जानिए हमारा कानून
जानिए कब पुलिस रिपोर्ट पर विचार करते हुए मजिस्ट्रेट के लिए अपराध की सूचना देने वाले (Informant) को सुनना होता है अनिवार्य
पिछले लेख में हमने जाना कि नाराजी याचिका (Protest Petition) क्या होती है और कौन कर सकता है इसे दाखिल। हम ने यह समझा कि "प्रोटेस्ट पिटीशन" (नाराजी याचिका) के सम्बन्ध में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973, भारतीय दंड संहिता, 1860 या भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 या किसी अन्य अधिनियम में कोई प्रावधान नहीं दिया गया है। हालाँकि, नाराजी याचिका की अवधारणा पीड़ित पक्ष या मामले की पुलिस को इत्तिला देने वाले पक्ष के लिए एक अहम् अधिकार के रूप में साबित हुई है। हम यह कह सकते हैं कि जब पुलिस किसी आपराधिक मामले...
जानिए दंड न्यायालय के दंड देने की शक्तियां और पद
किसी समय राजा ही विधि का निर्माण करता था तथा राजा ही व्यक्तियों को अभियोजित करता था। राजा ही न्यायाधीश का काम करता था। लोकतांत्रिक व्यवस्था के आने के बाद न्याय के कार्य न्यायपालिका को प्राप्त हो गए तथा राज्य ने विधि के माध्यम से न्यायपालिका को दोषियों को दंड देने हेतु सशक्त किया। न्यायपालिका के भीतर अलग अलग दंड न्यायालय होते हैं तथा इन दंड न्यायालयों को शक्तियां दी गई हैं। यह लोगों के अपराध में विचारण कर सकते हैं तथा इन व्यक्तियों को उस विचारण के परिणामस्वरूप दंड भी दे सकते हैं। दंड...
सीपीसी : जानिए एकपक्षीय डिक्री और उसे अपास्त किए जाने के आधार
सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के अंतर्गत जब पक्षकारों को समन किया जाता है तो आदेश 9 के अंतर्गत पक्षकारों की उपस्थिति या अनुपस्थिति के परिणाम दिए गए है। इन परिणामों में से एक परिणाम एकपक्षीय आदेश (Ex Parte) या डिक्री होता है। एकपक्षीय आज्ञप्ति का अर्थ बुलाए गए पक्षकारों द्वारा अदालत में उपस्थित नहीं होने के कारण किसी एक पक्षकार को सुना जाना तथा जो पक्षकार अदालत में उपस्थित न होकर अपने लिखित अभिकथन नहीं करता है उस पक्षकार को वाद से एकपक्षीय कर दिया जाता है। जो पक्षकार न्यायालय में वाद लेकर आता है...
जानिए नाराजी याचिका (Protest Petition) क्या होती है और कौन कर सकता है इसे दाखिल?
हम अक्सर ही ऐसे मामले देखते हैं जहां एक व्यक्ति (victim/informant) एक मामले को लेकर एक FIR दर्ज करता है, पुलिस उस मामले में अन्वेषण करती है और उसके पश्च्यात पुलिस द्वारा मामले में क्लोजर रिपोर्ट अदालत में दाखिल कर दी जाती है। गौरतलब है कि यह रिपोर्ट तब दाखिल की जाती है जब पुलिस को अपने अन्वेषण में FIR में अभियुक्त के तौर पर नामजद व्यक्ति/व्यक्तियों के खिलाफ कोई मामला बनता नहीं दिखता है। इसके परिणामस्वरूप कई बार मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसे व्यक्ति/व्यक्तियों को डिस्चार्ज कर दिया जाता है (हालाँकि,...
सीपीसी : जानिए निर्णय, डिक्री और आदेश में क्या है अंतर
निर्णय, आदेश और डिक्री यह तीन शब्द आम धारणा में एक जैसे प्रतीत होते हैं, परंतु इन शब्दों में अत्यधिक भेद है। इन शब्दों में भेद का वर्णन हमें सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 में मिलता है। बहुत से लोग इन 3 शब्दों में ज्यादा कन्फ्यूज्ड होते हैं, क्योंकि प्रकृति से यह तीनों शब्द एक जैसे आभास होते हैं। न्यायालय कार्यवाही में निरंतर इन शब्दों का प्रयोग किया जाता है। विधि के इन शब्दों के संबंध में संपूर्ण जानकारी होनी चाहिए तथा इस बात का ज्ञान होना चाहिए यह तीनों शब्द अपने अपने अर्थों में क्या महत्व...
