जानिए हमारा कानून
जानिए महामारी संबंधित क्या है कानून और सरकार के अधिकार
किसी भी समाज,देश के लिए महामारी एक विकराल रूप हो सकती है। इस समय विश्व भर में कोरोना वायरस जैसी एक विकराल महामारी फैल रही है,जो मनुष्य के लिए अभिशाप बन कर आयी है। विश्व भर में इस महामारी से निपटने के प्रयास किए जा रहे हैं। 20 मार्च 2020 तक यह बीमारी भारत में भी फैल चुकी है तथा यह संक्रमण भारत भर में तेजी से फेल रहा है। भारत की सरकार इस संक्रमण से निपटने के हर संभव प्रयास कर रही है। सरकार की सहायता हेतु भारतीय विधि विधान में भी महामारी से निपटने हेतु संपूर्ण व्यवस्था है। भारतीय दंड संहिता की...
कोविड-19 और कनिका कपूर मामले के सन्दर्भ में आईपीसी की धारा 269 एवं 270 को समझिए
जैसा कि हम जानते हैं, भारत में COVID 2019 ने अपने पांव तेज़ी से पसारने की शुरुआत कर दी है। ऐसे कई मामले प्रकाश में आ रहे हैं जो चौंकाने वाले हैं, और जिनके चलते इस वायरस को तेज़ी से बढ़ने में बढ़त मिल रही है।हालिया मामला मशहूर पार्श्व गायिका, कनिका कपूर का है, जो COVID 2019 पॉजिटिव पायी गयी हैं, लेकिन ऐसी आशंका है कि उनके जरिये यह वायरस अन्य लोगों में भी फ़ैल गया हो।ख़बरों के मुताबिक, कनिका कपूर बीते 9 मार्च को लंदन से वापस भारत आई थीं, और बकौल कनिका, एयरपोर्ट पर उनकी थर्मल स्क्रीनिंग भी हुई थी, लेकिन...
जानिए गिरफ्तारी और मजिस्ट्रेट तथा प्राइवेट व्यक्ति द्वारा गिरफ्तारी संबंधी प्रावधान
गिरफ्तारी शब्द आपराधिक विधि में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आपराधिक विधि में पीड़ित पक्षकार को न्याय देने हेतु आरोपी को गिरफ्तार किया जाना आवश्यक है। पुलिस तथा मजिस्ट्रेट को आपराधिक विधि में गिरफ्तार करने संबंधी शक्तियां दी गई हैं। पुलिस और मजिस्ट्रेट न्याय प्रशासन संबंधी दो महत्वपूर्ण कड़ियां हैं। इन दोनों को ही व्यक्तियों की गिरफ्तारी करने संबंधी अधिकार दिए गए हैं।गिरफ्तारी कब की जा सकती हैदंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 के अंतर्गत यह बताया गया है कि गिरफ्तारी किस समय की जा सकती है। इस...
जानिए दंड प्रक्रिया संहिता के उद्घोषणा (ऐलान) और कुर्की संबंधी प्रावधान
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 ने न्यायालय को उद्घोषणा और कुर्की जैसी अमूल्य शक्ति प्रदान की है। उद्घोषणा एवं कुर्की किसी भी फरार व्यक्ति को न्यायालय में हाजिर करवाने को बाध्य कर देने के उपयोग में लायी जाती है। उद्घोषणा के माध्यम से जिस व्यक्ति के विरुद्ध वारंट जारी किया जाता है उस व्यक्ति को उस स्थिति में फरार घोषित किया जाता है, जब न्यायालय को यह समाधान हो जाता है तथा यह विश्वास कर लिया जाता है कि ऐसा व्यक्ति जिसके विरुद्ध वारंट जारी किया गया है, वह गिरफ्तारी से बच रहा है। ऐसी स्थिति में...
समन क्या है और इसकी तामील कैसे करवाई जाती है
नए अधिवक्ता और विधि के छात्रों को न्यायालय में हाजिर होने को विवश करने के लिए आदेशिकाओ के संबंध में अत्यंत दुविधा रहती है तथा वे समन एवं वारंट इत्यादि शब्दों की अवधारणा में उलझ जाते हैं। इन लेख के माध्यम से वारंट, समन और उद्घोषणा तथा कुर्की के संबंध में कुछ विशेष जानकारियां प्रस्तुत की जा रही हैं। यह लेख उन जानकारियों में से एक है। समन दंड प्रकिया संहिता 1973 की धारा 61 से लेकर 70 तक में समन संबंधी प्रावधान किए गए हैं। इन प्रावधानों में समन का जारी किया जाना और समन की तामील से संबंधित...
