जालसाजी के आरोप पर गिफ्ट डीड रद्द नहीं कर सकता सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल, सिविल कोर्ट में जाना होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
26 Sept 2026 3:50 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सीनियर सिटीजन का आरोप हो कि उसकी संपत्ति का गिफ्ट डीड जाली है और उसने ऐसा दस्तावेज बनाया ही नहीं, तो सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत गठित न्यायाधिकरण उसे जाली घोषित कर रद्द नहीं कर सकता। ऐसे मामले में सीनियर सिटीजन को सक्षम सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि माता-पिता और सीनियर सिटीजन का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 23(1) तभी लागू होती है, जब संपत्ति का वैध हस्तांतरण इस शर्त पर किया गया हो कि हस्तांतरण पाने वाला सीनियर सिटीजन की मूलभूत जरूरतों और शारीरिक आवश्यकताओं की देखभाल करेगा और बाद में उस शर्त का उल्लंघन हो।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि सीनियर सिटीजन का कहना है कि गिफ्ट डीड वास्तव में बनाया ही नहीं गया और धोखाधड़ी, दबाव, अनुचित प्रभाव या जालसाजी से तैयार किया गया है तो उस दस्तावेज रद्द कराने का अधिकार सामान्य दीवानी क्षेत्राधिकार वाले सिविल कोर्ट को है।
अदालत ने कहा,
“यदि सीनियर सिटीजन का मामला यह है कि हस्तांतरण पाने वाले ने धोखाधड़ी, दबाव, अनुचित प्रभाव या जालसाजी के जरिए उपहार या अन्य हस्तांतरण कराया है, तो सीनियर सिटीजन के कहने पर उस दस्तावेज को शून्य घोषित करने का अधिकार न्यायाधिकरण को नहीं है।”
खंडपीठ ने कहा कि ऐसे सीनियर सिटीजन की ओर से दस्तावेज रद्द कराने और उसके आधार पर अपने स्वामित्व तथा कब्जे से जुड़े अन्य अधिकार स्थापित करने की याचिका सक्षम सिविल कोर्ट में ही दायर की जा सकती है।
मामले में 68 वर्षीय याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसकी बेटी और दामाद ने ललितपुर स्थित उसके मकान के संबंध में 18 नवंबर 2023 का रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड उसकी बेटी के पक्ष में जाली तरीके से तैयार कराया। याचिकाकर्ता के अनुसार वह मकान उसका एकमात्र आश्रय है और गिफ्ट डीड पर उसके हस्ताक्षर भी नहीं हैं। उसने आरोप लगाया कि इसी दस्तावेज के आधार पर उसके साथ मारपीट की गई और उसे मकान से बेदखल कर दिया गया।
उसने यह भी कहा कि गिफ्ट डीड में बेटी की ओर से उसकी देखभाल करने की कोई शर्त नहीं थी। अधिनियम की धारा 22 और 23 के तहत दिए गए उसके अभ्यावेदनों पर कार्रवाई नहीं हुई और ललितपुर के जिलाधिकारी ने 23 जून 2026 को उसे मकान से बेदखल करने की मांग खारिज की। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल को भरण-पोषण, मूलभूत जरूरतों और सीनियर सिटीजन के जीवन तथा संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बेदखली का अधिकार प्राप्त है, लेकिन वह सामान्य दीवानी क्षेत्राधिकार वाला न्यायालय नहीं है और स्वामित्व जैसे विवादों का अंतिम फैसला नहीं कर सकता।
अदालत ने अपने पहले के श्यामजी शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले के फैसले का भी उल्लेख किया और कहा कि सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल के पास सिविल कोर्ट जैसी व्यापक शक्तियां नहीं हैं।
खंडपीठ ने उदाहरण देते हुए पूछा कि यदि गरिमा यादव याचिकाकर्ता की बेटी नहीं होतीं और देवेंद्र सिंह यादव उसका दामाद नहीं होता, तो क्या जालसाजी के आधार पर गिफ्ट डीड रद्द कराने की ऐसी याचिका सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल में चल सकती थी? अदालत ने इसका जवाब नकारात्मक दिया।
हाईकोर्ट ने समझाया कि धारा 23(1) एक विशेष वैधानिक अधिकार देती है। यदि संपत्ति पाने वाला व्यक्ति सीनियर सिटीजन की देखभाल करने की शर्त पूरी नहीं करता है तो कानून की दृष्टि से उस हस्तांतरण को धोखाधड़ी, दबाव या अनुचित प्रभाव से कराया गया माना जा सकता है और सीनियर सिटीजन के विकल्प पर उसे शून्य घोषित किया जा सकता है। लेकिन यह प्रावधान किसी दस्तावेज की वैधता को हर आधार पर चुनौती देने के लिए ट्रिब्यूनल को व्यापक अधिकार नहीं देता।
अदालत ने जालसाजी के आरोप की जांच के लिए समितियां गठित करने पर जिलाधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी आपत्ति जताई। पीठ ने राज्य के सभी जिलाधिकारियों और उपखंड मजिस्ट्रेटों को आगाह किया कि अधिनियम के तहत न्यायिक या अर्ध-न्यायिक कार्य करते समय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का ही पालन किया जाना चाहिए।
खंडपीठ ने कहा कि जब किसी न्यायाधिकरण को पक्षकारों के अधिकारों और हितों पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार दिया गया हो तो मामलों को समितियों को सौंपकर प्रशासनिक तरीके से जांच कराना न्यायिक प्रक्रिया की व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।
हाईकोर्ट ने माना कि गिफ्ट डीड को चुनौती देने का विवाद सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत कार्यवाही के दायरे से पूरी तरह बाहर है। इसके साथ ही याचिका खारिज करते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता को अपने अधिकारों के लिए सक्षम सिविल कोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी।

