सब्सिडी पर PG मेडिकल पढ़ाई के बाद सरकारी सेवा बांड से नहीं बच सकते डॉक्टर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने काउंसलिंग का मौका देने का दिया निर्देश

  • सब्सिडी पर PG मेडिकल पढ़ाई के बाद सरकारी सेवा बांड से नहीं बच सकते डॉक्टर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने काउंसलिंग का मौका देने का दिया निर्देश

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी संस्थान में रियायती दर पर पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा हासिल करने वाले डॉक्टर केवल इस आधार पर अनिवार्य सरकारी सेवा बांड से मुक्त नहीं हो सकते कि पढ़ाई पूरी होने के बाद सरकार ने उन्हें सेवा के लिए नियुक्ति देने में कुछ प्रशासनिक देरी की।

    हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अनिवार्य सरकारी सेवा के लिए निर्धारित काउंसलिंग में डॉक्टर को शामिल होने का अवसर देना जरूरी है।

    जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ से एमडी ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन की पढ़ाई पूरी करने वाली डॉक्टर की याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे आंशिक रूप से मंजूर किया।

    याचिकाकर्ता ने वर्ष 2018 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद उसने SGPGI लखनऊ में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया। 2 जून 2022 को उसने अनिवार्य सरकारी सेवा बांड पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स पूरा करने के बाद उसे दो वर्ष तक सरकारी मेडिकल सर्विस करनी थी।

    बांड के अनुसार पाठ्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा होने के तीन महीने के भीतर सरकार को उसे सरकारी सेवा उपलब्ध करानी थी। यदि डॉक्टर अनिवार्य सेवा पूरी नहीं करती, तो उस पर 40 लाख रुपये की राशि देने की जिम्मेदारी थी और उसके प्रमाणपत्रों पर सरकार का पहला अधिकार निर्धारित है।

    याचिकाकर्ता ने वर्ष 2025 में एमडी की पढ़ाई पूरी करने के बाद SGPGI में एक वर्षीय PDCC पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया। इसके लिए संबंधित अधिकारियों ने उसे अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी किया।

    PDCC कोर्स 1 मई 2026 को पूरा हुआ। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अनिवार्य बांड सेवा के लिए काउंसलिंग में शामिल होने की मांग की। हालांकि, उसे 2 मई से 29 जुलाई 2026 तक SGPGI में अल्प अवधि के लिए वरिष्ठ रेजिडेंट के रूप में तैनाती दी गई।

    इसके बाद राज्य सरकार ने 12 अगस्त 2026 को कार्यालय आदेश जारी कर उसे कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी संस्थान में तैनात किया।

    याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए कहा कि MD की पढ़ाई पूरी होने के तीन महीने के भीतर सरकार उसे सेवा उपलब्ध कराने में विफल रही। इसलिए उसके अनुसार बांड के तहत अनिवार्य सेवा की बाध्यता समाप्त हो गई थी। उसने यह भी कहा कि संबंधित शासनादेशों के तहत जरूरी काउंसलिंग में उसे शामिल होने का अवसर नहीं दिया गया।

    राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने अनापत्ति प्रमाणपत्र की शर्तों को स्वीकार किया। इन शर्तों के अनुसार PDCC कोर्स में बिताई गई अवधि को अनिवार्य सरकारी सेवा की अवधि में शामिल नहीं किया जाना था।

    राज्य ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत प्रशासनिक देरी मात्र से सरकारी सेवा बांड अपने आप समाप्त हो जाए।

    हाईकोर्ट ने बांड की बाध्यता समाप्त होने संबंधी याचिकाकर्ता के तर्क को स्वीकार नहीं किया।

    अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अनापत्ति प्रमाणपत्र की शर्तों को स्वीकार करते हुए PDCC कोर्स करने का विकल्प चुना था। इसलिए बाद में वह उन्हीं शर्तों के विपरीत दावा नहीं कर सकती।

    अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को अनापत्ति प्रमाणपत्र की शर्तों का लाभ लेने के बाद उसी शर्त को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    अदालत ने इस संदर्भ में कहा कि वह एक ही समय में दो विपरीत रुख नहीं अपना सकती।