क्या हम अपने मूल अधिकारों का परित्याग कर सकते हैं, जानिए सुप्रीम कोर्ट का मत
भारत का संविधान अपने नागरिकों को (कुछ मामलों में गैर-नागरिकों को भी) कुछ मौलिक अधिकारों को लागू करने की गारंटी देता है। संविधान के अंतर्गत मौजूद मौलिक अधिकार, वैदिक काल से इस देश के लोगों द्वारा पोषित मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये अधिकार, मानवाधिकारों की बुनियादी संरचना के मद्देनजर कुछ मूलभूत गारंटियों का पैटर्न बुनते हैं।इसके अलावा यह अधिकार, राज्य पर सम्बंधित नकारात्मक दायित्वों को लागू करते हैं, ताकि इसके विभिन्न आयामों में व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण न किया जा सके।...
जानिए सिविल मामलों में विचारण (Trial) की प्रक्रिया
नए अधिवक्ता एवं छात्रों द्वारा सिविल विधि को कठिन समझा जाता है। सिविल विधि आपराधिक विधि के मुकाबले थोड़ी कठिन होती है। सिविल विधि को यदि उसके व्यवस्थित क्रम में पढ़ा जाए तो यह विधि कठिन नहीं होती। इस लेख के माध्यम से हम सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के प्रावधानों से विचारण (Trial) की प्रक्रिया को सरलतापूर्वक समझने का प्रयास करेंगे। सिविल प्रक्रिया संहिता विचारण की प्रक्रिया बताती है। सहिंता के अनुसार व्यवस्थित प्रक्रिया दी गई है तथा कोई भी मुकदमा किस प्रकार प्रारंभ से समाप्त होता है। वाद पत्र...
जानिए क्या होती है कोर्ट मैरिज और कैसे की जा सकती है
भारत में विवाह के लिए अलग-अलग धार्मिक समुदायों को अलग-अलग अधिकार और दायित्व दिए गए हैं। पर्सनल लॉ सभी धर्म के लोगों को अलग अलग उपलब्ध कराया गया है, जैसे हिंदुओं के लिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955 एवं हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम तथा मुसलमानों के लिए शरियत का कानून है। यह कानून मुसलमानों की पर्सनल विधि का काम करता है, जैसे विवाह, उत्तराधिकार, तलाक, भरण पोषण दत्तक ग्रहण इत्यादि विषयों पर यह विधि होती है। विवाह एक मानव अधिकार है कोई भी समुदाय या विधि विवाह करने से व्यक्ति को रोक नहीं सकती है। ...
जानिए साक्ष्य अधिनियम में स्वीकृति का क्या अर्थ है
भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत स्वीकृति (Admission) को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। जब कोई व्यक्ति किसी तथ्य को मान लेता है या अपराध को स्वीकार कर लेता है तो उसे आम भाषा में इसे स्वीकृति कहा जाता है। साक्ष्य अधिनियम में इसे विस्तार से समझाया गया है। अधिनियम की धारा 17 के अनुसार- स्वीकृति वह (मौखिक या दस्तावेजी या इलेक्ट्रॉनिक रूप में अंतर्विष्ट) कथन है,जो किसी विवाधक तथ्य या सुसंगत तथ्य के बारे में कोई अनुमान इंगित करता है और जो ऐसे व्यक्तियों में से किसी के द्वारा ऐसी परिस्थितियों...
जानिए आजीवन कारावास का अर्थ और दंड के प्रकार
किसी भी आपराधिक विधि में शास्ति के रूप में दंड का प्रावधान रखा गया है, जिससे व्यक्ति इस तरह का अपराध करने से भयभीत रहे तथा समाज में शांति रहे और अपराध मुक्त समाज का निर्माण हो सके। भारत के दंड विधान में भी दंड का उल्लेख किया गया है, भारतीय दंड संहिता की धारा 53 में दंड के प्रकार बताए गए हैं तथा इसी दंड के प्रकारों में आजीवन कारावास का भी उल्लेख किया गया है। इस लेख के माध्यम से भारत में प्रचलित दंड एवं विशेष रूप से आजीवन कारावास को समझने का प्रयास किया जा रहा है। किसी समय समाज में बहुत तरह...
