डेजर्टेशन के आधार पर तलाक मिलने से पत्नी का भरण-पोषण का अधिकार खत्म नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • डेजर्टेशन के आधार पर तलाक मिलने से पत्नी का भरण-पोषण का अधिकार खत्म नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि यदि किसी महिला को पति से डेजर्टेशन यानी परित्याग के आधार पर तलाक मिला हो, तब भी वह सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पूर्व पति से भरण-पोषण मांग सकती है। इसके लिए शर्त है कि उसने दोबारा शादी न की हो और वह स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम न हो।

    जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने सुल्तानपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। फैमिली कोर्ट ने महिला के भरण-पोषण का दावा खारिज किया था।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रोहताश सिंह बनाम श्रीमती रामेंद्रि (2000) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि तलाकशुदा महिला सीमित उद्देश्य के लिए CrPC की धारा 125 के तहत 'पत्नी' का दर्जा बनाए रखती है और निर्धारित शर्तों के तहत भरण-पोषण की मांग कर सकती है।

    मामले में महिला सुनीता ने वर्ष 2009 में CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए अर्जी दाखिल की थी। उसका कहना था कि हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार उसकी शादी हुई और गौना होने के बाद उसे ससुराल भेज दिया गया।

    महिला ने आरोप लगाया कि उसके पति के भारतीय सेना में शामिल होने के बाद पति और उसके परिवार के सदस्यों ने उसे प्रताड़ित किया। उस पर अतिरिक्त दहेज के रूप में एक लाख रुपये नकद, हीरो होंडा मोटरसाइकिल और रंगीन टेलीविजन की मांग का भी आरोप लगाया गया।

    उसने यह भी आरोप लगाया कि बाद में उसके पति ने दूसरी शादी करने की बात कही और उसे तथा उनके बच्चे का भरण-पोषण करने से इनकार किया।

    पति ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि पत्नी ने खुद उसे छोड़ दिया और उसके साथ रहने के लिए तैयार नहीं थी। उसने यह भी बताया कि उसने दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए कार्यवाही शुरू की थी।

    बाद में भरण-पोषण से संबंधित कार्यवाही सुल्तानपुर फैमिली कोर्ट में स्थानांतरित की गई। फैमिली कोर्ट ने महिला का दावा खारिज करते हुए कहा कि वह पति से अलग रहने के लिए पर्याप्त और उचित कारण साबित करने में विफल रही है।

    फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए महिला हाईकोर्ट पहुंची। सुनवाई के दौरान सामने आया कि पति ने 25 सितंबर 2014 को डेजर्टेशन के आधार पर एकतरफा तलाक की डिक्री हासिल की थी।

    हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि इसके बाद पति ने दूसरी शादी की थी और दूसरी महिला का नाम उसके सेवा संबंधी रिकॉर्ड में पत्नी के रूप में दर्ज था।

    ऐसे में हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या महिला के खिलाफ डेजर्टेशन के आधार पर पारित तलाक की डिक्री उसे तलाकशुदा पत्नी के रूप में CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांगने से रोकती है।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रोहताश सिंह मामले के फैसले का उल्लेख किया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी यही सवाल देखा कि यदि पत्नी के डेजर्टेशन के आधार पर तलाक हुआ हो, तो क्या वह CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांग सकती है।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तलाक के बाद वैवाहिक संबंध समाप्त हो जाता है लेकिन CrPC की धारा 125 और धारा 125(1) के स्पष्टीकरण (बी) के तहत तलाकशुदा महिला भरण-पोषण के सीमित उद्देश्य के लिए 'पत्नी' बनी रहती है।

    यदि तलाकशुदा महिला अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है और उसने दोबारा शादी नहीं की तो वह भरण-पोषण पाने की हकदार है। केवल यह तथ्य कि तलाक डेजर्टेशन के आधार पर दिया गया था, अपने आप में भरण-पोषण के दावे पर रोक नहीं लगाता।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कानून इस पहलू पर स्पष्ट है कि तलाकशुदा महिला को दोबारा शादी करने तक या खुद की कमाई से अपना भरण-पोषण करने में सक्षम होने तक भरण-पोषण मिल सकता है, बशर्ते कानून में कोई अन्य रोक न हो।

    हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा महिला के भरण-पोषण के दावे को पूरी तरह खारिज करना कायम नहीं रखा जा सकता। फैमिली कोर्ट का आदेश कानूनी और तथ्यात्मक त्रुटियों से प्रभावित था।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि महिला तलाक से पहले की अवधि के लिए भरण-पोषण की हकदार नहीं पाई जाती है, तब भी वह तलाक की तारीख यानी 25 सितंबर 2014 से भरण-पोषण की मांग कर सकती है, बशर्ते उसने दोबारा शादी न की हो।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला का नाबालिग बेटा बालिग होने तक भरण-पोषण पाने का हकदार है। हालांकि, सेना के अधिकारियों के माध्यम से पहले से प्राप्त भरण-पोषण की राशि को ध्यान में रखा जाएगा।

    मामले को नए सिरे से विचार के लिए फैमिली कोर्ट भेजते हुए हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को अपनी संपत्ति, आय और देनदारियों का खुलासा करने वाले हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के राजनेश बनाम नेहा मामले में दिए गए निर्देशों का पालन करने को कहा गया।

    मामले पर नए सिरे से फैसला होने तक हाईकोर्ट ने पति को महिला को हर महीने 4,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया।

    इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार की।

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story