हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

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    High Court Weekly Round Up

    देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (10 जुलाई, 2023 से 14 जुलाई, 2023) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    वाराणसी कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के ASI सर्वे की मांग वाली याचिका पर 21 जुलाई के लिए आदेश सुरक्षित रखा

    वाराणसी जिला न्यायालय ने 4 हिंदू महिला उपासकों के आवेदन पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा पूरे ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का सर्वेक्षण करने की मांग की गई थी ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या मस्जिद का निर्माण पूर्व में हिंदू मंदिर की मौजूदा संरचना पर किया गया है।

    जिला न्यायाधीश एके विश्वेशा की अदालत 21 जुलाई को आदेश सुना सकती है। ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में पूरे साल पूजा करने का अधिकार मांगने के लिए वाराणसी कोर्ट में लंबित एक मुकदमे में चार हिंदू महिला उपासकों द्वारा इस साल मई में (सीपीसी की धारा 75 (ई) और आदेश 26 नियम 10 ए के तहत) अदालत में आवेदन दायर किया गया था।

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    अकेले सह-अभियुक्तों के साथ वित्तीय लेनदेन एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के तहत प्रतिबंध लगाने के लिए पर्याप्त नहीं: केरल हाईकोर्ट

    केरल हाईकोर्ट ने गुरुवार को कहा कि केवल वित्तीय लेनदेन पर निर्भरता और सह-अभियुक्त की स्वीकारोक्ति को नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट (NDPS Act) की धारा 37 पर प्रतिबंध लगाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जाना चाहिए।

    जस्टिस ज़ियाद रहमान ए.ए. ने इस स्तर पर कोई निर्णायक निष्कर्ष निकालने से बचते हुए माना कि पर्याप्त सबूतों की अनुपस्थिति मामले में याचिकाकर्ताओं की भागीदारी के बारे में उचित संदेह पैदा करती है।

    केस टाइटल: अमल ई और अन्य बनाम केरल राज्य

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    हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम| बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार मिले, भले ही पिता की मृत्यु 2005 संशोधन से पहले हो गई हो: उड़ीसा हाईकोर्ट

    Hindu Succession Act- उड़ीसा हाईकोर्ट ने पैतृक संपत्ति में बेटियों के हक पर बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने बेटियों को उनके समान हमवारिस अधिकारों के मद्देनजर पैतृक संपत्ति प्राप्त करने का अधिकार दोहराया है, जैसा कि हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 द्वारा उन्हें उनके पिता की मृत्यु की तारीख की परवाह किए बिना प्रदान किया गया था।

    केस टाइटल: यज्ञसेनी पटेल बनाम महाप्रबंधक, महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड और अन्य।

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    यदि एक सक्षम व्यक्ति अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य है, तो आश्रित मां का क्यों नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

    Karnataka High Court on Maintenance and Welfare Of Parents And Citizens Act| कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक वृद्ध महिला के बेटों की ओर से उपायुक्त के एक आदेश, जिसमें बेटों को माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम के तहत अपनी मां को 10,000 रुपये की भरण-पोषण राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था, के खिलाफ दायर याचिका को खारिज़ कर दिया।

    जस्टिस कृष्ण एस दीक्षित की सिंगल जज बेंच ने गोपाल और अन्य द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिन्होंने उस आदेश पर सवाल उठाया था, जिसमें उन्हें अपनी 84 वर्षीय मां को 10,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। मां उनकी बहन के साथ रह रही हैं।

    केस टाइटल: गोपाल और अन्य और डिप्टी कमिश्नर और अन्य

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    अपराधों के लिए कड़ी सजा के मद्देनजर पॉक्सो एक्‍ट के तहत गवाहों से क्रॉस-एग्जामिनेशन का आरोपी का अधिकार अधिक ऊंचे स्तर पर: दिल्ली हाईकोर्ट

    Accused’s Right To Cross-Examine Witness Under POCSO Act| दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि अपराधों की गंभीर प्रकृति और कानून के तहत निर्धारित कठोर सजा को देखते हुए पॉक्सो एक्ट के तहत किसी गवाह से क्रॉस-एक्जामिनेशन करने का आरोपी का अधिकार "ऊंचे स्तर पर" है।

