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मजिस्ट्रेट के दंड देने की शक्तियां एवं पद- भाग 2

Shadab Salim
20 Feb 2020 4:15 AM GMT
मजिस्ट्रेट के दंड देने की शक्तियां एवं पद- भाग 2
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इसके पूर्व के आलेख में दंड न्यायालय की दंड देने की शक्तियां में सत्र न्यायाधीश, उच्च न्यायालय की शक्तियों को समझा गया था। इस लेख के माध्यम से मजिस्ट्रेट द्वारा दंड दिए जाने की शक्ति को समझने का प्रयास किया जा रहा है।

दंड प्रक्रिया संहिता धारा 29 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट को दंड देने की शक्तियां दी गई है तथा या उल्लेख किया गया है कि मजिस्ट्रेट कितना दंड दे सकेंगे।

न्याय तंत्र की समस्त पदावली को दो भागों में बांटा गया है। पहला न्यायाधीश, दूसरा मजिस्ट्रेट। मजिस्ट्रेट न्यायपालिका की अहम कड़ी है तथा यह प्रथम स्तर पर नागरिकों को न्याय प्रदान करता है। मजिस्ट्रेट का पद न्यायपालिका में अत्यंत महत्वपूर्ण पद है। दंड प्रक्रिया संहिता में मजिस्ट्रेट के पद को भी वर्ग में बांटा गया है तथा कोई भी मजिस्ट्रेट इस वर्ग के अनुसार ही दंड अधिरोपित कर पाता है।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय का महत्वपूर्ण न्यायालय होता है। यह पद किसी भी जिले के मजिस्ट्रेट के पद का सर्वोच्च पद होता है तथा जिले के समस्त न्यायिक मजिस्ट्रेट को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नियंत्रित करता है।

दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मृत्युदंड,आजीवन कारावास एवं 7 वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास के अलावा कोई भी ऐसा दंड दे सकता है जो विधि द्वारा प्राधिकृत है।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को केवल 3 तरह के दंडादेश नहीं देने से बाध्य किया गया है।कोई भी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मृत्यु दंड नहीं दे सकता,आजीवन कारावास नहीं दे सकता और ऐसा दंड नहीं दे सकता जो 7 साल से ज्यादा की कारावास की अवधि का है पर वह सभी दंड दे सकता है जिसे विधि द्वारा प्राधिकृत किया गया है।

मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी

मजिस्ट्रेट का यह पद समस्त न्यायपालिका को अपने कंधों पर लेकर चलता है।मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी किसी भी मामले को प्रारंभिक रूप से सुनता है।कोई भी मामला प्रारंभिक रूप से प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के पास ही जाता है।यह न्यायालय भारतीय न्यायपालिका का अत्यंत अहम अंग है,यह न्यायालय न्यायपालिका के भार को संभाल रहा है।

प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट 3 वर्ष तक का कारावास ₹10000 का जुर्माना दे सकता है। किसी भी मामले में यदि उसकी अदालत में कोई आरोपी से दोष सिद्ध होता है तो वह उस आरोपी को किसी भी अपराध के अंतर्गत 3 वर्ष तक का कारावास दे सकता है।

₹10000 तक का जुर्माना दे सकता है या दोनों को एक साथ भी दे सकता है। कोई भी प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट 3 वर्ष से अधिक का कारावास देने की अधिकारिता नहीं रखता है एवं 10 वर्ष से ₹10000 से अधिक के जुर्माना देने की अधिकारिता नहीं रखता है।

मजिस्ट्रेट द्वितीय श्रेणी

मजिस्ट्रेट वर्ग 2 भारतीय न्यायपालिका का सबसे निम्न पद है तथा इसी पद से न्यायपालिका के पदों की पदों का क्रम शुरू होता है। यह न्यायालय न्यायपालिका का निम्न स्तर कहा जाता है एवं जब प्रारंभिक चरण भी कहा जा सकता है।कोई भी सिविल वाद सर्वप्रथम इसी न्यायालय में प्रस्तुत किया।

आपराधिक मामलों में द्वित्तीय श्रेणी मजिस्ट्रेट का न्यायायल 1 साल से अधिक अवधि के कारावास और ₹5000 तक का जुर्माना या इन दोनों को एक साथ किसी भी सिद्ध दोष आरोपी को दे सकता है।

मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट और महानगर मजिस्ट्रेट

भारत के महानगरों के लिए महानगर मजिस्ट्रेट जैसे पद रखे गए हैं। इन पदों में मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट एवं महानगर मजिस्ट्रेट को रखा गया है। मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट को वही सब शक्तियां प्राप्त होती है जो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को प्राप्त होती है, एवं महानगर मजिस्ट्रेट को वही सब शक्तियां प्राप्त होती हैं जो प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट को प्राप्त होती हैं।

एक ही विचारण में अलग अलग अपराधों के लिए दंड

जब दंड न्यायालय एक ही विचारण में अलग-अलग अपराधों के लिए दंड देता है तब ऐसी परिस्थिति में दंड की अवधि उसी समय में एक साथ चलेगी जिस परिस्थिति में मजिस्ट्रेट के द्वारा दंड की अवधि को एक साथ चलने का लिख दिया जाता है। यदि मजिस्ट्रेट या न्यायधीश अलग-अलग दंड अलग-अलग अपराधों में देता है तथा सभी दंड एक के बाद एक शुरू करने का निर्णय देता है तो ऐसी परिस्थिति में एक दंड खत्म होने के बाद दूसरे दंड की अवधी शुरू होगी।

यह दंड का प्रकार कारावास होता है। एक कारावास काट लेने के बाद दूसरा कारावास प्रारंभ होता है परंतु ऐसी परिस्थिति में कोई भी कारावास 14 वर्ष से अधिक नहीं होगा अर्थात यदि कारावास की अवधि अलग-अलग चलने का निर्णय दिया गया है तो कोई भी कारावास 14 वर्षों से अधिक नहीं होगा।अधिकांश दंड की अवधि को एक साथ चलने का निर्णय न्यायाधीश द्वारा दिया जाता है।

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