जानिए हमारा कानून
सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मुकदमों और अंडरट्रायल कैदियों को जमानत देने के मुद्दे को कैसे सुलझाया?
Hussain बनाम Union of India के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मुकदमों (Delayed Trials) और अंडरट्रायल कैदियों (Undertrial Prisoners) को जमानत देने के मुद्दे पर अहम निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत न्याय में देरी (Delayed Justice) से व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) का उल्लंघन होता है।इस फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि बिना दोष सिद्ध हुए किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित...
जानिए आंसेस्टर प्रॉपर्टी से संबंधित कानून
कोई भी ऐसी प्रॉपर्टी जो पूर्वजों से मिलती है उसे ऐंसेस्टर प्रॉपर्टी कहा जाता है। यह ऐंसेस्टर प्रॉपर्टी पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही होती है और वारिसों को उत्तराधिकार में मिलती रहती है। स्वयं द्वारा अर्जित संपत्ति के अलावा पैतृक संपत्ति होती है। ऐसी संपत्ति उसके द्वारा अर्जित नहीं की जाती है या फिर उसे वसीयत नहीं की जाती है, बल्कि कानूनी रूप से उसे उत्तराधिकार में प्राप्त होती है। संपत्ति के मामले में कानून किसी भी व्यक्ति के रिश्तेदारों को संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाता है। अगर कोई व्यक्ति बगैर वसीयत...
यदि पुलिस फेयर इन्वेस्टिगेशन नहीं करे तब क्या करे फरियादी
अनेक दफा देखने में आता है कि फरियादी की शिकायत रहती है कि पुलिस द्वारा उसके प्रकरण में फेयर इन्वेस्टिगेशन नहीं किया गया है। इस स्थिति में शिकायतकर्ता व्यथित हो जाता है क्योंकि शिकायतकर्ता अपनी शिकायत लेकर पुलिस के पास जाता है। उसके साथ घटने वाले किसी अपराध की जानकारी उसके द्वारा पुलिस को दी जाती है। उसकी जानकारी के आधार पर पुलिस एफआईआर दर्ज करती हैं। ऐसी एफआईआर के बाद अन्वेषण होता है। हालांकि पुलिस के पास यह अधिकार सुरक्षित है कि यदि अन्वेषण में उसे जिन व्यक्तियों के नाम पर एफआईआर की गई थी उनके...
संविधान के अंतर्गत महिलाओं के विशेष अधिकार और ऐतिहासिक फैसले
Santhini बनाम Vijaya Venketesh मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केवल वैवाहिक विवादों (Matrimonial Disputes) पर नहीं, बल्कि महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव (Discrimination) के मुद्दे पर भी चर्चा की।इस फैसले ने न्यायपालिका के दृष्टिकोण को सामने रखा, जो यह सुनिश्चित करता है कि महिलाओं को न्याय तक समान पहुंच (Equal Access to Justice) मिले, खासकर व्यक्तिगत विवादों में। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि कानूनों की व्याख्या इस तरह से होनी चाहिए, जो महिलाओं की गरिमा (Dignity) और समानता (Equality) को बनाए रखे। ...
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 228 और 229 : समन और मामूली अपराधों में मजिस्ट्रेट की भूमिका
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 ने दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code) को प्रतिस्थापित किया है और यह 1 जुलाई, 2024 से प्रभावी हो चुकी है। यह कानून आपराधिक प्रक्रियाओं को अधिक सरल और आधुनिक बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया है। धारा 228 और 229 विशेष रूप से समन जारी करने और मामूली अपराधों से संबंधित प्रक्रिया का वर्णन करती हैं।इन धाराओं में यह बताया गया है कि किस स्थिति में आरोपी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की आवश्यकता है और किन मामलों में सरल प्रक्रियाएं उपलब्ध हैं। ये धाराएं...
क्या वैवाहिक विवादों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुलझाया जा सकता है?
