोबारा जीवित नहीं कर सकता।
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स्क्रूटनी कमिटी के जाति प्रमाण पत्र अमान्य किए जाने के बाद अपील खारिज होने के 30 दिनों तक उससे मिलने वाले लाभ वापस नहीं लिए जा सकते: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाण पत्र के आधार पर दिए गए लाभ तब तक वापस नहीं लिए जा सकते, जब तक कि स्क्रूटनी कमिटी द्वारा उसे अमान्य किए जाने के खिलाफ की गई अपील खारिज होने के 30 दिन पूरे न हो जाएं। कोर्ट ने 'महाराष्ट्र अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, विमुक्त जनजाति, खानाबदोश जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और विशेष पिछड़ा वर्ग (जाति प्रमाण पत्र जारी करने और सत्यापन का विनियमन) अधिनियम, 2000' की धारा 10(5) का हवाला देते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को दिए गए लाभ तब तक वापस नहीं लिए जा सकते, जब तक कि उसके जनजाति प्रमाण पत्र को अमान्य किए जाने के खिलाफ उसकी अपील लंबित है।
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अंतरधार्मिक समलैंगिक जोड़े को शांतिपूर्ण लिव-इन में साथ रहने का मौलिक अधिकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरधार्मिक समलैंगिक जोड़े को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शांतिपूर्ण तरीके से लिव-इन संबंध में साथ रहने का मौलिक अधिकार है। परिवार के सदस्य, रिश्तेदार या समाज का कोई अन्य व्यक्ति उनके साथ रहने के फैसले में कानूनी तौर पर हस्तक्षेप नहीं कर सकता, न ही उन्हें धमका या परेशान कर सकता है।
जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी ने यह आदेश समलैंगिक जोड़े की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि साथ रहने के फैसले को लेकर उन्हें निजी पक्षों और परिवार के सदस्यों की ओर से धमकियों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने अपनी सुरक्षा की मांग की थी।
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आर्य समाज मंदिर का विवाह प्रमाणपत्र अकेले हिंदू विवाह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आर्य समाज मंदिर की ओर से जारी विवाह प्रमाणपत्र पेश कर यह साबित नहीं किया जा सकता कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैध विवाह संपन्न हुआ था। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैध हिंदू विवाह के लिए कानून में निर्धारित आवश्यक हिंदू रीति-रिवाज और रस्में पूरी होना जरूरी है।
जस्टिस राजीव सिंह ने यह टिप्पणी सशस्त्र सीमा बल के अधिकारी रोहित पांडेय की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। अधिकारी को वैवाहिक स्थिति के संबंध में गलत घोषणा करने के आरोप में सेवा से हटा दिया गया। हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी का आदेश रद्द करते हुए उन्हें तत्काल ड्यूटी पर वापस लेने का निर्देश दिया।
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बिना शपथपत्र Class-I अधिकारी के खिलाफ शिकायत पर Vigilance Inquiry नहीं हो सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि राज्य के Class-I/Group-A अधिकारी के खिलाफ ऐसी शिकायत, जो अनिवार्य शपथपत्र (Affidavit) के साथ दाखिल नहीं की गई हो, उसके आधार पर Vigilance Inquiry शुरू नहीं की जा सकती, खासकर तब जब मामले को State Vigilance Committee के समक्ष मंजूरी के लिए नहीं रखा गया हो।
जस्टिस राजीव सिंह की पीठ ने एक IAS अधिकारी के खिलाफ शुरू की गई Vigilance Inquiry को रद्द करते हुए कहा कि संबंधित सरकारी आदेशों का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को फर्जी और झूठी शिकायतों के आधार पर प्रताड़ित होने से बचाना है।
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स्क्रूटनी कमिटी के जाति प्रमाण पत्र अमान्य किए जाने के बाद अपील खारिज होने के 30 दिनों तक उससे मिलने वाले लाभ वापस नहीं लिए जा सकते: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाण पत्र के आधार पर दिए गए लाभ तब तक वापस नहीं लिए जा सकते, जब तक कि स्क्रूटनी कमिटी द्वारा उसे अमान्य किए जाने के खिलाफ की गई अपील खारिज होने के 30 दिन पूरे न हो जाएं। कोर्ट ने 'महाराष्ट्र अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, विमुक्त जनजाति, खानाबदोश जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और विशेष पिछड़ा वर्ग (जाति प्रमाण पत्र जारी करने और सत्यापन का विनियमन) अधिनियम, 2000' की धारा 10(5) का हवाला देते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को दिए गए लाभ तब तक वापस नहीं लिए जा सकते, जब तक कि उसके जनजाति प्रमाण पत्र को अमान्य किए जाने के खिलाफ उसकी अपील लंबित है।
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अनिवार्य आरक्षण शर्तों को नज़रअंदाज़ करके की गई शिक्षक की नियुक्ति को 'मान ली गई मंज़ूरी' के आधार पर वैध नहीं ठहराया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूल (जूनियर हाई स्कूल) (शिक्षकों की भर्ती और सेवा की शर्तें) नियम, 1978' के नियम 10(5)(iii) के तहत 'मान ली गई मंज़ूरी' (Deemed Approval) के प्रावधान का इस्तेमाल उस शिक्षक की नियुक्ति को वैध बनाने के लिए नहीं किया जा सकता, जो पद से जुड़ी अनिवार्य आरक्षण शर्तों का पालन किए बिना की गई।
जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा, “'मान ली गई मंज़ूरी' के प्रावधान का इस्तेमाल ऐसी नियुक्ति को वैध बनाने के लिए नहीं किया जा सकता, जो शुरू में ही भर्ती और आरक्षण प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाली अनिवार्य शर्तों को नज़रअंदाज़ करके की गई हो। 'मान ली गई मंज़ूरी' के कानूनी प्रावधान (Statutory Fiction) को उस नियुक्ति को वैध बनाने का ज़रिया नहीं बनने दिया जा सकता, जो उस कानूनी ढांचे के ही खिलाफ की गई हो जिसके तहत नियुक्ति की शक्ति का इस्तेमाल किया जाना था।”