क्या होता है वारंट? जानिए वारंट कैसे जारी होता है
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 में वारंट शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द है। सहिंता में वारंट की परिभाषा प्राप्त नहीं होती है परंतु अध्याय 6 के भीतर वारंट से संबंधित धाराएं दी गई है। वारंट न्यायालय को प्राप्त ऐसी शक्ति है जो व्यक्ति को गिरफ्तार कर न्यायालय के समक्ष लाए जाने का प्रावधान करती है। वारंट शक्ति के बगैर न्यायालय को अपंग माना जा सकता है। भारतीय दंड संहिता वारंट के माध्यम से न्यायालय को वह अस्त्र प्रदान करती है, जिसके सामने बड़ी बड़ी शक्तियों को पस्त किया जा सकता है। न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट...
साक्ष्य अधिनियम : जानिए विशेषज्ञ (Expert) कौन होता और क्या होता है उसका प्रमुख कार्य?
साक्ष्य कानून का सामान्य सिद्धांत यह है कि प्रत्येक गवाह तथ्य का साक्षी होता है, राय का नहीं। इसका मतलब यह है कि एक व्यक्ति, जो किसी अदालत के समक्ष गवाह के रूप में पेश होता है, वह न्यायालय को केवल उन तथ्यों के बारे में बताने का हकदार है, जिन तथ्यों के बारे में उसके पास उसका व्यक्तिगत ज्ञान है, न कि यह बताने का कि उन तथ्यों के बारे में उसकी राय क्या है। यदि हम भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की बात करें तो इसके अंतर्गत भी सामान्य नियम यह है कि एक गवाह को यह अनुमति अवश्य दी गयी है कि वह या तो किसी...
जानिए दहेज मृत्यु से संबंधित अपराध और प्रमुख केस
भारतीय समाज के लिए दहेज एक अभिशाप है। दहेज ने स्त्रियों के जीवन को दूभर कर दिया है। दहेज की प्रथा के खिलाफ संपूर्ण भारतवर्ष में समय-समय पर आंदोलन होते रहे हैं। नवाचार की क्रांति के माध्यम से दहेज का उन्मूलन करने तथा समाज से दहेज के समूल को नष्ट करने के प्रयास किए जाते रहे हैं। दहेज की मांग, दहेज संबंधित कई अपराधों को जन्म देती है। भारतीय संसद ने भी समय-समय पर दहेज के खिलाफ विधि विधान का निर्माण किया है तथा समाज में दहेज समर्थक विचारों का अंत करने का प्रयास किया है। आवश्यक रूप से दहेज दिए जाने...
जानिए सिविल मामलों में आवश्यक (Necessary) एवं उचित (Proper) पक्षकार कौन होते हैं
यह कानून का एक मूल सिद्धांत है कि एक शिकायत/समस्या के निवारण के लिए एक कानूनी कार्यवाही किसी भी व्यक्ति द्वारा शुरू की जा सकती है; यह स्वाभाविक है कि इस तरह की शिकायत/समस्या के सम्बन्ध में व्यक्ति उचित न्याय कि अदालत से राहत चाहता है। यह अदालत का कर्तव्य है कि वह व्यक्ति की समस्या का समाधान, कानून की सीमाओं के भीतर रहकर करे।चूँकि इस लेख में हम सिविल मामलों के बारे में चर्चा कर रहे हैं, तो हमारे लिए यह जान लेना आवश्यक है कि आखिर किस प्रकार के मामले सिविल मामले कहे जाते हैं। इस सबंध में हम एक लेख...
आदेश 33, सीपीसी: जानिए कौन है 'निर्धन व्यक्ति' जिसे प्रथमतः कोर्ट-फीस देने से मिल सकती है छूट?
जैसा कि हम जानते हैं, किसी व्यक्ति को न्याय तक उसकी पहुंच से केवल इसीलिए दूर नहीं किया जा सकता है क्योंकि उसके पास अदालत के लिए निर्धारित शुल्क (जिसे हम 'कोर्ट-फीस' कहते हैं) का भुगतान करने के लिए पर्याप्त साधन मौजूद नहीं है [ए. ए. हजा मुनिउद्दीन बनाम भारतीय रेलवे, (1992) 4 एससीसी 736]। सुप्रीम कोर्ट ने शीला बरसे बनाम महाराष्ट्र राज्य AIR (1983) SC 378, सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन AIR 1978 SC 1675, एम. एच. होसकोट बनाम महाराष्ट्र राज्य AIR 1978 SC 1548, हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य AIR...
