PMLA में गिरफ्तारी बड़ी कार्रवाई, धारा 50 की पूछताछ छोड़कर उसी सामग्री पर ED नहीं कर सकती गिरफ्तारी: बॉम्बे हाईकोर्ट

  • PMLA में गिरफ्तारी बड़ी कार्रवाई, धारा 50 की पूछताछ छोड़कर उसी सामग्री पर ED नहीं कर सकती गिरफ्तारी: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि PMLA के तहत गिरफ्तारी एक गंभीर और कठोर कार्रवाई है। यदि प्रवर्तन निदेशालय ने किसी व्यक्ति से पूछताछ, उसका बयान दर्ज करने या दस्तावेजों के आधार पर उसका सामना कराने के लिए धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 50 के तहत अदालत से अनुमति ली है, तो वह प्रक्रिया पूरी किए बिना उसी सामग्री के आधार पर धारा 19 के तहत व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर सकता।

    जस्टिस मिलिंद जाधव ने यह टिप्पणी PMLA के तहत आरोपी कारोबारी राजेंद्र लोढ़ा को जमानत देते हुए की। अदालत ने कहा कि यदि प्रवर्तन निदेशालय (ED) धारा 50 के तहत अपनी वैधानिक शक्ति का इस्तेमाल करता है और उसे पूरा किए बिना उसी सामग्री के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार करता है, तो ऐसी गिरफ्तारी कानूनन गलत मानी जा सकती है।

    मामले में राजेंद्र लोढ़ा को सितंबर 2025 में मुंबई पुलिस द्वारा दर्ज मूल अपराध के बाद गिरफ्तार किया गया। इसके बाद ED ने उनके खिलाफ अलग से प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट दर्ज की। 12 नवंबर 2025 को उनके घर की जांच की गई और दिसंबर 2025 में मामले में आरोपपत्र दाखिल किया गया। मामले में अन्य आरोपी भी शामिल थे।

    29 जनवरी 2026 को ED ने PMLA की धारा 50 के तहत आवेदन दाखिल कर लोढ़ा को कुछ दस्तावेज दिखाकर उनसे पूछताछ और उनका बयान दर्ज करने की अनुमति मांगी। विशेष अदालत ने 30 जनवरी 2026 को इस आवेदन को मंजूर किया।

    हालांकि, ED ने 5 फरवरी 2026 तक लोढ़ा का बयान दर्ज करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। इसी दिन उन्हें अपनी बीमार मां से मिलने के लिए अंतरिम जमानत मिली।

    लोढ़ा ने 11 फरवरी 2026 को अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण किया। अगले दिन 12 फरवरी को उन्हें विशेष अदालत के सामने पेश किया गया। इसी दिन प्रवर्तन निदेशालय ने PMLA की धारा 19 के तहत उन्हें गिरफ्तार करने की अनुमति के लिए आवेदन दाखिल किया, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया। इसके अगले दिन एजेंसी ने लोढ़ा को गिरफ्तार कर लिया।

    हाईकोर्ट ने पाया कि 29 जनवरी से 13 फरवरी 2026 के बीच ऐसा कोई नया, आपत्तिजनक या अतिरिक्त तथ्य सामने नहीं आया, जिसके आधार पर लोढ़ा की गिरफ्तारी की गई हो। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी का आधार वही सामग्री थी जो पहले से प्रवर्तन निदेशालय के पास मौजूद थी और जिसके आधार पर एजेंसी ने धारा 50 के तहत लोढ़ा से पूछताछ करने की अनुमति मांगी।

    ED की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने दलील दी कि धारा 19 के तहत अधिकृत अधिकारी के पास यदि किसी भी स्तर पर यह मानने का कारण हो कि कोई व्यक्ति अपराध का दोषी है तो वह निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसे गिरफ्तार कर सकता है। उनके अनुसार गिरफ्तारी के समय कोई अन्य प्रक्रिया लंबित होने से धारा 19 के तहत गिरफ्तारी की शक्ति खत्म नहीं होती।

    हाईकोर्ट ने इस दलील से असहमति जताई।

    जस्टिस मिलिंद जाधव ने कहा कि गिरफ्तारी की शक्ति बेहद गंभीर कार्रवाई है और धारा 19 में भी "गिरफ्तार कर सकता है" शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जो इस शक्ति की विवेकाधीन प्रकृति को दर्शाता है।

    अदालत ने कहा कि धारा 50 के तहत जांच, समन और आरोपी से दस्तावेजों के आधार पर पूछताछ करने की शक्ति भी कानून द्वारा दी गई महत्वपूर्ण शक्ति है। जब ED इस शक्ति का इस्तेमाल करता है और अदालत से आरोपी से पूछताछ की अनुमति मांगता है तो बाद में उसी प्रक्रिया को छोड़कर उसी सामग्री के आधार पर गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।

    अदालत ने कहा,

    "गिरफ्तारी की शक्ति प्रतीक्षा कर सकती है और धारा 19(1) के तहत इसका इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब उपलब्ध सामग्री अधिकृत अधिकारी को लिखित कारण दर्ज कर यह राय बनाने में सक्षम बनाए कि गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति अपराध का दोषी है।"

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि धारा 50 के तहत आरोपी को आपत्तिजनक सामग्री से सामना कराने और उसका बयान दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की गई है, तो उस प्रक्रिया को बीच में छोड़कर उसी सामग्री के आधार पर धारा 19 के तहत गिरफ्तारी नहीं की जा सकती, जब तक कि कोई नई प्रथम दृष्टया आपत्तिजनक सामग्री या ऐसी नई परिस्थिति सामने न आए जो पहले उपलब्ध नहीं थी।

    अदालत ने कहा कि यदि ऐसा कोई नया और मजबूत आधार सामने नहीं आता है तो पहले से मौजूद सामग्री के आधार पर गिरफ्तारी करना ED की शक्तियों का गलत इस्तेमाल माना जा सकता है।

    जस्टिस जाधव ने कहा कि मामले में ED ने स्वयं अदालत से अनुमति मांगते हुए कहा कि लोढ़ा से उसके पास मौजूद सामग्री के आधार पर पूछताछ और उनका बयान दर्ज करना जरूरी है। ऐसे में बयान दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी किए बिना उसी सामग्री के आधार पर गिरफ्तारी करना उचित नहीं था।

    हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों के साथ राजेंद्र लोढ़ा को पांच लाख रुपये के जमानती मुचलके पर जमानत दी।

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