जानिए साक्ष्य विधि में मरने से पहले दिए गए बयान का महत्व
भारतीय साक्ष्य अधिनियम में मृत्युकालिक कथन (Dying declaration) का अत्यधिक महत्व है। मृत्युकालिक कथन याने मरने से पहले दिया गया बयान। साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के अंतर्गत मृत्युकालिक कथन का वर्णन किया गया है तथा मृत्युकालिक कथन को साक्ष्य के अंदर अधिकारिता दी गई है। साक्ष्य अधिनियम में सुसंगत तथ्य क्या होंगे इस संबंध में एक पूरा अध्याय दिया गया है, इस अध्याय के अंदर ही धारा 32 का भी समावेश है। इस धारा के अंतर्गत यह बताने का प्रयास किया गया है कोई भी कथन मृत्युकालिक कथन है तो उसे सुसंगत माना...
किसी सिविल मामले में वकील कैसे बदला जा सकता है, जानिए सम्बंधित प्रकिया एवं प्रावधान
जब भी कोई व्यक्ति न्याय प्राप्त के इरादे से अदालत की तरफ देखता है तो उसे सबसे पहले एक वकील की आवश्यकता प्रतीत होती है। वो एक बेहतर वकील की तलाश में निकल पड़ता है जो उसके मामले को अदालत में उत्तम प्रकार से प्रस्तुत करे और हरसंभव प्रयास करे कि वह व्यक्ति न्याय प्राप्त करने में सफल हो। दूसरी ओर, एक वकील का धर्म अपने मुवक्किल को न्याय दिलाना ही होता है और ऐसा करते हुए उसे न्यायालय के अहम् एवं जिम्मेदार अधिकारी के रूप में कार्य करना होता है।एक मुवक्किल जब अपने वकील को स्वयं के मामले का अदालत में...
जानिए संविधान के रक्षक भारत के सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां
भारत के सुप्रीम कोर्ट (उच्चतम न्यायालय) को संविधान का रक्षक कहा जाता है तथा समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविधान की रक्षा की गई है। संवैधानिक व्यवस्था के माध्यम से ही उच्चतम न्यायालय को इतना महत्व और इतनी शक्तियां दी गई हैं। भारत का उच्चतम न्यायालय न्यायपालिका का सर्वोच्च स्थान है। इसे संघ की न्यायपालिका भी कहा जाता है। संविधान के अनुच्छेद 124 के अंतर्गत भारत के उच्चतम न्यायालय के स्थापना का उपबंध किया गया है। उच्चतम न्यायालय को संविधान के उपबंधों की व्याख्या के संबंध में अपना अंतिम...
साक्ष्य अधिनियम भाग 3 : जानिए क्या होते हैं तथ्य, विवाधक तथ्य एवं सुसंगत तथ्य
साक्ष्य अधिनियम के तहत पिछले दो आलेख में हमने देखा कि साक्ष्य में सबूत का भार किस पर होता है? इसके अलावा हमने यह भी देखा कि किस तरह एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति क्या होती है और किस प्रकार इसमें रेस जेस्टे का सिद्धांत किस प्रकार लागू होता है। साक्ष्य विधि : क्या होती है एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति, जानिए रेस जेस्टे का सिद्धांत साक्ष्य अधिनियम की इस सीरीज़ में हम अब समझेंगे कि तथ्य ,विवाधक तथ्य एवं सुसंगत तथ्य क्या होते हैं और साक्ष्य के संदर्भ में...
अभियुक्त के इन अधिकारों का उल्लेख करती है सीआरपीसी की धारा 167
सीआरपीसी की धारा 167 अभियुक्त के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस धारा के अंतर्गत अभियुक्त को जमानत तक मिल जाती है तथा अभियुक्त को कितने समय अवधि के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना है। इसकी जानकारी इस धारा के अंतर्गत दी गई है। यह धारा अभियुक्त के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, इस धारा को पुलिस अन्वेषण वाले अध्याय में रखा गया है। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 किया धारा 167 अभियुक्त के लिए तीन प्रकार की राहत प्रदान करती है तथा इन तीनों बातों का उल्लेख इस धारा के अंतर्गत किया गया है। 1. गिरफ्तार...
