अनिवार्य आरक्षण शर्तों को नज़रअंदाज़ करके की गई शिक्षक की नियुक्ति को 'मान ली गई मंज़ूरी' के आधार पर वैध नहीं ठहराया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
20 Sept 2026 5:43 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूल (जूनियर हाई स्कूल) (शिक्षकों की भर्ती और सेवा की शर्तें) नियम, 1978' के नियम 10(5)(iii) के तहत 'मान ली गई मंज़ूरी' (Deemed Approval) के प्रावधान का इस्तेमाल उस शिक्षक की नियुक्ति को वैध बनाने के लिए नहीं किया जा सकता, जो पद से जुड़ी अनिवार्य आरक्षण शर्तों का पालन किए बिना की गई।
जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा,
“'मान ली गई मंज़ूरी' के प्रावधान का इस्तेमाल ऐसी नियुक्ति को वैध बनाने के लिए नहीं किया जा सकता, जो शुरू में ही भर्ती और आरक्षण प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाली अनिवार्य शर्तों को नज़रअंदाज़ करके की गई हो। 'मान ली गई मंज़ूरी' के कानूनी प्रावधान (Statutory Fiction) को उस नियुक्ति को वैध बनाने का ज़रिया नहीं बनने दिया जा सकता, जो उस कानूनी ढांचे के ही खिलाफ की गई हो जिसके तहत नियुक्ति की शक्ति का इस्तेमाल किया जाना था।”
जनवरी 1988 में गोरखपुर के कन्हैया जूनियर हाई स्कूल में सी.टी. ग्रेड शिक्षक का एक पद मंज़ूर किया गया, जिसमें यह शर्त थी कि अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण का पालन किया जाएगा। चयन समिति ने सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार (याचिकाकर्ता) को चुना - इस समिति में ज़िला बेसिक शिक्षा अधिकारी का नॉमिनी भी शामिल था - जबकि इंटरव्यू के लिए अनुसूचित जाति के दो उम्मीदवार भी आए। उन्होंने 18.05.1988 को नौकरी शुरू की, लेकिन उन्हें वेतन नहीं मिला। फरवरी 1989 में इस पद के लिए दोबारा विज्ञापन निकाला गया, जिसमें इसे अनुसूचित जाति के उम्मीदवार के लिए आरक्षित रखा गया।
याचिकाकर्ता ने दोबारा विज्ञापन निकालने और बाद में संशोधन के ज़रिए 31.12.1988 के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उनकी नियुक्ति को नामंज़ूर कर दिया गया। यह तर्क दिया गया कि चूंकि तीस दिनों के भीतर कोई फ़ैसला नहीं बताया गया, इसलिए 'मान ली गई मंज़ूरी' के कानूनी प्रावधान के तहत उनकी नियुक्ति मंज़ूर हो गई, और नामंज़ूरी का आदेश उन्हें सुने बिना ही पारित कर दिया गया।
राज्य के वकील ने तर्क दिया कि प्रबंधन ने आरक्षण संबंधी निर्देशों को नज़रअंदाज़ किया। यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता हाई कोर्ट द्वारा पारित अंतरिम आदेश के कारण ही रिटायरमेंट की उम्र तक नौकरी में बने रहे।
कोर्ट ने पाया कि प्रबंधन ने आरक्षण की ज़रूरत के अनुसार नया चयन करने के बजाय शर्तों को बदलने और पहले किए गए चयन को मंज़ूर कराने की कोशिश की। कोर्ट ने कहा कि चयन समिति में विभाग के नॉमिनी की भागीदारी से चयन में हुई गैर-कानूनी बात ठीक नहीं हो जाती। प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की दलील को खारिज करते हुए, कोर्ट ने कहा कि ज़िला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने अनियमितताओं के बारे में खास सवाल उठाए थे और मैनेजमेंट ने उनका जवाब दिया था। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता सुनवाई का अलग मौका नहीं मांग सकता।
कोर्ट ने कहा,
“किसी भी स्थिति में सुनवाई का मौका मांगकर ऐसी नियुक्ति को बनाए नहीं रखा जा सकता जिसमें कोई बुनियादी कानूनी कमी हो।”
यह मानते हुए कि दोबारा विज्ञापन निकालने से कोई बनावटी खाली जगह नहीं बनी, कोर्ट ने अंतरिम आदेश के तहत याचिकाकर्ता की नौकरी जारी रहने के मामले पर गौर किया और कहा,
“अंतरिम आदेश का स्वरूप ही ऐसा होता है कि वह मामले के बीच का आदेश होता है; यह अपने आप में ऐसी नियुक्ति पर कोई फैसला नहीं देता या उसे कानूनी मान्यता नहीं देता, जो बाद में कानूनी नियमों के खिलाफ पाई जाती है।”
कोर्ट ने माना कि ऐसी निरंतरता के आधार पर रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभों पर याचिकाकर्ता का कोई पक्का अधिकार नहीं बनता। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि उस अवधि के वेतन के दावे की अलग से जांच की जानी चाहिए, जब याचिकाकर्ता ने वास्तव में अंतरिम आदेश के तहत काम किया; यह जांच उस आदेश की शर्तों और लागू प्रावधानों के आधार पर की जाएगी।
31.12.1988 का आदेश सही ठहराते हुए कोर्ट ने रिट याचिका खारिज की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अंतरिम आदेश के तहत याचिकाकर्ता द्वारा की गई सेवा के आधार पर वेतन (यदि कोई हो) के दावे पर विचार किया जा सकता है।
Case Title: Anil Kumar Chaudhary v. The Zila Basic Shiksha Adhikari Gorakhpur And Others

