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क्या होता है वारंट? जानिए वारंट कैसे जारी होता है

Shadab Salim
11 March 2020 5:00 AM GMT
क्या होता है वारंट? जानिए वारंट कैसे जारी होता है
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दंड प्रक्रिया संहिता 1973 में वारंट शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द है। सहिंता में वारंट की परिभाषा प्राप्त नहीं होती है परंतु अध्याय 6 के भीतर वारंट से संबंधित धाराएं दी गई है।

वारंट न्यायालय को प्राप्त ऐसी शक्ति है जो व्यक्ति को गिरफ्तार कर न्यायालय के समक्ष लाए जाने का प्रावधान करती है। वारंट शक्ति के बगैर न्यायालय को अपंग माना जा सकता है। भारतीय दंड संहिता वारंट के माध्यम से न्यायालय को वह अस्त्र प्रदान करती है, जिसके सामने बड़ी बड़ी शक्तियों को पस्त किया जा सकता है। न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट को प्राप्त वारंट जारी करने की शक्ति न्यायाधीश को प्राप्त शक्तियों में सर्वाधिक सार्थक शक्ति है।

वारंट कब जारी किया जाता है

सर्वप्रथम तो न्यायालय जिस व्यक्ति को हाजिर करवाना चाहता है उस व्यक्ति को सम्मन जारी करता है। सम्मन के माध्यम से न्यायालय में हाजिर करवाने का प्रयास किया जाता है परंतु यदि व्यक्ति सम्मन से बच रहा है और सम्मन तामील होने के उपरांत भी न्यायालय के समक्ष हाजिर नहीं होता है और न्याय में बाधा बनता है तो ऐसी परिस्थिति में न्यायालय को गिरफ्तार करके अपने समक्ष पेश किए जाने का वारंट जारी करता है।

वारंट की अवधि

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 70 के अधीन वारंट की अवधि बताई गयी है। कोई भी वारंट जब किसी न्यायालय के पीठासीन अधिकारी द्वारा जारी कर दिया जाता है तो वह वारंट उस समय तक जब तक वह उसे जारी करने वाले न्यायालय द्वारा निरस्त नहीं कर दिया जाता है या उसका निष्पादन नहीं कर दिया जाता तब तक वह वारंट प्रवर्तन में रहेगा। कोई भी वारंट जब तक वापस नहीं ले लिया जाता निष्पादन नहीं कर दिया जाता तब तक वह वारंट प्रवर्तन में रहता है।

वारंट और सम्मन में अंतर

इन दोनों के मध्य मूल अंतर यह है कि सम्मन किसी भी व्यक्ति को न्यायालय में उपस्थित होने के लिए जारी किया जाता है जबकि वारंट गिरफ्तारी के लिए जारी किए जाते हैं। वह पुलिस अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति के नाम से निर्दिष्ट होता है।

सम्मन उस व्यक्ति को निर्दिष्ट होता है तथा उस व्यक्ति के पते पर ही निर्दिष्ट होता है, जिस व्यक्ति के लिए जारी किया जाता है। जिस व्यक्ति को न्यायालय में उपस्थित किया जाना है सम्मन उस व्यक्ति के पते पर ही जारी होता है, परंतु गिरफ्तारी वारंट उस व्यक्ति के नाम से तो जारी होता है परंतु निर्दिष्ट किसी अन्य को होता है। किसी अन्य को आदेश होता है कि वह उस व्यक्ति को जिसके लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है उसे न्यायालय के समक्ष पेश करे।

वारंट के प्रकार

दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत वारंट के प्रकार तो नहीं दिए गए हैं परंतु धारा 71 के अंतर्गत न्यायालय को यह अधिकार दिया गया है कि वह स्वविवेकनुसार यह निर्देश दे सकता है कि यदि जिस व्यक्ति के नाम पर वारंट जारी किया गया है, वह व्यक्ति नियत दिनांक को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने का वचन दे रहा है तो कोई बंधपत्र न्यायालय को देता है तो ऐसी परिस्थिति में जमानत पर छोड़ा जा सकता है।

इस धारा के आधार पर वारंट को दो प्रकार में बांटा जाता है।

1 जमानतीय

2 गैर जमानतीय

जमानतीय वारंट

जमानतीय वह वारंट है, जिसमें प्रतिभूओ की संख्या या फिर कोई बंधपत्र की एक निश्चित धनराशि के आधार पर जिस व्यक्ति को वारंट निर्दिष्ट हुआ है उसे यह निर्देश होता है कि जिसके विरुद्ध वारंट है उसे छोड़ा जा सकता है और नियत तिथि को न्यायालय में उपस्थित होने का वचन लिया जा सकता है।

अर्थात न्यायालय जिस व्यक्ति को वारंट निर्दिष्ट करती है वह व्यक्ति बंधपत्र पर जमानत लेकर नियत तारीख को न्यायालय के समय उपस्थित होने का निर्देश मात्र उस व्यक्ति को दे देता है जिस व्यक्ति को न्यायालय ने वारंट जारी किया है।

वारंट में तीन व्यक्तियों का महत्वपूर्ण रोल होता है।

पहला- वारंट को जारी करने वाला न्यायालय।

दूसरा- जिस व्यक्ति को वारंट निर्दिष्ट किया गया है अर्थात जिस व्यक्ति को यह आदेश दिया गया है कि वह वारंट लेकर जाए। वारंट में जिस व्यक्ति की जानकारी दी गई है उस व्यक्ति को गिरफ्तार करके न्यायालय के समक्ष पेश करे।