आखिर वकीलों को क्यों देनी चाहिए प्रो-बोनो (निशुल्क) कानूनी सहायता?: कुछ सुझाव
'प्रो बोनो पब्लिको' एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अर्थ है "लोगों की भलाई के लिए"। यह आमतौर पर अपने संक्षिप्त रूप "प्रो बोनो" के रूप में उपयोग किया जाता है। कानूनी क्षेत्र में, "प्रो बोनो" शब्द का अर्थ उन कानूनी सेवाओं से है जो जनता की भलाई के लिए या तो मुफ्त में या कम शुल्क पर दी जाती हैं। नि:शुल्क कानूनी सहायता (pro bono legal service) को पारंपरिक कानूनी सहायता सेवाओं, जो कानूनी सेवा प्राधिकरण द्वारा वकीलों के माध्यम से मुहैया करायी जाती है, से अलग समझा जाना चाहिए। यह उम्मीद की जाती है कि...
भारत के संविधान की प्रस्तावना (Preamble) के बारे में ख़ास बातें
भारत के संविधान की मसौदा समिति (Drafting Committee) ने यह देखा था कि प्रस्तावना/उद्देशिका (Preamble) को नए राष्ट्र की महत्वपूर्ण विशेषताओं को परिभाषित करने तक ही सीमित होना चाहिए और उसके सामाजिक-राजनीतिक उद्देश्यों एवं अन्य महत्वपूर्ण मामलों को संविधान में और विस्तार से समझाया जाना चाहिए। संविधान के निर्माताओं का अंतिम उद्देश्य एक कल्याणकारी राज्य और समतामूलक समाज का निर्माण करना था, जिसमें भारत के उन लोगों के उद्देश्य और आकांक्षाएं शामिल हों जिन्होंने देश की आजादी की प्राप्ति के लिए अपना...
साक्ष्य विधि : क्या होती है एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति, जानिए रेस जेस्टे का सिद्धांत
साक्ष्य विधि का कार्य उन नियमों का प्रतिपादन करना है, जिनके द्वारा न्यायालय के समक्ष तथ्य साबित और खारिज किए जाते हैं। किसी तथ्य को साबित करने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, उसके नियम साक्ष्य विधि द्वारा तय किये जाते हैं। साक्ष्य विधि अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण विधि है। समस्त भारत की न्याय प्रक्रिया भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की बुनियाद पर टिकी हुई है। साक्ष्य अधिनियम आपराधिक तथा सिविल दोनों प्रकार की विधियों में निर्णायक भूमिका निभाता है। इस साक्ष्य अधिनियम के माध्यम से ही यह तय...
क्या सांसद/विधायक वकालत कर सकते हैं, जानिए अधिवक्ता अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट का विचार
वकालत पेशे से जुड़ा हर व्यक्ति यह मानता और महसूस करता है कि वकील, मुखर प्रकृति के होते हैं और वे अपनी तार्किक सोच के लिए दुनियाभर में जाने जाते हैं। कानून की शिक्षा ग्रहण करने के पश्च्यात, उन्हें कानून को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है। अंतत: देश को कानून के शासन के अनुसार ही चलना होता है। यही कारण है कि हमारे संसद में और विभिन्न राज्यों के विधायी सदनों में हमे तमाम कानून के जानकार एवं वकील, सदस्य के रूप में दिखाई पड़ते हैं।जैसा कि हम जानते हैं, कानून बनाना विधायिका का कार्य है और इसमें...
क्या होता है सबूत का भार? जानिए साक्ष्य अधिनियम की खास बातें
साक्ष्य विधि का कार्य उन नियमों का प्रतिपादन करना है, जिनके द्वारा न्यायालय के समक्ष तथ्य साबित और खारिज किए जाते हैं। किसी तथ्य को साबित करने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, उसके नियम साक्ष्य विधि द्वारा तय किये जाते हैं। साक्ष्य विधि अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण विधि है। समस्त भारत की न्याय प्रक्रिया भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की बुनियाद पर टिकी हुई है। साक्ष्य अधिनियम आपराधिक तथा सिविल दोनों प्रकार की विधियों में निर्णायक भूमिका निभाता है। इस साक्ष्य अधिनियम के माध्यम से ही यह तय...