बलात्कार के अपराध के संबंध में दंड के उपबंध (भाग-2)
बलात्कार के अपराध के संबंध में पूर्व के आलेख में बलात्कार के अपराध की परिभाषा प्रस्तुत की गई थी। इस आलेख में बलात्कार के संबंध में भारतीय दंड संहिता में दंड के उपबंध पर चर्चा की जा रही है। बलात्कार भारतीय दंड संहिता का ऐसा अपराध है जिस पर अत्यंत विस्तृत उपबंध दंड संहिता के अंतर्गत किए गए हैं, जितनी विस्तृत इस अपराध की परिभाषा को रखा गया है, उतना ही विस्तृत अपराध के अधीन दंड दिए जाने का उपबंध किया गया है। यह ऐसा विशेष अपराध है, जिस अपराध के घटित होने पर दंड भी अलग अलग प्रकार से अलग-अलग पद...
बलात्कार के अपराध के संबंध में जानिए मुख्य बातें
बलात्कार का अपराध संपूर्ण भारत को हिला चुका है तथा यह अपराध भारतीय समाज के लिए एक महामारी के रूप में सामने आया है। राज्य और भारतीय विधान द्वारा इस अपराध को रोके जाने के कई प्रयास किए जा रहे हैं। सामाज में बलात्कार का अपराध एक अभिशाप बनकर आया है, विभिन्न सामाजिक स्तरों पर बलात्कार को रोकने के प्रयास किए जा रहे हैं। बलात्कार जैसे अपराध से केवल वयस्क स्त्रियां ही पीड़ित नहीं हैं, अपितु दुधमुंही बच्चियां भी बलात्कार जैसे जघन्य अपराध से पीड़ित हो रही हैं।अपराधी दुधमुंही बच्चियों के भी बलात्कार कर...
जानिए क्या होता है आपराधिक न्यास भंग और कब बनता है यह अपराध
आपराधिक न्यास भंग भारतीय दंड संहिता में एक बड़ा अपराध माना गया है तथा समाज में विश्वास के नाते में दुर्विनियोग समाप्त करने हेतु आपराधिक न्यास भंग को एक बड़े अपराध के रूप में भारतीय दंड संहिता में डाला गया है। कई बार हम आपराधिक न्यास भंग एवं चोरी के अपराध में स्पष्ट अंतर नहीं समझ पाते हैं। भारतीय दंड संहिता में आपराधिक न्यास भंग एक पृथक अपराध है तथा इस अपराध में आजीवन कारावास तक की सजा है, इसलिए इस अपराध को भारतीय दंड संहिता का बड़ा अपराध माना जा सकता है। कई मामलों में इस अपराध के कारित होने पर...
क्या द्वितीयक साक्ष्य (Secondary Evidence) देने से पहले अदालत की अनुमति लेना है आवश्यक?
जैसा कि हम जानते हैं, अदालतें मूल रूप से या तो प्राथमिक साक्ष्य (Primary Evidence) पर भरोसा करती हैं या द्वितीयक साक्ष्य पर। जहां तक भी संभव हो, अदालतों द्वारा द्वितीयक साक्ष्य का उपयोग करने से बचने की कोशिश की जाती है। इस दृष्टिकोण को 'सर्वश्रेष्ठ साक्ष्य नियम' (Best Evidence Rule) कहा जाता है। हालाँकि, एक अदालत कई स्थितियों में एक पक्ष को द्वितीयक साक्ष्य (Secondary evidence) पेश करने की अनुमति दे सकती है। हम यह भी जानते हैं कि दस्तावेजों की अंतर्वस्तु (Contents of Documents) के सम्बन्ध में...
भरण पोषण क्यों है प्रक्रिया विधि का हिस्सा? जानिए सीआरपीसी की धारा 125 से संबंधित मुख्य बातें
भारतीय विधि ने व्यक्ति पर अपनी पत्नी, संतान और वृद्ध माता-पिता के भरण-पोषण का दायित्व सौंपा है। भरण-पोषण के संबंध में अदालतों के कई ऐसे निर्णय हैं, जिनमें किसी व्यक्ति को अपने आश्रितों के भरण पोषण को सामाजिक दायित्व कहा है। जागीर कौन बनाम जसवंत कौर AIR 1963 सुप्रीम कोर्ट 1521 के मामले में यह कहा गया है कि यह केवल व्यक्ति का ही दायित्व नहीं अपितु सामाजिक दायित्व भी है। किसी सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु दंड प्रक्रिया संहिता में पत्नी संतान एवं वृद्ध माता-पिता के भरण पोषण संबंधी वैधानिक...