Santhini बनाम Vijaya Venketesh मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि क्या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वैवाहिक विवादों (Matrimonial Disputes) का प्रभावी समाधान किया जा सकता है।इस फैसले में यह समझने की कोशिश की गई कि अगर अदालत किसी मामले को दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरित (Transfer) करने के बजाय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग करे, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया पर क्या असर पड़ेगा। कोर्ट ने इस बात पर भी चर्चा की कि ऐसे मामलों में भावनात्मक (Emotional) पहलू को कैसे ध्यान में रखा जा सकता है। कानून के...
अपराधी को बचाने और अपराध छिपाने से जुड़े अपराध: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 251 और 252
भारतीय न्याय संहिता, 2023, जो 1 जुलाई 2024 को लागू हुई है, ने भारतीय दंड संहिता की जगह ली है। इसमें विभिन्न प्रावधान हैं जो भ्रष्टाचार को रोकने और आपराधिक न्याय प्रणाली की पवित्रता बनाए रखने के उद्देश्य से बनाए गए हैं।इस नई संहिता के सेक्शन 251 और 252 उन मामलों से संबंधित हैं जहां लोग अपराध छिपाने, अपराधियों को कानूनी सज़ा से बचाने या चोरी की गई संपत्ति को वापस दिलाने के बदले लाभ प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इन प्रावधानों के तहत, अपराध की गंभीरता के आधार पर विशेष सज़ाएं निर्धारित की गई हैं। ...
कैसे दिव्यांगों के लिए सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच के अधिकार को मजबूत किया जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला राजीव रतूड़ी बनाम भारत संघ मामले में दिव्यांग व्यक्तियों के सार्वजनिक स्थानों, सड़कों, और परिवहन सुविधाओं तक पहुंच के मौलिक मुद्दों (Fundamental Issues) को संबोधित करता है।यह निर्णय भारतीय संविधान और वैधानिक कानूनों (Statutory Laws) के तहत दिव्यांग व्यक्तियों के सम्मान और पहुंच के अधिकार की रक्षा के महत्व को रेखांकित करता है। इसके साथ ही, यह विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार ढांचों (International Human Rights Frameworks) के अनुरूप है, जो दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समान...
किसी अपराध को छिपाने, अपराधी को बचाने, या कानूनी कार्रवाई से दूर रहने के लिए उपहार लेना : भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 250
भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने 1 जुलाई, 2024 को लागू होकर भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) को बदल दिया। इस नई संहिता के तहत कुछ प्रावधान (Provisions) जोड़े गए हैं ताकि भारत के आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) को आधुनिक बनाया जा सके।धारा 250 ऐसे मामलों से संबंधित है, जहां कोई व्यक्ति किसी अपराध को छिपाने, अपराधी को बचाने, या कानूनी कार्रवाई (Legal Action) से दूर रहने के लिए उपहार, पैसा या अन्य कोई लाभ (Benefit) स्वीकार करता है। इस धारा का उद्देश्य भ्रष्टाचार (Corruption) को...
भारत में सड़क सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का क्या दृष्टिकोण रहा है?
डॉ. एस. राजसीकरण बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (Dr. S. Rajaseekaran v. Union of India) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सड़क सुरक्षा के गंभीर मुद्दों पर ध्यान दिया। अदालत ने बताया कि सुरक्षा नियमों के उचित पालन की कमी और प्रभावी कानून के क्रियान्वयन (Implementation) की कमी के कारण हर साल हजारों लोगों की जान चली जाती है। इस फैसले में सरकार और अन्य संबंधित विभागों की जिम्मेदारियों को विस्तार से समझाया गया है, ताकि सड़क दुर्घटनाओं (Road Accidents) और उससे होने वाली हानियों को कम किया जा सके। प्रमुख कानूनी...
मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही का आरंभ : भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 227
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code) को प्रतिस्थापित कर दिया है और यह 1 जुलाई, 2024 से लागू हो चुकी है। इस नए कानून का उद्देश्य आपराधिक न्याय प्रणाली को आधुनिक बनाना है ताकि यह अधिक कुशल और तकनीक-हितैषी हो सके।संहिता की धारा 227 एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जो मजिस्ट्रेट के समक्ष अपराध के संज्ञान (Cognizance) लेने और आरोपी के खिलाफ सम्मन या वारंट जारी करने की प्रक्रिया को स्पष्ट करती है। पर्याप्त आधार होने पर कार्यवाही का आरंभ: जब मजिस्ट्रेट...
विवाहित रहते हुए दूसरा विवाह करने पर दूसरी पत्नी और बच्चों को क्या अधिकार हैं?
इंडिया में विवाहित पति या पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरी शादी करना अपराध है लेकिन यदि कोई पुरुष व्यक्ति दूसरी शादी कर ले तब दूसरी पत्नी और उससे हुए बच्चों के पास क्या सिविल अधिकार उपलब्ध हैं।अगर किसी व्यक्ति की पहली पत्नी मर चुकी है या उसकी पहली पत्नी से उसका तलाक हो गया है, तब कानून दूसरी शादी करने पर दूसरी पत्नी को पहली पत्नी ही मानता है, लेकिन पहली पत्नी जीवित है, पहली पत्नी से तलाक नहीं हुआ है, उसके बाद किसी व्यक्ति द्वारा दूसरा विवाह कर लिया जाता है, तब उसे दूसरी पत्नी कहा जाता है। ऐसा दूसरा...
BNSS की सेक्शन 170 क्या कहती है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) जिसे पहले CrPC कहा जाता था, की धारा 170 पुलिस को ऐसी शक्ति प्रदान करती है जो अपराध रोकने के लिए भी गिरफ्तारी कर सकती है और ऐसी गिरफ्तारी के बाद गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को जमानत लेनी होती है।सेक्शन 170BNSS की धारा 170 पुलिस को दी गई एक शक्ति माना गया है। जैसा कि पुलिस किसी भी व्यक्ति को किसी भी नॉन कॉग्निजेबल ऑफेंस में बगैर वारंट के गिरफ्तार नहीं कर सकती है। अगर कोई वारंट कोर्ट द्वारा जारी किया गया है तभी पुलिस उस व्यक्ति को गिरफ्तार करती है पर पुलिस को...
जानिए दहेज से संबंधित कानून
हमारे देश में दहेज की मांग करना संगीन अपराध है और ऐसे अपराध की सज़ा होने पर दहेज मांगने वाले व्यक्ति को जेल की सज़ा भी काटनी पड़ती है। दहेज केवल वही नहीं है जो शादी के समय लड़की को उसके माता पिता द्वारा दिया जाता है बल्कि दहेज उसे भी कहते हैं जो शादी के बाद भी निरंतर पत्नी के घर वालों से पति और उसके घर के सदस्यों द्वारा मांगा जाता है।पहले दहेज केवल स्त्रीधन होता है लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलती चली गई, दहेज के अर्थ भी बदल गए। दहेज एक विभत्स और क्रूर व्यवस्था बनकर रह गया, जो महिलाओं के लिए एक...
जानिए फैमिली कोर्ट एक्ट से संबंधित प्रावधान
अलग अलग तरह की अदालतों की तरह ही एक कोर्ट फैमिली कोर्ट है, जो फैमिली से संबंधित मामलों को सुनती है और जनता के बीच न्याय करती है। फैमिली कोर्ट टाऊन एरिया में नहीं होती है, यह नगर के क्षेत्रों में होती है। इस कोर्ट को बनाने का उद्देश्य फैमिली से संबंधित मामलों का शीघ्र न्याय करना होता है। घर परिवारों में होने वाले विवादों में प्रमुख रूप से पति और पत्नी के बीच होने वाले विवाद होते हैं। इन विवादों के मामले में फैमिली कोर्ट एक्ट आने के पहले सिविल न्यायालय को अधिकारिता होती थी लेकिन वर्ष 1984 में भारत...
