अनुच्छेद 227 पत्नी के दाम्पत्य अधिकारों की बहाली का मामला रद्द करने की याचिका सुनवाई योग्य नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
25 Sept 2026 10:19 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। [2026 लाइव लॉ (एमपी) 387]
जस्टिस अमित सेठ की पीठ ने कहा:
"इस न्यायालय की सुविचारित राय है कि याचिकाकर्ता द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर वर्तमान विविध याचिका, जिसमें फैमिली कोर्ट, ग्वालियर के समक्ष हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 9 के तहत प्रतिवादी द्वारा शुरू की गई कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई, सुनवाई योग्य नहीं है। इस प्रकार, जो मुद्दा तैयार किया गया, उसका उत्तर याचिकाकर्ता के खिलाफ दिया गया।"
एक पति द्वारा विविध याचिका दायर की गई, जिसमें दावा किया गया कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए पत्नी द्वारा HMA की धारा 9 के तहत कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है। पति के वकील ने आगे तर्क दिया कि जब पति ने पहले HMA की धारा 9 के तहत एक आवेदन दायर किया तो पत्नी ने उसके साथ रहने से स्पष्ट रूप से इनकार किया।
पत्नी के वकील ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत पति की याचिका की सुनवाई योग्यता के संबंध में दलील दी। वकील ने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अधीक्षण की शक्ति इस न्यायालय में निहित है। हालांकि, इसका उपयोग वैधानिक उपचारों या अधीनस्थ न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि प्राथमिक मुद्दा यह है कि क्या HMA की धारा 9 के तहत दायर कार्यवाही रद्द करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 227 को लागू किया जा सकता है।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 10 के तहत वैवाहिक कार्यवाही के लिए फैमिली कोर्ट एक सिविल कोर्ट है। इसलिए फैमिली कोर्ट के आदेश और डिक्री तथ्यों और कानून दोनों पर अपील योग्य हैं, इसलिए HMA की धारा 9 के तहत कार्यवाही सिविल कार्यवाही है।
जैकी बनाम टिनी अलियास एंटनी [2014] के मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने दोहराया कि हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत सिविल/निजी विवाद में दावा रद्द करने का अधिकार है।
वर्तमान मामले में अदालत ने कहा कि यह आरोप कि पत्नी ने उसे परेशान करने के लिए HMA की धारा 9 के तहत मुकदमा दायर किया, प्रमुख सबूतों से स्थापित किया जाना चाहिए। इस प्रकार, इस याचिका में हाईकोर्ट द्वारा इसकी योग्यता या सुधार की जांच नहीं की जा सकती।
इस प्रकार अदालत ने दो आधारों पर पति की दलीलों को खारिज कर दिया: पहला, तत्काल याचिका संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर की गई, और दूसरा, सिविल कोर्ट के न्यायिक आदेश रिट क्षेत्राधिकार के अधीन नहीं हैं।
इस प्रकार, पीठ ने निर्देश दिया:
"सक्षम क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय (इस न्यायालय की समन्वय पीठ) द्वारा पार्टियों, यानी याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच दिए गए उपरोक्त तर्क और निष्कर्ष को अंतिम रूप देने की अनुमति दी गई। इसलिए यह पार्टियों के बीच परस्पर बाध्यकारी है। उपरोक्त चर्चाओं और विचारों के मद्देनजर, वर्तमान विविध याचिका को रखरखाव के आधार पर खारिज कर दिया जाता है। कानून में स्वीकार्य उपाय के रूप में उपाय खोजने की स्वतंत्रता याचिकाकर्ता के पक्ष में सुरक्षित है।"
Case Title: D v G, MP-2816-2024