तीसरा- वह व्यक्ति जिस व्यक्ति के नाम पर वारंट को जारी किया गया है अर्थात वह व्यक्ति जिसे गिरफ्तार करके न्यायालय के समक्ष लाकर पेश करना है।

कौन व्यक्ति वारंट निर्दिष्ट हो सकते हैं

न्यायालय किन व्यक्तियों को वारंट निर्दिष्ट करेगा यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 72 एवं 73 के अंतर्गत स्पष्ट रूप से दिया गया है तथा उन व्यक्तियों को बताया गया है जो व्यक्ति को न्यायालय वारंट निर्दिष्ट कर सकता है।

संहिता की धारा 72 बताती है कि न्यायालय गिरफ्तारी का वारंट मामूली तौर पर एक या एक से अधिक पुलिस अधिकारियों को निर्दिष्ट करेगा परंतु यदि वारंट का निष्पादन तुरंत करना है तो ऐसी परिस्थिति में कोई पुलिस अधिकारी मिल नहीं रहा है तो वारंट जारी करने वाला न्यायालय किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को वारंट जारी कर सकता है।

एक से अधिक पुलिस अधिकारियों को वारंट जारी किया जा सकता है तथा इसका निष्पादन जिन भी एक से अधिक को जारी किया गया है वह सभी कर सकते है।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 73 न्यायालय को विस्तृत शक्ति देते हुए यह प्रावधान करती है कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट किसी निकल भागे सिद्धदोष उद्घोषित अपराधी, किसी ऐसे व्यक्ति को जो गिरफ्तारी से बचने का प्रयास कर रहा है और वह गैरजमानतीय अपराध से अभियुक्त है ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध कोई भी गिरफ्तारी वारंट अपनी स्थानीय अधिकारिता के अंदर किसी भी व्यक्ति को निर्दिष्ट कर सकता है।

आवश्यक नहीं है कि पुलिस को ही गिरफ्तारी का वारंट जारी किया जाएगा न्यायालय अपने विवेक अनुसार किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी वारंट जारी कर सकता है और ऐसा व्यक्ति गिरफ्तारी के लिए किसी भूमि या अन्य संपत्ति में प्रवेश करता है तो उसका वारंट निष्पादन करेगा। जब ऐसा व्यक्ति वारंट के विरुद्ध व्यक्ति को गिरफ्तार कर लेता है तो उसे फौरन वारंट जारी करने वाली न्यायालय के समक्ष या फिर निकटतम पुलिस अधिकारी के हवाले कर देगा।

यह न्यायालय की बड़ी शक्ति है। इस शक्ति के माध्यम से न्यायालय किसी भी व्यक्ति को वारंट जारी करती है, निर्दिष्ट करती है तथा यहां पर पुलिस की आवश्यकता भी समाप्त हो जाती है तथा न्यायालय को एक ब्रह्मास्त्र जैसी शक्ति प्राप्त होती है। जो ब्रह्मास्त्र व्यक्तियों को भारत के किसी भी कोने से खोज कर ला कर पेश करने की शक्ति रखता है। न्याय के हितार्थ व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष पेश किया जाना सबसे बड़ा प्रश्न है।

अधिकारिता के बाहर निष्पादन के लिए भेजा गया वारंट

जिस व्यक्ति के विरुद्ध वारंट जारी किया गया है यदि उसका निष्पादन न्यायालय की अधिकारिता के बाहर है तो ऐसी परिस्थिति में उसे जारी करने वाला न्यायालय डाक द्वारा अन्यथा किसी ऐसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट जिला, पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त को भेज सकता है जिसकी अधिकारिता स्थान में सीमाओं के अंदर उस का निष्पादन किया जाना है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट, जिला अधीक्षक या आयुक्त उस वारंट पर अपना नाम पृष्ठांकित करके उसका निष्पादन करता है।

रामप्रवेश सिंह बनाम जिला मजिस्ट्रेट देवरिया के मामले में कहा गया है कि- किसी भी मामले में धारा 80 के उपबंध तब लागू होंगे जब गिरफ्तार किए जाने वाला व्यक्ति जेल में निरोधक नहीं है। यह उपबंध उस दशा में लागू नहीं होंगे यदि व्यक्ति पहले से ही जेल में बंद है।

एक अन्य सम्राट बनाम करीम बख्श सिंध के मामले में यह भी कहा गया है कि धारा 78 में वर्णित उपबंधों की प्रकृति निदेशात्मक है ना कि आदेशात्मक।

स्थानीय अधिकारिता के बाहर निष्पादन के लिए पुलिस अधिकारी को निर्दिष्ट वारंट

इसका उल्लेख दंड प्रक्रिया की धारा 79 करती है तथा धारा बताती है कि यदि न्यायालय द्वारा किसी पुलिस अधिकारी को वारंट का निष्पादन करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है जिस पुलिस अधिकारी के क्षेत्राधिकार में निष्पादन नहीं होना है तो वह पुलिस अधिकारी ऐसा वारंट लेकर ऐसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट या पुलिस थाने के भार साधक अधिकारी से निम्न पंक्ति के पुलिस अधिकारी के पास जिसकी अधिकारिकता की स्थानीय सीमाओं के अंदर वारंट का निष्पादन किया जाना है लेकर जाएगा।

पुलिस थाने का भार साधक अधिकारी होना चाहिए तथा ऐसे पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा वारंट का निष्पादन कर दिया जाता है।

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