सीनियर एडवोकेट का दर्जा कैसे दिया जाता है? – पूरी प्रक्रिया और योग्यता का विश्लेषण
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा जयसिंह बनाम भारत का सुप्रीम कोर्ट व अन्य मामले में सीनियर एडवोकेट (Senior Advocates) को नामित करने की प्रक्रिया में सुधार किया है। नया सिस्टम निष्पक्षता (Fairness), पारदर्शिता (Transparency), और वस्तुनिष्ठता (Objectivity) सुनिश्चित करता है।इस व्यवस्था का उद्देश्य पुराने मनमाने तरीकों को समाप्त कर सुव्यवस्थित तंत्र स्थापित करना है। इस लेख में सीनियर एडवोकेट का दर्जा पाने के लिए आवश्यक योग्यता और पूरी प्रक्रिया का सरल विश्लेषण दिया गया है।योग्यता और पात्रता...
अपराधी को छिपाने या बचाने पर क्या हो सकती है सजा? : भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 249
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023), जो भारतीय दंड संहिता की जगह लाई गई है, 1 जुलाई 2024 से प्रभाव में आई है। यह कानून भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली को आधुनिक बनाने के लिए लाया गया है। धारा 249 अपराधी को छिपाने या शरण देने से संबंधित है, जिसमें उस व्यक्ति को कानून से बचाने का इरादा हो।यह धारा उन स्थितियों को कवर करती है जब कोई व्यक्ति जानबूझकर अपराधी को पनाह देता है या उन्हें छिपाने में मदद करता है। इस धारा में अलग-अलग सजा निर्धारित की गई है जो इस बात पर निर्भर करती है कि...
सीनियर एडवोकेट की नियुक्ति कैसे होनी चाहिए? – एक न्यायिक दृष्टिकोण
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सीनियर एडवोकेट (Senior Advocates) की नियुक्ति के लिए एक नया तंत्र लागू किया है।यह परिवर्तन इंदिरा जयसिंह बनाम भारत का सुप्रीम कोर्ट एवं अन्य मामले के निर्णय के बाद आया। इस केस में कोर्ट ने पारदर्शिता (Transparency), जवाबदेही (Accountability) और निष्पक्ष मापदंड (Objective Criteria) की आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित किया। अब तक, वरिष्ठ अधिवक्ताओं की नियुक्ति एडवोकेट एक्ट, 1961 (Advocates Act) की धारा 16 के तहत की जाती थी, लेकिन इस प्रक्रिया को असंगत और संविधान के...
मजिस्ट्रेट द्वारा शिकायत खारिज करने की प्रक्रिया - भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 226
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bhartiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) ने 1 जुलाई 2024 से दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code - CrPC) को प्रतिस्थापित कर दिया है। इस नई संहिता के तहत न्यायिक प्रक्रिया में कई सुधार और प्रावधान लाए गए हैं। इसमें धारा 226 के माध्यम से यह व्यवस्था की गई है कि किस स्थिति में मजिस्ट्रेट किसी शिकायत को खारिज कर सकता है।यह प्रावधान, धारा 223 से 225 में वर्णित प्रक्रियाओं के बाद लागू होता है और यह तय करता है कि शिकायत को ट्रायल (Trial) के लिए आगे बढ़ाने से...
किसी सिविल मुकदमे की संभावना होने पर कोर्ट को पहले ही इन्फॉर्म करना
सिविल केस में किसी भी डिस्प्यूट में पहले से ही कोर्ट को सूचित करने की प्रक्रिया को केवियट कहा जाता है। केवियट के संबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता,1908 की धारा 148(ए) में प्रावधान मिलते हैं।केवियट का अर्थ किसी व्यक्ति को सावधान करना होता है। सिविल मामलों में अनेक परिस्थितियां ऐसी होती हैं जहां कोई वादी किसी मुकदमे को कोर्ट में लेकर आता है, उस मुकदमे से संबंधित प्रतिवादी को समन जारी किए जाते हैं, समन की तामील बता दी जाती है, यदि पक्षकार हाज़िर नही होता है तब कोर्ट ऐसे पक्षकार को एकपक्षीय कर अपना...




















