पत्नी के पहले पति से हुए बच्चे को अपनाने के बाद पति उसके भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी से इनकार नहीं कर सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
Shahadat
26 Sept 2026 7:43 PM IST

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के पहले पति से हुए बच्चे को 'जान-बूझकर' अपने परिवार का हिस्सा मानने के बाद, बाद में उसके भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी से "मुकर" नहीं सकता।
जस्टिस आलोक महरा ने कहा,
"मौजूदा हालात की पूरी जानकारी के साथ वैवाहिक रिश्ते को होशपूर्वक स्वीकार करने के बाद" वह व्यक्ति अब बच्चे के "भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।"
इस फैसले के आधार पर कोर्ट ने हरिद्वार फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ क्रिमिनल रिविज़न याचिका को मंज़ूरी दी। फैमिली कोर्ट ने पत्नी और बेटी को क्रमशः ₹8,000 और ₹6,000 भरण-पोषण के तौर पर देने का आदेश दिया था, लेकिन बेटे को भरण-पोषण देने से इनकार किया था, क्योंकि वह व्यक्ति उसका बायोलॉजिकल पिता नहीं है। व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को देखते हुए कोर्ट ने पत्नी और बेटी के लिए भरण-पोषण की राशि बढ़ाई और बेटे के बालिग होने तक उसे ₹10,000 का भरण-पोषण देने का निर्देश दिया।
रिविज़न याचिकाकर्ता पत्नी और प्रतिवादी की शादी 2013 में हुई थी। हाई कोर्ट ने पाया कि शादी के समय प्रतिवादी को पूरी जानकारी थी कि पत्नी का पहले पति से एक बेटा है। रिकॉर्ड से यह भी पता चला कि शादी इस समझ के साथ हुई थी कि बेटा जोड़े के साथ रहेगा।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि प्रतिवादी ने पत्नी से शादी करने के बाद बेटे के होने की पूरी जानकारी होते हुए भी स्वेच्छा से उसकी ज़िम्मेदारी ली। इसलिए यह तर्क दिया गया कि वह बाद में सिर्फ़ यह कहकर उस ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता कि बच्चा उसका बायोलॉजिकल बेटा नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने प्रतिवादी की नवंबर 2025 की सैलरी स्लिप का भी हवाला दिया, जिसमें ग्रॉस सैलरी ₹2,01,843 और कटौती के बाद नेट सैलरी ₹1,06,654 दिखाई गई। यह तर्क दिया गया कि उसकी आय तय करने के लिए जिन कटौतियों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए, उन्हें हटाने के बाद उसकी असल मासिक आय ₹1.50 लाख से ज़्यादा है। इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए गुजारा-भत्ते (मेंटेनेंस) को बढ़ाया जाना चाहिए।
इस अपील का विरोध करते हुए, प्रतिवादी के वकील ने कहा कि पत्नी खुद नौकरी करती थी और हर महीने लगभग ₹55,000 से ₹58,000 कमाती थी। यह भी कहा गया कि वह प्रतिवादी के फ्लैट में रह रही थी और अपनी मर्ज़ी से उसके साथ रहना छोड़ दिया था। बेटी के बारे में यह तर्क दिया गया कि नाबालिग बच्चे के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी माता-पिता दोनों की होती है।
प्रतिवादी ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि पत्नी को अपने पहले पति से अपने 'स्त्रीधन' और बेटे के पालन-पोषण के लिए ₹5 लाख का सेटलमेंट मिला था।
हाईकोर्ट ने माना कि शादी के समय बेटे के होने के बारे में प्रतिवादी को पता होना एक अहम बात है।
आगे कहा गया,
“रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि शादी इस जानकारी और समझ के साथ हुई कि रिवीजनिस्ट नंबर 2 (बेटा) रिवीजनिस्ट नंबर 1 के साथ रहेगा। ऐसे हालात में जब प्रतिवादी नंबर 2 ने रिवीजनिस्ट नंबर 2 के होने की पूरी जानकारी के साथ रिवीजनिस्ट नंबर 1 से शादी करने का फैसला किया और बच्चे को वैवाहिक परिवार का हिस्सा माना तो वह बाद में उस ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता, जो उसने स्वेच्छा से बच्चे के प्रति ली थी, खासकर तब जब बच्चा परिवार के सदस्य के तौर पर उनके साथ रह रहा था।
बाद में यह दलील देना कि रिवीजनिस्ट नंबर 2 उसका अपना (बायोलॉजिकल) बेटा नहीं है, अपने आप में उसके पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ने का कोई ठोस कारण नहीं हो सकता। इसलिए फैमिली कोर्ट के जज ने सिर्फ़ इस आधार पर रिवीजनिस्ट नंबर 2 को गुजारा-भत्ता देने से इनकार करके गलती की कि प्रतिवादी नंबर 2 उसका बायोलॉजिकल पिता नहीं है।”
कोर्ट ने पत्नी और उसके पूर्व पति के बीच ₹5 लाख के समझौते के आधार पर दी गई दलील भी खारिज की।
कोर्ट ने कहा,
"रिविजनिस्ट नंबर 1 और उसके पूर्व पति के बीच हुआ कोई भी समझौता, अकेले ही रेस्पॉन्डेंट नंबर 2 को उस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकता, जो उसने रिविजनिस्ट नंबर 1 से शादी करते समय स्वेच्छा से ली थी, जबकि उसे पूरी जानकारी थी कि महिला का पिछली शादी से एक बेटा है। बाद के वैवाहिक रिश्ते से पैदा होने वाले अधिकारों और दायित्वों को केवल रिविजनिस्ट नंबर 1 और उसके पूर्व पति के बीच हुए किसी समझौते के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।"
दीपा जोशी बनाम गौरव जोशी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी के भरण-पोषण की पति की जिम्मेदारी प्राथमिक और निरंतर जिम्मेदारी है। साथ ही ऐसी कटौतियां जो संपत्ति बनाती हैं या बढ़ाती हैं, उन्हें पति की कर-योग्य आय को काफी कम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, यदि वे पत्नी के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी से ऊपर रखी जाती हैं।
कोर्ट ने रजनीश बनाम नेहा मामले में दिए गए निर्देशों के तहत दोनों पक्षों द्वारा संपत्ति, आय और देनदारियों के बारे में दाखिल हलफनामों पर भी विचार किया। कोर्ट ने पाया कि रेस्पॉन्डेंट पर कोई ऐसी बड़ी स्वतंत्र देनदारी नहीं थी, जो भरण-पोषण देने की उसकी क्षमता पर असर डाले। उसकी बताई गई आय और रिकॉर्ड पर मौजूद जानकारी से पता चला कि फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी और बेटी को दिया गया भरण-पोषण कम है।
इस प्रकार, आपराधिक पुनरीक्षण (क्रिमिनल रिवीजन) को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में संशोधन किया।
पत्नी को दिया जाने वाला भरण-पोषण ₹8,000 से बढ़ाकर ₹10,000 प्रति माह कर दिया गया, जबकि नाबालिग बेटी के लिए इसे ₹6,000 से बढ़ाकर ₹30,000 प्रति माह कर दिया गया। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बेटे को भरण-पोषण की अर्जी दाखिल करने की तारीख से लेकर बालिग होने तक ₹10,000 प्रति माह मिलेंगे।
Case: Rapti v. State of Uttarakhand & Another