सीपीसी आदेश-VIII : जवाब-दावा दाखिल करने की समय सीमा पर क्या है कानून?
जैसा कि हम जानते हैं कि एक लिखित कथन (या जवाबदावा), किसी मामले में वादी को प्रतिवादी की ओर से अदालत के जरिये दिया गया आधिकारिक उत्तर होता है, जिसमें प्रतिवादी, वादपत्र में दिए गए प्रत्येक आरोप या तथ्यों को या तो अस्वीकार या स्वीकार करता है। वादी द्वारा लगाए गए आरोप के खिलाफ प्रतिवादी का डिफेन्स क्या होगा, उसे यह अदालत को लिखित कथन के जरिये बताना होता है। अभिव्यक्ति 'लिखित कथन' (Written Statement) विशिष्ट अर्थ का एक शब्द है, जो प्रतिवादी द्वारा वादी को दिए गए आधिकारिक उत्तर का संकेत देता है...
जानिए अदालत में चेक बाउंस केस लगाने की पूरी प्रक्रिया
चेक बाउंस का प्रकरण अत्यंत साधारण प्रकरण होता है। इस प्रकरण की किसी भी कोर्ट में अत्यधिक भरमार है। वर्तमान समय में अधिकांश भुगतान चेक के माध्यम से किए जा रहे हैं। किसी भी व्यापारिक एवं पारिवारिक क्रम में लोगों द्वारा एक दूसरों को चेक दिए जा रहे हैं। चेक के अनादर हो जाने के कारण चेक बाउंस जैसे मुकदमों की भरमार न्यायालय में हो रही है। नए अधिवक्ताओं के लिए चेक बाउंस का मुकदमा संस्थित करना और कार्यवाही करना रोचक होता है और स्कूल के समान होता है, जहां नए अधिवक्ता इस चेक बाउंस के प्रकरण को संस्थित...
प्रति परीक्षण में गवाह के पक्षद्रोही (Hostile) हो जाने के क्या होते हैं परिणाम
किसी भी आपराधिक मामले में प्रति परीक्षण का अत्यधिक महत्व होता है। साक्षी की परीक्षा के विषय में प्रति परीक्षण महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रति परीक्षण को छलनी मानी जा सकता है, यह एक यात्रा है जिस यात्रा से गुजरने के बाद ही साक्षी के दिए कथन सत्यापित हो पाते हैं। कथनों को न्यायालय में साबित या नासाबित हुआ तब ही माना जा सकता है जब वह प्रतिपरीक्षा से गुजर जाते हैं। साक्षी की जब उसे न्यायालय में बुलाने वाले व्यक्ति द्वारा परीक्षा ली जाती है, वह मुख्य परीक्षा (examination in chief) होती है। इस...
मजिस्ट्रेट के दंड देने की शक्तियां एवं पद- भाग 2
इसके पूर्व के आलेख में दंड न्यायालय की दंड देने की शक्तियां में सत्र न्यायाधीश, उच्च न्यायालय की शक्तियों को समझा गया था। इस लेख के माध्यम से मजिस्ट्रेट द्वारा दंड दिए जाने की शक्ति को समझने का प्रयास किया जा रहा है। दंड प्रक्रिया संहिता धारा 29 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट को दंड देने की शक्तियां दी गई है तथा या उल्लेख किया गया है कि मजिस्ट्रेट कितना दंड दे सकेंगे। न्याय तंत्र की समस्त पदावली को दो भागों में बांटा गया है। पहला न्यायाधीश, दूसरा मजिस्ट्रेट। मजिस्ट्रेट न्यायपालिका की अहम कड़ी है...
क्या नाराजी याचिका को परिवाद (Complaint) मानना मजिस्ट्रेट के लिए अनिवार्य है?
हम अक्सर देखते हैं कि जब कोई अपराध घटित होता है तो कोई व्यक्ति (कभी मामले का पीड़ित या उसके सम्बन्धी या अन्यथा कोई व्यक्ति) जाकर पुलिस के समक्ष उस अपराध के सम्बन्ध में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराता है। पुलिस उस मामले में अन्वेषण करती है और इसके पश्च्यात वो किसी निष्कर्ष पर पहुँचती है। पुलिस द्वारा उस निष्कर्ष को एक रिपोर्ट के जरिये सम्बंधित मजिस्ट्रेट तक पहुँचाया जाता है। इस रिपोर्ट में पुलिस FIR में नामजद व्यक्ति/व्यक्तियों के विरुद्ध या तो मामला बनाती है या नहीं बनाती है और मामला बंद...