    पॉक्सो मामले में एक आरोपी को अभियोजन पक्ष के गवाह से क्रॉस-एक्जामिनेशन करने का अवसर देते हुए जस्टिस तुषार राव गेडेला ने कहा, “अपराध बहुत गंभीर प्रकृति के हैं और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि पॉक्सो एक्ट के तहत अपराधों में बहुत कठोर सजा का प्रावधान है, यह मानना अनुचित नहीं होगा कि क्रॉस-एक्जामिनेशन करने का अधिकार और भी अधिक होगा।”

    केस टाइटल: सुशील कुमार बनाम राज्य सरकार, एसएचओ और अन्‍य के माध्यम से।

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    कई देशों ने सहमति से यौन संबंध बनाने की उम्र कम की, हमें भी विचार करना चाहिए: बॉम्बे हाईकोर्ट

    Age Of Consent For Sex- बॉम्बे हाईकोर्ट ने सहमति से यौन संबंध बनाने की उम्र को लेकर अहम बात कही है। हाईकोर्ट ने कहा कि कई देशों ने किशोरों के लिए सहमति से यौन संबंध बनाने की उम्र कम कर दी है और अब समय आ गया है कि हमारा देश और संसद भी दुनिया भर में हो रही घटनाओं पर ध्यान दे और इस पर विचार करे।

    कोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम यानी पॉक्सो से जुड़े आपराधिक मामलों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई। जहां पीड़ितों के किशोर होने और सहमति से संबंध बनाने की जानकारी देने के बावजूद आरोपियों को दंडित किया जाता है।

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    पॉश एक्ट | शिकायतकर्ता की मूल्यांकन प्रक्रिया में अभियुक्त की भागीदारी पूरी प्रक्रिया का मजाक बनाती है: कलकत्ता हाईकोर्ट

    Prevention of Sexual Harassment in the Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013| कलकत्ता हाईकोर्ट ने हाल ही में माना कि कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न की रोकथाम (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH Act) के तहत शिकायतकर्ता की मूल्यांकन रिपोर्ट में पक्षकार होने के नाते एक आरोपी की हरकतें, "पूरी प्रक्रिया को ख़राब करती हैं और उसका मज़ाक उड़ाती हैं।"

    शिकायतकर्ता/याचिकाकर्ता द्वारा आरोपी, उसकी कंपनी और उसके एजेंटों के खिलाफ दायर एक अवमानना आवेदन पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य की एकल पीठ ने उत्तरदाताओं/अवमाननाकर्ताओं को यह साबित करने का निर्देश दिया कि वे अदालत के आदेशों का "घोर उल्लंघन" नहीं कर रहे हैं , और यह कि आक्षेपित मूल्यांकन रिपोर्ट POSH Act के तहत आरोपों से असंबद्ध थी, जो याचिकाकर्ता द्वारा आरोपी/अवमानना संख्या 5 के खिलाफ लगाया गया था।

    मामला: अंजलि कुमारी बनाम यमुना कुमार चौबे, डीआईआर (तकनीकी) एनएचपीसी और अन्य।

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    धारा 164 हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम | चुनाव याचिका का अभिन्न अंग बनने वाले अनुबंध पर हस्ताक्षर होना चाहिए, सबूत के रूप में प्रस्तुत दस्तावेज को छूट दी जानी चाहिए: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

    Section164 of Himachal Pradesh Panchayati Raj Act| हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बुधवार को हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 164 के तहत चुनाव याचिकाओं के संबंध में कानूनी आवश्यकताओं को स्पष्ट किया। अदालत ने माना कि चुनाव याचिका के साथ संलग्न अनुसूची या अनुबंध पर याचिकाकर्ता द्वारा हस्ताक्षर और सत्यापन किया जाना चाहिए, जबकि याचिका के दावों के सबूत के रूप में प्रस्तुत किए गए दस्तावेज़ इस आवश्यकता से मुक्त हैं।

