'टिप्पणियां जाति और जातिगत श्रेष्ठता का स्पष्ट संदर्भ': दिल्ली हाईकोर्ट ने अजीत भारती को जमानत देने से इनकार किया
Praveen Mishra
24 Sept 2026 7:39 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को यूट्यूबर अजीत भारती की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि भारती ने नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ जातिसूचक गालियां, जातिसूचक शब्द और अपमानजनक टिप्पणियां कीं, जिनका उद्देश्य उन्हें शर्मिंदा और अपमानित करना था।
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि FIR में प्रथम दृष्टया ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जो SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध का संकेत देते हैं। कोर्ट ने कहा कि आजाद के संदर्भ में बार-बार जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल महज सामान्य या आकस्मिक टिप्पणी नहीं थी।
कोर्ट ने कहा कि टिप्पणियों में जाति और समाज में मौजूद जातिगत श्रेष्ठता की धारणाओं का स्पष्ट संदर्भ था, विशेष रूप से विवाह के संदर्भ में। कोर्ट ने यह भी कहा कि 'सवर्ण' शब्द का इस्तेमाल कथित तौर पर तथाकथित ऊंची जाति के लोगों के लिए किया गया, जिससे जातिगत पदानुक्रम और श्रेष्ठता का संकेत मिलता है।
सोशल मीडिया पर वीडियो से जुड़ा मामला
मामला 22 अगस्त को भारती के सत्यापित सोशल मीडिया अकाउंट और YouTube पर अपलोड किए गए एक कार्यक्रम से जुड़ा है। FIR के अनुसार, “SB79: Reservation Hatao Andolan Nautanki & More/Saptahik Bakaiti” नामक कार्यक्रम में चंद्रशेखर आजाद और डॉ. बीआर अंबेडकर सहित अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों के खिलाफ कथित जातिसूचक और अपमानजनक टिप्पणियां की गई थीं। FIR दर्ज होने तक वीडियो को लगभग 23,100 बार देखा जा चुका था।
हाईकोर्ट ने वीडियो के संबंधित हिस्सों को चैंबर में ट्रांसक्रिप्ट के साथ देखा। कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और इंटरनेट पर अपलोड की गई सामग्री को कोई भी व्यक्ति देख, सुन और आगे साझा कर सकता है। इसलिए कथित अपराध के लिए पीड़ित की मौके पर भौतिक मौजूदगी आवश्यक नहीं है।
'ऑनलाइन उकसावे' की दलील भी खारिज
भारती की ओर से दलील दी गई कि टिप्पणियां उन्हें ऑनलाइन किए गए किसी कथित उकसावे के बाद की गई थीं। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि कथित उकसावा चंद्रशेखर आजाद की ओर से नहीं था और भारती की ओर से बाद में कोई स्पष्टीकरण, सफाई, बयान वापस लेने या माफी मांगने की बात भी सामने नहीं आई।
SC/ST Act के तहत अग्रिम जमानत पर रोक
कोर्ट ने SC/ST Act की धारा 18 और 18A(2) का भी उल्लेख किया, जो अधिनियम के तहत मामलों में अग्रिम जमानत पर वैधानिक रोक लगाती हैं। हालांकि, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Shajan Skaria v. State of Kerala फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि FIR को प्रथम दृष्टया पढ़ने पर SC/ST Act के तहत अपराध के आवश्यक तत्व ही नहीं बनते, तो यह रोक लागू नहीं होगी।
लेकिन मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध बनना माना और इसी आधार पर भारती की अग्रिम जमानत याचिका को सुनवाई योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दिया।
मामले में FIR SC/ST Act, BNS की धारा 196(1)(c) और 351(3) तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत दर्ज की गई है।