    हाईकोर्ट ने सरकारी मेडिकल शिक्षा पर होने वाले खर्च और सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सेवाओं के व्यापक जनहित को भी ध्यान में रखा। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें रियायती मेडिकल शिक्षा के बदले अनिवार्य सरकारी सेवा बांड को वैध माना गया।

    खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकारें मेडिकल शिक्षा के लिए आधारभूत ढांचे में निवेश करती हैं और सरकारी अस्पतालों के माध्यम से दी जाने वाली मेडिकल सेवाएं संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़े सार्वजनिक हित का हिस्सा हैं।

    अदालत ने कहा कि अनिवार्य सरकारी सेवा बांड का उद्देश्य वंचित वर्गों के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी है। इसलिए सेवा उपलब्ध कराने में हुई बहुत कम अवधि की प्रशासनिक देरी को आधार बनाकर बांड की बाध्यता समाप्त नहीं की जा सकती।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने काउंसलिंग के मुद्दे पर याचिकाकर्ता की दलील को स्वीकार किया।

    अदालत ने पाया कि अधिकारियों द्वारा जिस 1 जून 2026 की काउंसलिंग अधिसूचना पर भरोसा किया गया, वह नीट-पीजी 2022 के MD-MS और NEET-PF 2023 डिप्लोमा अभ्यर्थियों से संबंधित थी। याचिकाकर्ता NEET-PG 2021 के MD-MS बैच की थी।

    इस कारण उसे अनिवार्य सरकारी सेवा के लिए निर्धारित काउंसलिंग में शामिल होने का अवसर ही नहीं मिला और उसके बैच के लिए काउंसलिंग का पोर्टल भी उपलब्ध नहीं कराया गया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि अनापत्ति प्रमाणपत्र में बाद के बैच के बाद समायोजित किए जाने की शर्त होने के बावजूद याचिकाकर्ता को संबंधित शासनादेशों के तहत निर्धारित अनिवार्य काउंसलिंग में भाग लेने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने यह भी पाया कि 12 अगस्त 2026 के कार्यालय आदेश से यह साबित नहीं होता कि याचिकाकर्ता को काउंसलिंग में शामिल होने का अवसर दिया गया।

    इसके बाद हाईकोर्ट ने मेडिकल शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशक को नए सिरे से काउंसलिंग कराने का निर्देश दिया। इसके लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से मान्यता प्राप्त सरकारी मेडिकल कॉलेजों और मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में उपलब्ध रिक्त सीटों की जानकारी लेकर याचिकाकर्ता को उपलब्ध सीटों के आधार पर संस्थान चुनने का अवसर देने को कहा गया।

    अदालत ने SGPGI में 2 मई से 29 जुलाई 2026 तक याचिकाकर्ता द्वारा की गई 89 दिन की वरिष्ठ रेजिडेंसी सेवा को भी उसके दो वर्ष के अनिवार्य सरकारी सेवा बांड में समायोजित करने का निर्देश दिया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि इस अवधि में याचिकाकर्ता ने वास्तव में सरकारी अस्पताल में सेवा दी थी और PDCC पूरा होने के बाद दी गई वरिष्ठ रेजिडेंसी की तैनाती अंतरिम व्यवस्था के तौर पर की गई।

    अदालत ने याचिका को इन निर्देशों के साथ आंशिक रूप से मंजूर कर दिया। याचिकाकर्ता को 27 सितंबर 2026 तक विस्तृत प्रत्यावेदन देने का निर्देश दिया गया। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशक को चार सप्ताह के भीतर नए सिरे से काउंसलिंग कराने को कहा गया।

    काउंसलिंग और नई तैनाती होने तक याचिकाकर्ता SGPGI में वरिष्ठ रेजिडेंट के रूप में काम जारी रख सकती है।

    हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि काउंसलिंग पूरी होने के बाद SGPGI में बने रहने से उसे वहां पद पर बने रहने का कोई स्थायी अधिकार प्राप्त नहीं होगा।

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