    केस टाइटल: रंगीला राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य

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    अभियोजन पक्ष के गवाहों से क्रॉस एक्जामिनेश के लिए वकील को नियुक्त करने के लिए आरोपी को समय देना ट्रायल कोर्ट का कर्तव्य: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के दोषी पाए गए आरोपी को दी गई सजा का आदेश रद्द कर दिया, क्योंकि आरोपी अभियोजन पक्ष के गवाहों से क्रॉस एक्जामिनेश नहीं कर सका। जस्टिस के नटराजन की एकल न्यायाधीश पीठ ने यह कहते हुए मामले को नए सिरे से विचार के लिए ट्रायल कोर्ट में वापस भेज दिया, "बेशक, त्वरित सुनवाई अनिवार्य है। हालांकि, अभियोजन पक्ष के गवाहों से क्रॉस एक्जामिनेश करने का अवसर प्रदान करने से इनकार करना, जो कि भारत के संविधान के गारंटीशुदा अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई से इनकार करने के अलावा और कुछ नहीं है।"

    केस टाइटल: हरीश कुमार ए और कर्नाटक राज्य और अन्य

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    [जम्मू-कश्मीर सिविल सर्विस रूल्स] संविदा कर्मचारी सेवा समाप्ति से पहले पूर्ण नियमित जांच का हकदार नहीं: हाईकोर्ट

    जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने मंगलवार को फैसला सुनाया कि संविदा कर्मचारी सेवा समाप्ति (termination) से पहले पूर्ण नियमित जांच का हकदार नहीं है, भले ही सेवा समाप्ति प्रकृति में कलंकात्मक हो।

    जस्टिस संजय धर ने ये टिप्पणियां ग्राम रोज़गार सहायक (जीआरएस) द्वारा दायर मामले में कीं, जिसे ग्रामीण विकास विभाग ने उसकी सेवा समाप्ति कर दी। याचिकाकर्ता ने अपनी सेवा समाप्ति को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि उसकी सेवा समाप्ति से पहले विभागीय जांच नहीं की गई।

    केस टाइटल: आबिद अहमद गनई बनाम यूटी ऑफ जम्मू-कश्मीर एवं अन्य।

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    धारा 397(3) सीआरपीसी | सत्र न्यायालय के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर करना हाईकोर्ट के अंतर्निहित क्षेत्राधिकार पर रोक नहीं लगाता: जम्मू एंड कश्मीर हाईकोर्ट

    जम्मू एंड कश्मीर हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों के व्यापक दायरे पर जोर देते हुए स्पष्ट किया है कि सत्र न्यायालय के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर करने से याचिकाकर्ता को सीआरपीसी की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट के अंतर्निहित क्षेत्राधिकार का उपयोग करने से नहीं रोका जा सकता है।

    जस्टिस एम ए चौधरी की पीठ ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत एक याचिका पर सुनवाई करते हुए ये स्पष्टीकरण दिए, जिसके संदर्भ में याचिकाकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत उत्तरदाताओं को गुजारा भत्ता देने के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता ने इस आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका भी दायर की थी, जिसे प्रधान सत्र न्यायाधीश ने खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि पिछले आदेश अवैध थे और इससे न्याय की हानि हुई थी।

    केस टाइटल: बिलाल अहमद गनी बनाम स्वीटी रशीद एवं अन्य।

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    रेप पीड़िता को बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग रेप पीड़िता का गर्भपात कराने की मांग से जुड़ी याचिका पर सुनवाई की। हाईकोर्ट ने कहा- यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को उस बच्चे को जन्म देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जो बच्चा यौन शोषण करने वाले व्यक्ति का है। दरअसल, 12 साल की रेप पीड़िता ने अपने 25 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की मांग करते हुए याचिका दाखिल की।

    जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस प्रशांत कुमार की बेंच ने कहा- महिला को गर्भावस्था के चिकित्सकीय समापन से इनकार करना गलत है। उसे मातृत्व की जिम्मेदारी से बांधने से उसके सम्मान के साथ जीने के मानव अधिकार से इनकार करना होगा। पीड़िता को अपने शरीर की स्थिति का निर्णय लेने का पूरा अधिकार है।

    केस टाइटल- एक्स बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य [WRIT - C No. – 22016 ऑफ 2023]

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    टूटे रिश्तों के कारण भावनात्मक कमी को पूरा करते हैं पालतू जानवर: मुंबई कोर्ट ने घरेलू हिंसा मामले में महिला के रॉटविलर कुत्ते के लिए गुजारा-भत्ता देने का निर्देश दिया

    मुंबई की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने यह देखते हुए कि पालतू जानवर टूटे रिश्तों के कारण होने वाली भावनात्मक कमी को पूरा करते हैं, हाल ही में घरेलू हिंसा के मामले में 55 वर्षीय महिला और उसके तीन रॉटविलर कुत्ते के लिए अंतरिम गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया।

    मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोमलसिंग राजपूत ने महिला के पति को उसकी वित्तीय पृष्ठभूमि और उसके पालतू कुत्तों की देखभाल और भरण-पोषण को ध्यान में रखते हुए अंतरिम भरण-पोषण के रूप में 50,000 प्रति माह रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया।

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    विशेष एमपी/एमएलए अदालतों के पीठासीन अधिकारियों का ट्रांसफर करने के लिए हाईकोर्ट को उसकी अनुमति की आवश्यकता नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट को सांसदों/विधायकों से संबंधित मामलों से निपटने वाली विशेष अदालतों के पीठासीन अधिकारियों को ट्रांसफर करने के लिए उसकी अनुमति की आवश्यकता नहीं है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने भी यही किया, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि हाईकोर्ट का प्रशासनिक कार्य प्रभावित न हो।

    केस टाइटल: अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ और अन्य डब्ल्यू.पी.(सी) नंबर 699/2016 पीआईएल-डब्ल्यू

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    POCSO कोर्ट पीड़ित की स्थिति और गंभीरता को ध्यान में रखते हुए मुआवजा निर्धारित करने के लिए बाध्य, डीएलएसए की भूमिका केवल इसे लागू करना: कर्नाटक हाईकोर्ट

    पॉक्सो परीक्षणों के संदर्भ में कर्नाटक हाईकोर्ट ने माना कि केवल विशेष अदालत के पास NALSA योजना के तहत बाल पीड़ितों को मुआवजा निर्धारित करने की शक्ति है और DLSA विशेष अदालत द्वारा निर्धारित मुआवजे को प्रभावी करने के लिए कानूनी दायित्व के तहत है।

    इसमें कहा गया है कि मुआवजे का निर्धारण करते समय, ट्रायल कोर्ट को रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य, पीड़ित को लगी चोट की प्रकृति, जिस परिस्थिति में अपराध किया गया है, पीड़ित बच्चे के पुनर्वास, चिकित्सा उपचार, पीड़ित की शिक्षा आदि की आवश्यकता पर विचार करना होगा।

    केस टाइटल: ललिता सिद्दी और कर्नाटक राज्य और अन्य।

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    धारा 361 आईपीसी | नाबालिग की सहमति महत्वहीन, अपहरण के मामलों में अभिभावक की सहमति निर्णायक कारक: केरल हाईकोर्ट

    केरल हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह दोहराया कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 361 के तहत अपहरण के अपराध के लिए नाबालिग की सहमति अप्रासंगिक है और यह अभिभावक की सहमति है जो यह निर्धारित करती है कि यह कार्य इसके दायरे में आता है या नहीं।

    जस्टिस के बाबू ने कहा कि बल या धोखाधड़ी का प्रयोग आवश्यक नहीं है; यहां तक कि अभियुक्त द्वारा किया गया अनुनय जिसके कारण नाबालिग स्वेच्छा से कानूनी अभिभावक की हिरासत से बाहर निकल जाता है, भी इस धारा को लागू करने के लिए पर्याप्त है।

    केस टाइटल: केरल राज्य बनाम अरुमुघम और संबंधित मामले

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    रजिस्ट्रार पंजीकृत दत्तक विलेख के आधार पर जन्म और मृत्यु रजिस्टर में बदलाव करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य: गुजरात हाईकोर्ट

    गुजरात हाईकोर्ट ने कहा है कि रजिस्ट्रार कानूनी रूप से पंजीकृत दत्तक ग्रहण विलेख के आधार पर जन्म और मृत्यु के रजिस्टर में बदलाव को शामिल करने के लिए बाध्य है और इसे नजरअंदाज या अवहेलना नहीं किया जा सकता है।

    जस्टिस एन वी अंजारिया और जस्टिस जे सी दोशी की खंडपीठ ने कहा, “इस मामले के तथ्यों में महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पंजीकृत दत्तक ग्रहण विलेख के आधार पर पिता के नाम में बदलाव की प्रार्थना की गई थी। पंजीकृत दत्तक विलेख के निष्पादन के मद्देनजर याचिकाकर्ता बच्चे का दत्तक पिता बन गया। पंजीकृत दत्तक ग्रहण विलेख जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम के तहत प्राधिकरण के लिए बाध्यकारी है।

    केस टाइटल: रजिस्ट्रार, जन्म और मृत्यु पंजीकरण विभाग बनाम नितेशभाई नरशीभाई मंगरोला

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    भले ही विवाह वैध न हो फिर भी पत्नी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने की हकदार: मद्रास हाईकोर्ट

    मद्रास हाईकोर्ट में पत्नी को गुजारा भत्ता दिए जाने से जुड़ा एक मामला आय़ा। हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही शादी वैध नहीं है, फिर भी दूसरी पत्नी और दूसरी शादी से पैदा हुए बच्चे CrPC की धारा 125 के तहत मेंटेनेंस यानी गुजारा भत्ता पाने के हकदार हैं। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा- सीआरपीसी की धारा 125 के मुताबिक पहले याचिकाकर्ता को पत्नी और दूसरे याचिकाकर्ता को प्रतिवादी का बेटा माना जा सकता है। ट्रायल कोर्ट का ये फैसला सही है कि याचिकाकर्ता गुजारा भत्ता पाने के हाकदार हैं।

    केस टाइटल: लोयोला सेल्वा कुमार बनाम शेरोन निशा

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    जम्मू-कश्मीर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम| वसीयत असंबंधित व्यक्ति के पक्ष में निष्पादित की जा सकती है: हाईकोर्ट

    जम्मू एंड कश्मीर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जम्मू और कश्मीर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 27 के तहत एक वसीयत ऐसे व्यक्ति के पक्ष में निष्पादित की जा सकती है जो निष्पादक से संबंधित भी नहीं है।

    जस्टिस विनोद चटर्जी कौल की एकल पीठ ने कहा कि वसीयत हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम द्वारा बिना किसी निषेध, प्रतिबंध, राइडर आदि के चित्रित "उत्तराधिकार की प्राकृतिक रेखा में परिवर्तन" का वैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त तरीका है।

    केस टाइटल: चांद देवी बनाम सोनम चौधरी

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    एमवी अधिनियम के तहत समय बाधित अपील में देरी के लिए माफी आवेदन पर निर्णय लिए बिना अवॉर्ड पर रोक नहीं लगाई जा सकती: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

    आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने माना है कि हाईकोर्ट के समक्ष मोटर वाहन अधिनियम की धारा 173 के तहत एक समय-बाधित अपील में अवॉर्ड के निष्पादन पर तब तक रोक नहीं लगाई जा सकती, जब तक कि एमवी अधिनियम की धारा 173 और आदेश 41 नियम 3ए (3) सीपीसी के दूसरे परंतुक के तहत देरी के लिए माफी मामले पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता।

    अदालत ने कहा, "हमारा विचार है कि एक समय-बाधित अपील में जब तक देरी की माफ़ी के मामले पर विचार नहीं किया जाता और देरी की माफ़ी के लिए आवेदक के पक्ष में निर्णय नहीं लिया जाता है, तब तक सफल वादी/प्रतिवादी का मूल्यवान अधिकार प्राप्त हो जाता है। चुनौती के तहत निर्णय/निर्णय के आधार पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है या केवल एक सीमित सीमा तक डिक्री के निष्पादन तक सीमित नहीं किया जा सकता।''

    केस टाइटल : मैसर्स. यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम उंदामातला वरलक्ष्मी और 6 अन्य

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